भीमभैरवद्वादशनामावलिः

ॐ महाभैरवाय नमः॥१॥
ॐ दु:शासनान्तकाय नमः॥२॥
ॐ दिक्पालाय नमः॥३॥
ॐ गदाधारिणे नमः॥४॥
ॐ अभयप्रदाय नमः॥५॥
ॐ नरभक्षमहाप्रियाय नमः॥६॥
ॐ मधुपानप्रियाय नमः॥७॥
ॐ अट्टाटहासाय नमः॥८॥
ॐ श्मशानवासिने नमः॥९॥
ॐ अघोराय नमः॥१०॥
ॐ शववाहनाय नमः॥११॥
ॐ रक्तकापालय नमः॥१२॥

॥ श्रीवारुणीदेवीध्यानम् ॥

नमो वारुणीभट्टारिकायै

सुरासुरमध्यमाने क्षीरोदे सागरे शुभे ।
तत्रोत्पन्ना महादेवी दिव्यकन्यां मनोरमा ॥
लाक्षारसनिभा देवी पद्मरागसमप्रभा ।
अष्टादशभुजा देवी रत्नालङ्कारभूषिता ॥
सौम्यरूपधरा देवी त्रिनेत्रा नवयौवना ।
खड्गत्रिशूलवज्रञ्च दिण्डिमं मुसलं तथा ॥
गदापद्मवरं पात्रं दक्षिणे च विराजिता ।
फेटकं अंकुशन्घण्टां मुण्डखट्वाङ्गकुम्भयो ॥
नीलोत्पलाभयं बिन्दुं वामहस्ते विधारिणी ।
दिव्यरत्नकृताटोपा‌ हेमाभरणभूषिता ॥
श्वेतपद्मासनासिना बद्धपद्मासनस्थिताम्।
एवं ध्यात्वा महादेवी वारुणी दिव्यरूपिणीम्॥ ह्रीँ श्रीँ वारुणीभट्टारिका पादुकां पूजयामि ॥

॥ वैकुण्ठचतुर्मूर्ति ॥

वैकुण्ठचतुर्मूर्ति अथवा वैकुण्ठविष्णु भगवान विष्णु का एक विशिष्ट तांत्रिक स्वरूप हैं । वैकुंठनारायण के स्वरूप पर त्रिशिरोभैरव का प्रभाव मालूम होता हैं। दोनों में काफी कुछ साम्य हैं। दोनों देवताओं की उपासना विशेषतः काश्मीरदेश में की जाती थीं।

काश्मीर से प्राप्त वैकुण्ठचतुर्मूर्ति प्रतिमा

नारदविष्णु संवाद से अवतरित ३३ पटलों वाली श्रीजयाख्यसंहिता नामक पाञ्चरात्रागम मे वैकुण्ठचतुर्मूर्ति की उपासना का विशद वर्णन प्राप्त होता हैं । नारद जी से शांडिल्यऋषि ने इस संहिता को प्राप्त किया तथा नाना ऋषिगणों को इसका उपदेश दिया। श्रीजयाख्यसंहिता के षष्टपटल में वैकुण्ठभट्टारक का ध्यान उल्लिखित हैं:-

अनादिनिधनं देवं जगत्स्रष्टारमीश्वरम् ।
ध्यायेच्चतुर्भुज विप्र शङ्खचक्रगदाधरम् ॥
चतुर्वक्त्रं सुनयनं सुकान्तं पद्मपाणिनम् । वैकुण्ठं नरसिह्मास्यं वाराहं कपिलाननम् ॥
शुक्लं खगेश्वरारूढं सर्वाभरणभूषितम् । सर्वलक्षणसंपन्नं माल्याम्बरधरं विभुम् ॥किरीटकौस्तुभधरं कर्पूरालिप्तविग्रहम् ।सूर्यायुतसहस्राभं सर्वदेवनमस्कृतम् ॥ (ज.सं.६.७३-७६)

