जहां कभी काली मन्दिर था ।

कश्यपमहर्षि की मानसपुत्री कश्मीर ने शताब्दियों तक आतातायियों के नृशंस कृत्यों को झेला है और आज भी झेल रहीं हैं । महामद दैत्य के अनुयाई सनातनधर्म को कश्मीर की धारा से मिटाने के प्रयास करते रहें । कश्मीर के ब्राह्मणों (कश्मीरी पंडित समुदाय) की हत्याएं की गई, उन्हें यातनाएं दी है , उनकी स्त्रियों का शील भंग किया गया और जब फिर भी बात नही बनी तो कई मंदिरों को तोड़ा गया और उनकी जगह मस्जिदों का निर्माण किया गया । मंदिरों में मुर्दों को गाड़ कर उन्हे कब्र पूजने की जियारत बना दिया गया । इस पर भी बात नही बनी तो कश्मीर की धरा को ब्राह्मण तथा सनातनधर्म विहीन करने के लिए वहां से भगाया जाने लगा । कश्मीर के वीर ब्राह्मणों ने स्वधर्म के परित्याग के स्थान पर मृत्यु या मृत्युतुल्य पलायन को स्वीकार किया । इन्हीं सभी घटनाक्रमों का साक्षी है झेलम में तट पर बना श्रीनगर का एक काली मन्दिर ।

वह काली मंदिर जहां कभी भगवती भद्रकाली की कालसंकर्षिणी के रूप में पूजा होती थीं , इसे ‘कालेश्वरीतीर्थ’ के नाम से जाना जाता था । यहां पर एक झरना हैं जिसे प्राचीन काल में ‘कालीनाग’ अभिधान प्राप्त था । यह झरना आज भी हैं, जिससे पानी निकलकर झेलम में मिलता हैं । मस्जिद  परिसर के पीछे की रेलिंग के ठीक नीचे पत्थर पर सिन्दूरलेप लगा हैं जो मंदिर का जगतीभाग अथवा नीव का हिस्सा थीं ।

देवी कालेश्वरी का प्रतीक चिन्ह

आज यही स्थान कश्मीरी  सनातन धर्मावलम्बियों का आराधना स्थल हैं , जहां यदा कदा कश्मीरी पंडित जाया करते हैं।  इस मंदिर का उल्लेख भृंगिश संहिता के अप्रकाशित अंश में मिलता हैं ।

सन् 1395 में सिकंदर ‘बुतशिकन'( मूर्तिभंजक) ने इस मंदिर को और ईरान के एक मलेच्छ की स्मृति मे मस्जिद में परिवर्तित कर दिया । जिसे अब ‘खानकाह-ए-मौला’ के नाम से जाना जाता है ओर तब से  कालेश्वरी मंदिर मलेच्छों के कब्जे में हैं। यदि स्थापत्यकला के अनुसार भी के अवलोकन किया जाएं तो यह मस्जिद कम और वेश्मशैली का मंदिर ज्यादा लगता हैं ।

‘Eminent Personalities of Kashmir’ नामक पुस्तक में किशनलालकल्ला इस मंदिर का उल्लेख करते हुए लिखते है ” हिंदू मान्यता के अनुसार यहां कभी काली मंदिर था , जिसे तोड़ कर उसी सामग्री से यहां मस्जिद का निर्माण किया गया ” भविष्य की ओर आशान्वित होकर लिखता हुं , देवी कालेश्वरी के मंदिर की पुनर्प्रतिष्ठा होगी , यह स्थान एक बार पुनः सनातन धर्मावलम्बियों के अधिपत्य में होगा ।

लक्ष्मीं राजकुले जयां रणमुखे क्षेमङ्करीमध्वनि
क्रव्यादद्विपसर्पभाजि शबरीं कान्तारदुर्गे गिरौ ।
भूतप्रेतपिशाचजम्भकभये स्मृत्वा महाभैरवीं
व्यामोहे त्रिपुरां तरन्ति विपदं तरां च तोयप्लवे ॥

2 thoughts on “जहां कभी काली मन्दिर था ।

  1. Thank you for sharing the information.
    Can I share it in FB page ?
    Regards

    Sampoorna Sriram

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