पश्चिमाम्नायनायिका श्रीकुब्जिका

५ श्रीकुब्जेश्वरसहितकुब्जिकाम्बापादुकां पूजयामि॥

तरुणरविनिभास्यां सिंहपृष्ठोपविष्टाम्
कुचभरनमिताङ्गीं सर्वभूषाभिरामाम्।
अभयवरदहस्तामेकवक्त्रां त्रिनेत्रां
मदमुदितमुखाब्जां कुब्जिकां चिन्तयामि ॥
भगवति कुब्जिका पश्चिमाम्नाय की अधिष्ठात्री देवी हैं।चिंचिणी,कुलालिका,कुजा,वक्त्रिका,क्रमेशी,खंजिणी, त्वरिता,मातङ्गी इत्यादि देवी के ही अन्य नाम हैं । भगवान परशिव ने अपने पश्चिमस्थ सद्योजातवक्त्र से सर्वप्रथम कुब्जिका उपासना का उपदेश किया। जैसा कि परातन्त्र में कहा गया है

सद्योजातमुखोद्गीता पश्चिमाम्नायदेवता ॥

वही कहा गया है

सद्योजातःसाधिता सा कुब्जिकाचक्रनायिका ॥

कुब्जिका शब्द की व्युत्पत्ति कुब्जक+टाप्, इत्व से होती हैं । कुब्जिका शब्द के शाब्दिकार्थ पर न जाकर रहस्यार्थ की ओर कुछ संकेत किया जाता हैं। कुब्जिका शब्द का कुबड़ी या झुकी हुई कमर वाली ऐसा शाब्दिक अर्थ करना मूर्खता हैं। कुब्ज होकर जो सर्वत्र संकुचित रूप से व्याप्त हो जाती हैं उसे कुब्जिका कहते हैं। जैसा कि शतसाहस्रसंहिता के भाष्य में कहा गया है

कुब्जिका कथम्? कुब्जो भूत्वा सर्वत्र प्रवेशं आयाति । तद्वत् । सा सर्वत्र सङ्कोचरूपत्वेन व्याप्तिं करोति तदा कुब्जिका ।

संवर्तामण्डलसूत्रभाष्य के अनुसार कु,अब्,ज अर्थात अग्निसोम तथा प्राण की अधिष्ठत्री देवि कुब्जिका हैं । वास्तव में सूक्ष्मदृष्टि से विचार किया जाए तो भगवती कुब्जिका ही कुलकुण्डलिनी हैं । जैसा कि शतसाहस्रसंहिता में कहा गया है

कुण्डल्याकाररूपेण कुब्जिनि तेन सा स्मृता ॥(शतसाहस्रसंहिता अध्याय २८)