वैकुण्ठचतुर्मूर्ति चतुर्मुख ,चतुर्हस्त तथा शक्तिचतुष्टय से युक्त होते हैं। वराह, सौम्य, नृसिंह तथा उग्रकपिल यह श्रीभगवान के चतुर्मुख हैं । अपने चतुरहस्तो में शंख,चक्र,गदा तथा पद्म धारण करते हैं। उत्तान अवस्था में पद्मासनस्थ अथवा गरुडासन के ऊपर विराजमान होते हैं। जया, माया, लक्ष्मी तथा कीर्ति भगवान की चार अंतरंग शक्तियां हैं । भगवान कौस्तुभमणि, वनमाला,नानारत्नजड़ित किरीट तथा कुण्डल धारण करते हैैं। पार्श्व में चक्रपुरुष तथा गदादेवि हैं। जयाख्यसंहिता का रचनाकाल ५ शताब्दी हैं अतः वैकुण्ठचतुर्मूर्ति के उपासनासंप्रदाय का उदय गुप्तकाल में सिद्ध होता हैं । वैकुण्ठचतुर्मूर्ति की गुप्तकालीन प्रतिमाओं पर गान्धार शैली का प्रभाव दृश्य हैं । कुछ पाश्चात्य विद्वान हेलेनिस्टिक प्रभाव के भी पक्षधर है परन्तु यह मत समीचीन नहीं हैं ।

गुप्तकालीन वैकुंठभट्टारक प्रतिमा
गान्धारशैली प्रभावित प्रतिमा

अग्निपुराण, विष्णुधर्मोत्तरपुराण तथा शिल्पशास्त्रग्रंथ रूपमण्डन में भी वैकुण्ठविष्णु का उल्लेख मिलता हैं । भगवान विष्णु के वैकुण्ठचतुर्मूर्ति स्वरूप की उपासना विशेषतः से काश्मीरदेश प्रचलित थीं । ८-१२ शताब्दी में वैकुण्ठचतुर्मूर्ति की उपासना कश्मीरदेश में चरम पर थीं । १२ शताब्दी में रचित कल्हण की राजतरङ्गिणी में भी काश्मीरनरेश अवन्तीवर्मन द्वारा वैकुंठनारायण की प्राण प्रतिष्ठा का उल्लेख मिलता हैं‌। वैकुण्ठचतुर्मूर्ति कर्कोटराजवंश तथा उत्पल राजवंश के राजकीयदेव (कुलदेवता) थे । १३ शताब्दी में मलेच्छजाहिलो के आगमन के साथ हीं वैकुंठभट्टाराक की उपासना का ह्रास होने लगा । कई मंदिरों को तोड़ा गया , स्वर्णादि से निर्मित प्रतिमाओं को गलाकर आभूषणआदि बनाए गए । पाषाणप्रतिमाओं को खंडित किया गया। वैकुंठनाथ के उपासकों की निर्ममहत्याएं की गई । उपासना सम्बन्धी ग्रंथों को नष्ट कर दिया गया। इन्हीं मलेच्छजाहिलो के अत्याचारों के कारण १४-१५ शताब्दी तक वैकुण्ठचतुर्मूर्ति की उपासना काश्मीर देश से लुप्त प्राय हो गई । काश्मीर के अलावा उत्तरभारत के अन्य स्थानों पर तथा नेपालदेश में भी वैकुण्ठनाथ की उपासना होती थीं।

नेपालदेशीय वैकुण्ठनाथप्रतिमा

उत्तरभारत में अनेकों स्थानों पर वैकुण्ठचतुर्मूर्ति स्वरूप की प्रतिमाएं मिलती हैं विशेषकर गुजरात, राजस्थान तथा मध्य प्रदेश में । ११७० ईसवी में एक प्रतिमा चम्बा घाटी में प्रतिष्ठत की गई थीं । चंदेलों द्वारा १० शताब्दी में निर्मत खुजराहों का लक्ष्मणमंदिर भी वैकुण्ठचतुर्मूर्ति को समर्पित हैं।

लक्ष्मणमन्दिर के गर्भग्रह में स्थापित वैकुंठचतुर्मूर्ति

खुजराहों के कंदरियामहादेव मंदिर में भी वैकुण्ठ नारायण की प्रतिमा प्राप्त होती हैं।

कंदरियामहादेवमन्दिर

गुजरात के सिद्धनाथ महादेव मंदिर में भी वैकुण्ठचतुर्मूर्ति की प्रतिमा हैं । यह सिद्ध करता है कि मध्यभारत में भी कभी वैकुण्ठचतुर्मूर्ति की उपासना का प्रचलन रहा होगा अस्तु ।
ॐ विश्वरूपाय विद्महे विश्वातीताय धीमहि तन्नो विष्णु: प्रचोदयात् ॥

सिद्धकुञ्जिकास्तोत्र के रहस्य

ॐ या चण्डी मधुकैटभादिदैत्यदलनी माहिषोन्मादिनी या धूम्रेक्षणचण्डमुण्डमथनी या रक्तबीजाशनी ।
शक्तिः शुम्भनिशुम्भदैत्यदलनी या सिद्धिलक्ष्मीः परा सा देवी नवकोटिमूर्तिसहिता मां पातु विश्वेश्वरी ॥

