॥ अथर्ववेदीयसङ्कल्पसूक्तं ॥

अथर्ववेदीय ब्रह्मणो मे किसी भी माङ्गलिक कार्य के आरम्भ मे सङ्कल्प लेने से पूर्व संकल्प सूक्त का पाठ किया जाता हैं । संकल्पसूक्त अथर्ववेदसंहिता में प्राप्त नहीं होता हैं अपितु यह कल्पजा हैं अर्थात् यह अब लुप्त कल्पसूत्र में से संग्रहित हैं ।

॥ सङ्कल्पसुक्तम् ॥

ॐ यद् देवानां देवहेडो वयांसि, मित्रस्य त्वा पुरयेताद् बृहस्पति: । प्रजां पशुन् ब्रह्मणा ब्रह्मसोमं , तन्मे मन: शिवसंङ्कल्पमस्तु ॥१॥
ॐ येनाऽङ्गिरसो ज्योतिषि धारयन्त:, प्रतिष्ठावान् वितथे सुधिरा: । येऽथर्वाण: सर्वमोतप्रोत प्रजानन् , तन्मे मन: शिवसंङ्कल्पमस्तु ॥ २॥
ॐ येनेदं भूतं भुवनं भविष्यथ , परिगृहितमन्तेन सर्वम् । येन यज्ञ: शास्त्रा य ते सप्तहोता , तन्मे मन: शिवसंङ्कल्पमस्तु ॥३॥
ॐ संकल्पितेऽस्मिन् कर्माणि सिद्धिरस्तु॥

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