गुप्तकाल (५ C.E. )से ९ C.E. के पूर्वार्ध तक संकलित अग्निपुराण, मत्स्यपुराण तथा गरुडपुराण में देवीकुब्जिका सम्बन्धी विवरण प्राप्त होता हैं। इस से इतना तो सिद्ध हो ही जाता है कि कुब्जिकाक्रम प्राचीन हैं । १०-१२ C.E. तक उत्तरभारत में कुब्जिका उपासना अपने चरम पर थीं । १५-१६ C.E. के अन्त तक यह गुप्त हो गईं। महामाहेश्वराचार्य अभिनवगुप्त जी अपने तन्त्रालोक में देवि कुब्जिका सम्बन्धी कुछ श्लोक उद्धृत करते हैं। (दृष्टव्य- तंत्रालोक २८ वां अध्याय जिसमें कुलयाग का वर्णन हैं ।, खंडचक्रविचार प्रकरण )। कश्मीर में भी एक कुब्जिकापीठ था । देवि कुब्जिका की एक अमूर्त सिन्दूरलिप्त प्रतिमा थीं। जिसका पूजन कश्मीर के कुब्जिकाक्रम के अनुसार किया जाता था । कालान्तर में जाहिल धर्मोन्मादी तथा आतंकवादी मानसिकता वाले विशेषवर्ग के लोगों के कारण इस पीठ का लोप हो गया। देवीरहस्यतन्त्र में अभी भी कश्मीर के कुब्जिकाक्रम का कुछ अंश सुरक्षित हैं । कश्मीर के मूर्धन्य विद्वान श्रीसाहिबकौल (कौलानन्दनाथ) द्वारा विभिन्न देवियों के पूजा मंत्रों का संग्रह किया गया था। देवी कुब्जिका संबंधित मंत्र उस पांडुलिपी में प्राप्त होते हैं । आनन्देश्वरानन्दनाथकृत आनन्देश्वरपद्धति तथा आज्यहोमपद्धति की पांडुलिपियों में भी भगवतीकुब्जिका सम्बन्धी अंश प्राप्त होता हैं । भारत में अभी भी कुछ मुठ्ठीभर साधक स्वतंत्रक्रम से तथा अन्य साधकगण श्रीविद्या केआम्नायक्रम में कुब्जिका उपासना करते हैं । नेपाल में कुब्जिका उपासना के साक्ष्य ९००-१६०० C.E. तक के मिलते हैं । मन्थानभैरवतंत्र,शतसाहस्रसंहिता, कुब्जिकामततंत्र,अम्बासंहिता,श्रीमततंत्र आदि ग्रन्थों के हस्तलेख मात्र नेपाल से प्राप्त होते हैं। नेपाल में पश्चिमाम्नाय कुब्जिकाक्रमपरम्परा अभी तक जीवित हैं। आगे कम्युनिस्टों के राज में वहां क्या हो यह तो भगवती जाने । अथर्ववेदीय परम्परा में कुलदीक्षा के समय आचार्य शिष्य को ३२ अक्षरों वाली विद्या तथा पांचमन्त्रों वाले गोपनीय सूक्त का उपदेश करता हैं ।
यह सूक्त श्रुतपरम्परा द्वारा प्राप्त होता है तथा अथर्ववेद के किसी भी प्रकाशित भाग में उपलब्ध नहीं होता हैं। अथर्ववेदीय परम्परा में देवी कुब्जिका के सिद्धकुब्जिका, महोग्रकुब्जिका, महावीरकुब्जिका, महाज्ञानकुब्जिका,महाभीमकुब्जिका, सिद्धिलक्ष्मीकुब्जिका ,महाप्रचंडकुब्जिका, रुद्रकुब्जिका तथा श्रीकुब्जिका इन ९ गुप्तस्वरूपों की साधना की जाती हैं। कुब्जिका उपासना की फलस्तुति
बताते हुए आथर्वणश्रुति कहती है

स सर्वैदेर्वैज्ञातो भवति…. स सर्वेषुतीर्थषु स्नातो भवति…. स सर्वमन्त्रजापको भवति स सर्वयन्त्रपुजको भवति…. स सोमपूतोभवति स सत्यपूतोभवति स सर्वपूतोभवति य एवं वेद ॥

कुब्जिका उपासक सभी देवताओं में जानने वाला होता हैं। वह समस्त मंत्रो का जापक होता हैं। वह सोम तथा सत्य द्वारा पवित्र होता हैं। वह सबके द्वारा पवित्र होता हैं। आगे भी आथर्वणश्रुति कहती है

एतास्या ज्ञानमात्रेण सकलसिद्धिभाग्भवति महासार्व भौमपदम्प्राप्नोत्येवं वेद ॥

कुब्जिका क्रम का ज्ञाता सकलसिद्धि का फलभागी होता हैं अवधूतरूप महासार्वभौमपद प्राप्त करता हैं।
परातन्त्र के अनुसार साधक अष्टसिद्धि युक्त होकर परमसिद्धि शीघ्र ही प्राप्त करता हैं। भगवती भोग और मोक्ष फलद्वयप्रदायिनी हैं।

अणिमादिमहासिद्धिसाधनाच्छीघ्र सिद्धिदा ।
मोक्षदा भोगदा देवी कुब्जिका कुलमातृका ॥

कुब्जिका उपासना मपञ्चक के द्वारा वामकौलाचार तथा अवधूताचार से की जाती हैं। दक्षिणाचार से उपासना निष्फल होती हैं । परा तन्त्र में कहा गया है