सिद्धकुञ्जिकास्तोत्र एक अत्यन्त रहस्यमय तथा क्षिप्रफल प्रदान करने वाला स्तोत्रराज हैं। इस स्तोत्र की साधना सर्वाम्नाय से की जा सकती है , इसी कारण इस स्तोत्र के विभिन्न आम्नायगत पाठभेद हैं । यथा उत्तराम्नाय के साधक डामारतंत्रोक्त सिद्धकुञ्जिकास्तोत्र का पाठ करते है और पश्चिमाम्नाय के साधक गौरीतंत्रोक्त सिद्धकुञ्जिकास्तोत्र का पाठ करते हैं । सर्वसाधारण साधकों में रुद्रयामलतंत्रोक्त सिद्धकुञ्जिकास्तोत्र के पाठ का प्रचलन हैं । साथ ही महाविद्या के उपासक गण अपनी अपनी उपास्य महाविद्या से संबंधित सिद्धकुञ्जिकास्तोत्र का पाठ करते हैं । भगवति काली के उपासक कालीतंत्रोक्तसिद्धकुञ्जिकास्तोत्र तथा भगवति बगलामुखी के उपासक बगलातंत्रोक्त सिद्धकुञ्जिकास्तोत्र का पाठ करते हैं। बृहदमहासिद्धकुञ्जिकास्तोत्र नाम से भी इस स्तोत्र का एक पाठ मिलता हैं जो अनिरुद्धसरस्वतीमंत्र तथा मातृकाक्षर से पुटित हैं। वे साधक जो पूर्ण श्रीदुर्गासप्तशती का पाठ करने में असमर्थ है मात्र सिद्धकुञ्जिकास्तोत्र के पाठ से ही दुर्गापाठ के पूर्ण फल का लाभ उठा सकते हैं । जैसा कि सिद्धकुञ्जिकास्तोत्र की पूर्वपीठीका में उल्लिखित है-

कुंजिकापाठमात्रेण दुर्गापाठफलं लभेत्‌ ॥

साथ ही साधक इस स्तोत्र के पाठ से षट्कर्मो मे भी सफलता प्राप्त कर सकता हैं।
मारणं मोहनं वश्यं स्तम्भनोच्चाटनादिकम्‌।
पाठमात्रेण संसिद्ध्‌येत् कुंजिकास्तोत्रमुत्तमम्‌ ॥
जो साधक श्रीदुर्गासप्तशती के पाठ के पूर्व इस स्तोत्र का पाठ नहीं करता उसे अभीष्टफल की प्राप्ति नहीं होती हैं। उसका पाठ जंगल में रोने के सामन होता हैं।

कुंजिका रहितां देवी यस्तु सप्तशतीं पठेत्‌।
न तस्य जायते सिद्धिररण्ये रोदनं यथा ॥

अब प्रश्न यह उठता है कि इस स्तोत्र का नाम सिद्धकुञ्जिकास्तोत्र ही क्यों हैं। इसका उत्तर हैं पूर्व काल में भगवान शिव तथा ऋषियों ने कलिकाल के आगमन पर श्रीदुर्गासप्तशती तथा नवार्णमन्त्र को किलित कर दिया अर्थात ताला/कील लगाकर निष्प्रभावी कर दिया तथा उसकी चाबी, जिसे संस्कृत में कुंजी कहते हैं इस स्तोत्र में गोपित कर दी इसी कारण इस स्तोत्र को सिद्धकुञ्जिकास्तोत्र कहा जाता हैं। जैसा कि सिद्धकुञ्जिकास्तोत्र की फलस्तुति में उल्लिखित है

इदंतु कुंजिकास्तोत्रं मंत्रजागर्तिहेतवे ॥

अर्थात यह सिद्धकुञ्जिकास्तोत्र श्रीदुर्गासप्तशती तथा नवार्णमन्त्र की जागृति के हेतु हैं । इस स्तोत्र में नवार्णमन्त्र का अर्थ भी भगवान शिव ने बताया है साथ ही साथ संक्षेप में श्रीदुर्गा के चरित्र का भी वर्णन किया हैं। इस स्तोत्र में पारद के संस्कार तथा जागरण के सूत्र भी भगवान शिव ने बताएं हैं । इसी कारण रससिद्धि में भी यह स्तोत्र सहायक हैं । इस स्तोत्र का पाठ बालकों की भूतादिग्रहपीड़ा में भी लाभदायक हैं । सिद्धकुञ्जिकास्तोत्र का उत्तम पुरश्चरण १००८ बार पाठ करके, मध्यमपुरश्चरण ३३६ बार पाठ करके तथा साधारण पुरश्चरण १०८ पाठ करके संपादित किया जा सकता हैं । साधक यदि समर्थ होवे तो पंचांगपुरश्चरण करें अन्यथा पाठमात्र करें…… अस्तु ।
ॐ अम्बेऽअम्बिकेऽम्बालिके न मा नयतिकश्चन ।
ससस्त्यश्वक: सुभद्रिकाङ्काम्पीलवासिनीम् ॥

