श्रीहेरम्बगणपति

तंत्रयुग (5CE से 14CE) में तांत्रिक सम्प्रदायों के उदय के साथ ही गाणपत्यसंप्रदाय का भी उदय हुआ । इस संप्रदाय के अनुयायी गणपति को अपना इष्ट देवता मानते थें । इस आगमिक धारा में ६ प्रधानमत तथा ६ उपमत थे, जो आपस में संबद्ध थें । ये सभी शाखाएं गणपति के किसी विशिष्टस्वरूप को अपना इष्टदेवता स्वीकारती थी तथा उस स्वरूप से संबन्धित विशेष आचारों तथा व्रतों का पालन करती थीं। इनमे
३ प्रधानमत तथा ३ उपमत वैदिकधर्म का पालन करने वाले दक्षिणाचार के और अन्य ३ प्रधानमत तथा ३ उपमत तांत्रिकधर्म का पालन करने वाले वामाचार के थें । इन्ही वाममार्ग के उपमतों में एक उपमत श्रीहेरम्बगणपति उपासना का था। इसका प्रधानमत श्रीउच्छिष्टगणपति उपासना का था । हेरम्बगणपतिसंप्रदाय के उपासक भगवान हेरम्बगणपति की साधना वामविधि से किया करते थें। ये साधक ‘अक्ष’ को भुजाओं पर धारण किया करते थें। ललाट पर श्वेतचन्दन से गाणपत्यपुण्ड्र तथा कण्ठ में श्वेतार्क की माला धारण किया करते थे । इस मत के साधक अंकुश तथा परशु ये दोनो आयुध धारण करते थें । भृगुवार को विशेष व्रत करते थें। मास की दोनों चतुर्थीयां इस मत में पर्वकाल थीं । श्रीहेरम्बनाथ अथवा श्रीहेरम्बसिद्धाचार्य इस मत के प्रतिष्ठापक आचार्य थें । गाणपत्यदर्शन की पाण्डुलिपी में कई स्थानों पर श्रीहेरम्बनाथ का नामोल्लेख मिलता हैं। काल की प्रवाहमानधारा में धीरे धीरे इस गाणपत्यमत का लोप हो गया परन्तु शाक्तमत के साधकों के मध्य श्रीहेरम्बगणपति की उपासना का क्रम निरन्तर चलता रहा। श्रीहेरम्बगणपति शाक्तों के आम्नायक्रम में पश्चिमाम्नाय से संबंधित देवता हैं । श्रीहेरम्बगणपति की दो प्रकार की मूर्तियां अथवा स्वरूप हैं ।
१. एकवीरहेरम्बगणपति
२. यामलहेरम्बगणपति
एकवीरस्वरूप में हेरम्बगणपति प्रायः सिंहारूढ, पंचवक्त्र तथा दशभुजी होते हैं । अपने दस हाथों में वे क्रमश अभय, वर, पाश, दंत, अक्षमाला, अंकुश , परशु , मुद्गर, मोदक तथा फल धारण करते हैं। ये मौक्तिक के समान श्वेतवर्ण वाले हैं । पंचकृत्यकारी होने के कारण इनके पांच मातंगवक्त्र बनाये जाते हैं ।

यामलस्वरूप में विशेष यह है कि इनके साथ इनकी दोनों शक्तियों का तथा दो प्रकार के वाहनों का अंकन किया जाता हैं। सिंह तथा मुषक ये दोनों ही इनके वाहन हैं ।

कही कही केवल एक शक्ति के साथ भी इन्हें दर्शाया जाता हैं । श्रीहेरम्बगणपति का एक नव्यस्वरूप भी देखने को मिलता हैं जिसमें उन्हें पद्मासनस्थित , पञ्चवक्त्र तथा चतुर्भुज दिखाय गया हैं । हेरम्बदेव के इस प्रकार के स्वरूप का वर्णन शास्त्रों में नहीं मिलता है संभवत ये किसी शिल्पकर्मी के मानस की अभिव्यक्ति हैं। हेरम्बोपनिषद, विनायकतंत्र, हेरम्बकल्प तथा मंत्रमहार्णव में इनकी उपासना संबंधी विवरण प्राप्त होता हैं। उत्तरभारत तथा नेपाल में गणपति के इस स्वरूप की क्रम से साधना करने वाले साधक अभी भी हैं। दक्षिणभारत के विषय में अनभिज्ञता के कारण पाठको से क्षमा चाहता हूं । हेरम्बभट्टारक का ध्यान लिखकर लेख समाप्त किया जाता हैं ।
अभयवरदहस्तःपाशदंताक्षमाला सृणिपरशुदधानो मुद्गरंमोदकञ्च । फलमधिगतसिंहः पंचमातंगवक्त्रो गणपतिरतिगौरः पातु हेरम्ब नामा ॥

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