वाममार्गे रता नित्या दक्षिणा फलवर्जिता ।
मकारपञ्चकैः पूज्यानां यथाफलदा भवेत् ॥

कौलिकसंप्रदाय में सिद्धिनाथ,श्रीकंठनाथ,
कुजेशनाथ,नवात्मभैरव,शिखास्वच्छन्द तथा श्रीललितेश्वर द्वारा प्रपादित क्रम से कुब्जिका उपासना की जाती हैं। जैसा कि परातन्त्र में कहा गया हैं

विभिन्ना सिद्धिनाथेन श्रीनाथेनावतारिता ।
कुजेशनाथवीरेण कुजाम्नायप्रकाशिता॥
नवात्मा श्रीशिखानाथस्वच्छन्दःश्रीललितेश्वरः॥

श्रीवडवानलतंत्र में भी कहा गया है
बहुप्रभेदसंयुक्ता कुब्जिका च कुलालिका ॥
पुनः यह कुब्जिकाक्रम बाल,वृद्ध तथा ज्येष्ठ इन तीन क्रमों में विभाजित हैं । कलियुग में बालक्रम का प्राधान्य हैं। बालक्रम को ही अष्टाविंशतिक्रम भी कहते हैं ‌। भगवती का यंत्र बिन्दु, त्रिकोण, षट्कोण,अष्टदल तथा भूपुरात्मक हैं। जैसा कि कहा गया है

बिन्दुत्रिकोणषट्कोणमष्टपत्रं सकेसरम् ।श्रीमत्कुब्जेश्वरीयन्त्रं सद्वारं भूपूरत्रयम् ॥

कुब्जिकाक्रमपूजा में श्रीनवात्मागुरुमण्डल, श्रीअष्टाविंशतिक्रम तथा श्रीपश्चिममूलस्थानदेवी का अर्चन किया जाता हैं । चिञ्चिनिमतसारसमुच्चय, कुब्जिकामततंत्र,शतसाहस्रसंहिता, गोरक्षसंहिता, अम्बासंहिता, श्रीमततंत्र, कुब्जिकोपनिषत्, नित्याह्निकतिलकं ,मन्थानभैरवतंत्र इत्यादि कुब्जिका उपासना संबंधित ग्रन्थ हैं । अग्निपुराण में कहे हुए
भगवती कुब्जिका के ध्यान को लिखकर लेख का समापन किया जाता है…. ॐ शिवमस्तु ।

नीलोत्पलदलश्यामाषड्वक्त्राषट्प्रकारिका ।
चिच्छक्तिरष्टादशाख्या बाहुद्वादशसंयुता ॥
सिंहासनसुखासीना प्रेतपद्मोपरिस्थिता ।
कुलकोटिसहस्राढ्या कर्कोटोमेखलास्थितः॥
तक्षकेणोपरिष्टाच्चगलेहारश्च वासुकिः।
कुलिकः कर्णयोर्यस्याःकूर्म्मःकुण्डलमण्डलः॥
भ्रुवोःपद्मो महापद्मोवामे नागःकपालकः ।
अक्षसूत्रञ्च खट्वाङ्गं शङ्खं पुस्तकञ्चदक्षिणे॥
त्रिशूलन्दर्पणं खड्गं रत्नमालाऽङ्कुशन्धनुः।
श्वेतमूर्ध्वं मुखन्देव्या अर्धश्वेतन्तथाऽपरं ॥
पूर्व्वास्यं पाण्डरं क्रोधि दक्षिणं कृष्णवर्णकं ।
हिमकुन्देन्दुभं सौम्यं ब्रह्मा पादतले स्थितः॥
विष्णुस्तु जघने रुद्रो हृदि कण्ठे तथेश्वरः।
सदाशिवोललाटेस्याच्छिवस्तस्योर्ध्वतःस्थितः॥
आघूर्णिता कुब्जिकैवं ध्येया पूजादिकर्म्मसु॥