हनुभैरव

हनुभैरव नेपाल देश में पूजित एक तान्त्रिक देवता विशेष है । हनुभैरव भैरव तथा हनुमान का मिश्रित स्वरूप है ,जो की पश्चिमाम्नाय से सम्बंधित देवता है । हनुभैरव का शवारूढ़ होना भैरवागम से संबंध दर्शाता हैं। वस्तुतः हनुभैरव भगवती सिद्धिलक्ष्मी प्रत्यङ्गिरा के भैरव है । हनुभैरव के मंत्रादि सिद्धिलक्ष्मी सम्बन्धी ग्रंथों तथा हनुभैरवपूजाविधि , हनुभैरवस्तोत्र , हनुभैरवकवच , पञ्चमुखीवीरहनुभैरवस्तोत्र इत्यादि में संग्रहित होने के कारण कुछ मात्रा में संरक्षित है अन्यथा हनुभैरव की उपासना सम्बन्धी ग्रन्थ लगभग नष्टप्राय: है इस कारण इस देवता विशेष के बारे में अत्याधिक जानकारी अनुपलब्ध है। नेपाल में हनुभैरव के ३ स्वरूप प्राप्त होते है ।

  • (१) एकमुखी त्रिशूलगदाहस्त
  • (२) नरारुढ़ एकमुखी चतुरहस्त
  • (३) मकरारूढ़ पंचमुखी दशहस्त

एकमुखी स्वरूप रक्तवर्ण , दिव्यवेशभूषा तथा त्रिशूल एवं गदा धारण किये हुए हैं। इस स्वरूप में हनुभैरव बिना किसी वाहन के दर्शाये गए हैं। हनुभैरव वैष्णव पंचमुखी हनुमान का ही शैवशाक्त रूप है। देखा जाए तो हनुभैरव शैव, वैष्णव तथा शाक्तमतों की त्रिवेणीस्वरूप ही हैं। मध्यकाल में हनुमान की उपासना अपने उत्कर्ष पर थी केवल साधक समाज में मध्य में नहीं अपितु जनसामान्य के मध्य भी, यह प्रमाणित है कि हनुमान की उपासना मध्यकालीन शैव ,वैष्णव तथा शाक्त अपने अपने संप्रदायानुसार किया करते थे । सम्भव हैं कि मध्यकालीन तांत्रिको ने पंचमुखीहनुमान से प्रेरित होकर हनुभैरव की उपासना का प्रारम्भ नेपाल में किया होगा अस्तु !!!

ॐ अ॒स्मे रु॒द्रा मे॒हना॒ पर्व॑तासो वृत्र॒हत्ये॒ भर॑हूतौ स॒जोषाः॑ । यः शँस॑ते स्तुव॒ते धायि॑ प॒ज्र इन्द्र॑ज्येष्ठा अ॒स्माँ अ॑वन्तु दे॒वाः ॥

॥ गुह्यकाल्युपनिषत् ॥

अथर्ववेदमध्ये तु शाखा मुख्यतमा हि षट् ।
स्वयंभुवा याः कथिताः पुत्रायाथर्वणं प्रति ॥ १ ॥
तासु गुह्योपनिषदस्तिष्ठन्ति वरवर्णिनि ।
नामानि शृणु शाखानां तत्राद्या वारतन्तवी ॥ २ ॥ मौञ्जायनी द्वितीया तु तृतीया तार्णवैन्दवी ।
चतुर्थी शौनकी प्रोक्ता पञ्चमी पैप्पलादिका ॥ ३ ॥ षष्ठी सौमन्तवी ज्ञेया सारात् सारतमा इमाः । गुह्योपनिषदो गूढाः सन्ति शाखासु षट्स्वपि ॥ ४॥
तो एकीकृत्य सर्वास्तु मयाऽस्यां विनिवेशिताः । संहितायां साधकानामुद्धाराय वरानने ॥ ५॥
तास्ते वदामि यत् प्रोक्तं ध्यानं कुर्वन्ति देवताः । विराट्धऽयानं हि तज्ज्ञेयं महापातकनाशनम् ॥ ६ ॥ ब्रह्माण्डाद्बहिरुर्ध्वं हि महत्तत्त्वमहङ्कृतिः ।
रूपाणि पञ्चतन्मात्राः पुरुषः प्रकृतिर्नव ॥ ७ ॥ महापातालपादान्तलम्बा तस्या जयं स्मरेत् । ब्रह्माण्डार्धं कपालं हि शिरस्तस्या विभावयेत् ॥ ८ ॥ देवलोको ललाटञ्च षट्त्रिंशल्लक्षयोजनम् ।
मेरुः सीमन्तदण्डोऽस्या ग्रहरत्नसमाकुलः ॥ ९ ॥ अन्तर्वीथी नागवीथी भ्रुवावस्याः प्रकीर्तिते । शिवलोकश्च वैकुण्ठलोकः कर्णावुभौ मतौ ॥ १० ॥ लोहितं तिलकं ध्यायेन्नासा मन्दाकिनी तथा ।
चक्षुषी चन्द्रसूर्यौ च पक्ष्माणि किरणास्तथा ॥ ११ ॥ गण्डौ स्यातां तपोलोकसत्यलोकौ यथाक्रमम् । जनोलोकमहर्लोको कपोलौ परिकीर्तितौ ॥ १२ ॥ स्यातां हिमाद्रिकैलासौ तस्या देव्यास्तु कुण्डले । स्वर्लोकश्च भुवर्लोको देव्या ओष्ठाधरौ मतौ ॥ १३ ॥ दिक्पतीनां ग्रहाणाञ्च लोकाश्चाथ रदावली । गन्धर्वसिद्धसाध्यानां पितृकिन्नररक्षसाम् ॥ १४ ॥ पिशाचयक्षाप्सरसां मरीचीयायिनां तथा । विद्याधराणामाज्योष्मपाणां सोमैकपायिनाम् ॥ १५ ॥ सप्तर्षीणां ध्रुवस्यापि लोका ऊर्ध्वरदावली ।
मुखं च रोदसी ज्ञेयं द्यौर्लोकश्चिबुकं तथा ॥ १६ ॥ ब्रह्मलोको गलः प्रोक्तो वायवः प्राणरूपिणः । वनस्पतय ओषध्यो लोमानि परिचक्षते ॥ १७ ॥ विद्युद्दृष्टिरहोरात्रं निमेषोन्मेषसंज्ञकम् ।
विश्वं तु हृदयं प्रोक्तं पृथिवीपाद उच्यते ॥ १८ ॥
तलं तलातलं चैव पातालं सुतलं तथा ।
रसातलं नागलोकाः पादाङ्गुल्यः प्रकीर्तिताः ॥ १९ ॥ वेदा वाचः स्यन्दमाना नदा नद्योऽमिता मताः ।
कला काष्ठा मुहूर्ताश्च ऋतवोऽयनमेव च ॥ २० ॥
पक्षा मासास्तथा चाब्दाश्चत्वारोऽपि युगाः प्रिये । कफोणिर्मणिबन्धश्च तद्रुकटिबन्धनाः ॥ २१ ॥
प्रपदाश्च स्फिचश्चैव सर्वाङ्गानि प्रचक्षते ।
वैश्वानरः कालमृत्युजिह्वात्रयमिदं स्मृतम् ॥ २२ ॥ आब्रह्मस्तम्बपर्यन्तं तनुमस्याः प्रचक्षते ।
प्रलयो भोजने कालस्तृप्तिस्तेन च नासिका ॥ २३ ॥ ज्ञेयः पार्श्वपरीवर्तो महाकल्पान्तरोद्भवः ।
विराड्रूपस्य ते ध्यानमिति संक्षेपतोऽर्पितम् ॥ २४ ॥ तस्याः स्वरूपविज्ञानं सपर्या परिकीर्तितः ।
तदेव हि श्रुतिप्रोक्तमवधारय पार्वति ॥ २५ ॥ यथोर्णनाभिः सूत्राणि सृजत्यपि गिलत्यपि ।
यथा पृथिव्यामोषध्यः सम्भवन्ति गिलन्त्यपि ॥ २६ ॥ पुरुषात् केशलोमानि जायन्ते च क्षरन्त्यपि ।
उत्पद्यन्ते विलीयन्ते तथा तस्यां जगत्यपि ॥ २७ ॥ ज्वलतः पावकाद् यद्वत् स्फुलिङ्गाः कोटिकोटिशः । निर्गत्य च विनश्यन्ति विश्वं तस्यास्तथा प्रिये ॥ २८ ॥ ऋचो यजूंषि सामानि दीक्षा यज्ञाः सदक्षिणाः । अध्वर्युर्यजमानश्च भुवनानि चतुर्दश ॥ २९ ॥ ब्रह्मविष्ण्वादिका देवा मनुष्याः पशवो यतः । प्राणापानौ ब्रीहयश्च सत्यं श्रद्धा विधिस्तपः ॥ ३० ॥ समुद्रा गिरयो नद्यः सर्वे स्थावरजङ्गमाः ।
विसृज्येमानि सर्गादौ त्वं प्रकाशयसे ततः ॥ ३१ ॥ जङ्गमानि विधायान्धे विशत्यप्रतिभूतकम् ।
नवद्वारं पुरं कृत्वा गवाक्षाणीन्द्रियाण्यपि ॥ ३२ ॥
सा पश्यत्यत्ति वहति स्पृशति क्रीडतीच्छति ।
शृणोति जिघ्रति तथा रमते विरमत्यपि ॥ ३३ ॥
तया मुक्तं पुरं तद्धि मृतमित्यभिधीयते ॥ ३४ ॥
ये तपः क्षीणदोषास्ते नैव पश्यन्ति भाविताम् । ज्योतिर्मयीं शरीरेऽन्तर्ध्यायमानां महात्मभिः ॥ ३५ ॥ बृहच्च तद्दिव्यमचिन्त्यरूपं सूक्ष्माच्च तत् सूक्ष्मतरं विभाति । दुरात् सुदूरे तदिहास्ति किञ्चित् पश्येत्त्विहैतन्निहितं गुहायाम् ॥ ३६॥
न चक्षुषा गृह्यते नापि वाचा नान्यैर्योगैर्न हि सा कर्मणा वा । ज्ञानप्रसादेन विशुद्धसत्त्वः ततस्तु तां पश्यति निष्कलाञ्च ॥ ३७॥
यथा नद्यः स्यन्दमाना समुद्रे गच्छन्त्यस्तं नामरूपे विहाय । तथा विद्वान् नामरूपाद् विमुक्तः परात् परां जगदम्बामुपैति ॥ ३८ ॥
सर्वे वेदा यत्पदमामनन्ति तपांसि सर्वाणि च यद् वदन्ति । यदिच्छन्तो ब्रह्मचर्यं चरन्ति तत्ते पदं संग्रहेण ब्रवीमि ॥ ३९ ॥
सैवैतत् एषैवालम्बनं श्रेष्ठं सैषैवालम्बनं परम् । एषैवालम्बनं ज्ञात्वा ब्रह्मलोके महीयते ॥ ४० ॥ इन्द्रियेभ्यः परा ह्यर्था ह्यर्थेभ्यश्च परं मनः ।
मनसस्तु परा बुद्धिर्बुद्धेरात्मा महान् परः ॥ ४१ ॥ महतः परमव्यक्तमव्यक्तात् पुरुषः परः ।
पुरुषात्तु परा देवी सा काष्ठा सा परा गतिः ॥ ४२ ॥ यथोदकं गिरौ सृष्टं समुद्रेषु विधावति ।
एवं धर्मान् पृथक् पश्यंस्तामेवानुविधावति ॥ ४३ ॥ एका गुह्या सर्वभूतान्तरात्मा एकं रूपं बहुधा या करोति । तामात्मस्थां येऽनुपश्यन्ति धीरास्तेषां सुखं शाश्वतं नेतरेषाम् ॥ ४४ ॥
न तत्र सूर्यो भाति न चन्द्रतारकं नेमा विद्युतो भान्ति कुतोऽयमग्निः । तामेव भान्तीमनुभाति सर्वं तस्या भासा सर्वमिदं विभाति ॥ ४५ ॥
यस्याः परं नापरमस्ति किञ्चिद् यस्या नाणीयो न ज्यायोऽस्ति किञ्चित् । वृक्ष इव स्तब्धा दिवि तिष्ठत्येका यदन्तः पूर्णामवगत्यपूर्णः ॥ ४६ ॥ सर्वाननशिरोग्रीवा सर्वभूतगुहाशया ।
सर्वत्रस्था भगवती तस्मात् सर्वगता शिवा ॥ ४७ ॥ सर्वतः पाणिपादान्ता सर्वतोऽक्षिशिरोमुखा ।
सर्वतः श्रुतिमत्येषा सर्वमावृत्य तिष्ठति ॥ ४८ ॥ सर्वेन्द्रियगुणाभासा सर्वेन्द्रियविवर्जिता ।
सर्वेषां प्रभुरीशानी सर्वेषां शरणं सुहृत् ॥ ४९ ॥
नवद्वारे पुरे देवी हंसी लीलायत बहिः ।
ध्येया सर्वस्य लोकस्य स्थावरस्य चरस्य च ॥ ५० ॥ अपाणिपादा जननी ग्रहीत्री पश्यत्यचक्षुः सा शृणोत्यकर्णा । सा वेत्ति वेद्यं न च तस्यास्तु वेत्ता तामाहुरग्र्यां महतीं महीयसीम् ॥ ५१ ॥
सा चैवाग्निः सा च सूर्यः सा वायुः सा च चन्द्रमाः ।
सा चैव शुक्रः सा ब्रह्म सा चापः सा प्रजापतिः ।
सा चैव स्त्री सा च पुमान् सा कुमारः कुमारिका ॥५२॥ ऋचो अक्षरे परमे व्योमन् यस्यां देवा अधिरुद्रा निषेदुः । यस्तां न वेद किमृचा करिष्यति ये तां विदुस्त इमे समासते ॥ ५३ ॥
छन्दांसि यज्ञाः क्रतवो व्रतानि भूतं भव्यं यच्च वेदा वदन्ति । सर्वं देवी सृजते विश्वमेतत् तस्याश्चान्यो मायया संनिरुद्धः ॥ ५४ ॥
मायां तु प्रकृतिं विद्यात् प्रभु तस्या महेश्वरीम् ।
अस्या अवयवैः सूक्ष्मै र्व्याप्तं सर्वमिदं जगत् ॥ ५५ ॥ या देवानां प्रभवा चोद्भवा च विश्वाधिपा सर्वभूतेषु गूढो । हिरण्यगर्भ जनयामास पूर्वं सा नो बुद्ध्या शुभया संयुनक्तु ॥ ५६ ॥
सूक्ष्मातिसूक्ष्मं पलिलस्य मध्ये विश्वस्य स्रष्ट्रीमनेकाननाख्याम् ।
विश्वस्य चैकां परिवेष्टयित्रीं ज्ञात्वा गुह्यां शान्तिमत्यन्तमेति ॥ ५७ ॥
सा ह्येव काले भुवनस्य गोप्त्री विश्वाधिपा सर्वभूतेषु गूढा । यस्यां मुक्ता ब्रह्मर्षयोऽपि देवाः ज्ञात्वा तां मृत्युपाशाञ्छिनत्ति ॥ ५८ ॥
घृतात् परं मण्डमिवातिसूक्ष्मं ज्ञात्वा कालीं सर्वभूतेषु गूढाम् । कल्पान्ते वै सर्वसंहारकर्त्रीं ज्ञात्वा गुह्यां मुच्यते सर्वपापैः ॥ ५९ ॥
एषा देवी विश्वयोनिर्महात्मा सदा जनानां हृदि सन्निविष्टा । हृदा मनीषा मनसाभिक्लृप्ता ये त्वां विदुरमृतास्ते भवन्ति ॥ ६० ॥
यदा तमस्तत्र दिवा न रात्रिेन सन्न चासद् भगवत्येव गुह्या । तदक्षरं तत्सवितुर्वरेण्यं प्रज्ञा च तस्याः प्रसृता परा सा ॥ ६१ ॥
नैनामूर्ध्वं न तिर्यक् च न मध्यं परिजग्रभत् ।
न तस्या प्रतिमाभिश्च तस्या नाम महद्यशः ॥ ६२ ॥
न सदृशे तिष्ठति रूपमस्या न चक्षुषा पश्यति कश्चिदेनाम् । हृदा मनीषा मनसाभिक्लृप्तां य एनां विदुरमृतास्ते भवन्ति ॥ ६३ ॥
भूयश्च सृष्ट्वा त्रिदशानवेशी सर्वाधिपत्यं कुरुते भवानि । सर्वा दिशश्चोर्ध्वमधश्च तिर्यक् प्रकाशयन्ती भ्राजते गुह्यकाली ॥ ६४ ॥
नैव स्त्री न पुमानेषा नैव चेयं नपुंसका । यद्यच्छरीरमादत्ते तेन तेनैव युज्यते ॥ ६५ ॥
धर्मावहां पापनुदां भगेशीं ज्ञात्वात्मस्थाममृतां विश्वमातरम् । तामीश्वराणां परमां महेश्वरी तां देवतायाः परदेवतां च ॥
पतिं पतीनां परमां पुरस्ताद् विद्यावतां गुह्यकालीं मनीषाम् ॥ ६६ ॥
तस्या न कार्यं करणं न विद्यते न तत्समा चाप्यधिका च दृश्यते । पराऽस्याः शक्तिर्विविधैव श्रूयते स्वाभाविकी ज्ञानबलक्रिया च ॥ ६७ ॥
कश्चिन्न तस्याः पतिरस्ति लोके न चेशिता नैव तस्याश्च लिङ्गम् ।
सा कारणं कारणकारणाधिपा नास्याश्च कश्चिज्जनता न चाधिपः ॥ ६८ ॥
एका देवी सर्वभूतेषु गूढा व्याप्नोत्येतत् सर्वभूतान्तरस्था । कर्माध्यक्षा सर्वभूताधिवासा साक्षिण्यैषा केवला निर्गुणा च ॥ ६९ ॥
वशिन्यका निष्क्रियाणां बहूनाम् एकं बीजं बहुधा या करोति ।
नानारूपा दशवक्त्रं विधत्ते नानारूपान् या च बाहून् बिभर्ति ॥ ७० ॥
नित्या नित्यानां चेतना चेतनानाम् एका बहूनां विदधाति कामान् । तत्कारणं सांख्ययोगाधिगम्यं ज्ञात्वा देवीं मुच्यते सर्वपाशैः ॥ ७१ ॥
या वै विष्णु पालने संनियुङ्क्ते रुद्रं देवं संहृतौ चापि गुह्या । तां वै देवीमात्मबुद्धिप्रकाशां मुमुक्षुर्वै शरणमहं प्रपद्ये ॥७२॥ निष्कलां निष्क्रियां शान्तां निरवद्यां निरञ्जनाम् । बह्वाननकरां देवीं गुह्यामेकां समाश्रये ॥ ७३ ॥
इयं हि गुह्योपनिषत् सुगूढा यस्या ब्रह्मा देवता विश्वयोनिः । एतां जपंश्चान्वहं मतियुक्तः सत्यं सत्यं ह्यमृतः सम्बभूव ॥ ७४ ॥
वेदवेदान्तरयोर्गुह्यं पुराकल्पे प्रचोदितम् ।
नाप्रशान्ताय दातव्यं नाशिष्याय च वै पुनः ॥ ७५ ॥ यस्य देव्यां परा भक्तिर्यथा देव्यां तथा गुरौ ।
तस्यैते कथिता ह्यर्थाः प्रकाशन्ते महात्मनः ॥ ७६ ॥
॥ महाकाल उवाच ॥
गुह्योपनिषदित्येषा गोप्यात् गोप्यतरा सदा ।
चतुर्थ्यश्चापि वेदेभ्य एकीकृत्यात्र योजिता ॥ ७७ ॥
उपदिष्टा च सर्गादौ सर्वानेव दिवौकसः ।
एवंविधं च यद्ध्यानमेवंरूपं च कीर्तितम् ॥ ७८ ॥
सा सपर्या परिज्ञेया विधानमधुना शृणु ।
सोऽहमस्मीति प्रथमं सोऽहमस्मि द्वितीयकम् ॥ ७९ ॥ तदस्म्यहं तृतीयं च महावाक्यत्रयं भवेत् ।
आद्यान्येतानि वाक्यानि छन्दांसि परिचक्षते ॥ ८० ॥
देवता गुह्यकाली च रजःसत्त्वतमोगुणाः ।
सर्वेषां प्रणवो बीजं हंसः शक्तिः प्रकीर्तिता ॥ ८१ ॥
मकारश्चाप्यकारश्च ह्युकारश्चेति कीलकम् ।
एभिर्वाक्यत्रयैः सर्वं कर्म प्रोतं विधानतः ॥ ८२ ॥
अनुक्षणं जपंश्चैव निश्चयः परिकीर्तितः । द्वितीयोपासकानां हि परिपाटीयमीरिता ॥ ८३ ॥
एवं चाप्यातुरो यस्तु मनुष्यो भक्तिभावितः ।
विमुक्तः सर्वपापेभ्यः कैवल्यायोपकल्पते ।
सर्वाभिः सिद्धिभिस्तस्य कि कार्य कमलानने ॥ ८४ ॥
॥श्रीमहाकालसंहितायांगुह्यकाल्युपनिषत्सम्पूर्णम् ॥