भीमभैरवद्वादशनामावलिः

ॐ महाभैरवाय नमः॥१॥
ॐ दु:शासनान्तकाय नमः॥२॥
ॐ दिक्पालाय नमः॥३॥
ॐ गदाधारिणे नमः॥४॥
ॐ अभयप्रदाय नमः॥५॥
ॐ नरभक्षमहाप्रियाय नमः॥६॥
ॐ मधुपानप्रियाय नमः॥७॥
ॐ अट्टाटहासाय नमः॥८॥
ॐ श्मशानवासिने नमः॥९॥
ॐ अघोराय नमः॥१०॥
ॐ शववाहनाय नमः॥११॥
ॐ रक्तकापालय नमः॥१२॥

॥ श्रीवारुणीदेवीध्यानम् ॥

नमो वारुणीभट्टारिकायै

सुरासुरमध्यमाने क्षीरोदे सागरे शुभे ।
तत्रोत्पन्ना महादेवी दिव्यकन्यां मनोरमा ॥
लाक्षारसनिभा देवी पद्मरागसमप्रभा ।
अष्टादशभुजा देवी रत्नालङ्कारभूषिता ॥
सौम्यरूपधरा देवी त्रिनेत्रा नवयौवना ।
खड्गत्रिशूलवज्रञ्च दिण्डिमं मुसलं तथा ॥
गदापद्मवरं पात्रं दक्षिणे च विराजिता ।
फेटकं अंकुशन्घण्टां मुण्डखट्वाङ्गकुम्भयो ॥
नीलोत्पलाभयं बिन्दुं वामहस्ते विधारिणी ।
दिव्यरत्नकृताटोपा‌ हेमाभरणभूषिता ॥
श्वेतपद्मासनासिना बद्धपद्मासनस्थिताम्।
एवं ध्यात्वा महादेवी वारुणी दिव्यरूपिणीम्॥ ह्रीँ श्रीँ वारुणीभट्टारिका पादुकां पूजयामि ॥

॥ वैकुण्ठचतुर्मूर्ति ॥

वैकुण्ठचतुर्मूर्ति अथवा वैकुण्ठविष्णु भगवान विष्णु का एक विशिष्ट तांत्रिक स्वरूप हैं । वैकुंठनारायण के स्वरूप पर त्रिशिरोभैरव का प्रभाव मालूम होता हैं। दोनों में काफी कुछ साम्य हैं। दोनों देवताओं की उपासना विशेषतः काश्मीरदेश में की जाती थीं।

काश्मीर से प्राप्त वैकुण्ठचतुर्मूर्ति प्रतिमा

नारदविष्णु संवाद से अवतरित ३३ पटलों वाली श्रीजयाख्यसंहिता नामक पाञ्चरात्रागम मे वैकुण्ठचतुर्मूर्ति की उपासना का विशद वर्णन प्राप्त होता हैं । नारद जी से शांडिल्यऋषि ने इस संहिता को प्राप्त किया तथा नाना ऋषिगणों को इसका उपदेश दिया। श्रीजयाख्यसंहिता के षष्टपटल में वैकुण्ठभट्टारक का ध्यान उल्लिखित हैं:-

अनादिनिधनं देवं जगत्स्रष्टारमीश्वरम् ।
ध्यायेच्चतुर्भुज विप्र शङ्खचक्रगदाधरम् ॥
चतुर्वक्त्रं सुनयनं सुकान्तं पद्मपाणिनम् । वैकुण्ठं नरसिह्मास्यं वाराहं कपिलाननम् ॥
शुक्लं खगेश्वरारूढं सर्वाभरणभूषितम् । सर्वलक्षणसंपन्नं माल्याम्बरधरं विभुम् ॥किरीटकौस्तुभधरं कर्पूरालिप्तविग्रहम् ।सूर्यायुतसहस्राभं सर्वदेवनमस्कृतम् ॥ (ज.सं.६.७३-७६)

वैकुण्ठचतुर्मूर्ति चतुर्मुख ,चतुर्हस्त तथा शक्तिचतुष्टय से युक्त होते हैं। वराह, सौम्य, नृसिंह तथा उग्रकपिल यह श्रीभगवान के चतुर्मुख हैं । अपने चतुरहस्तो में शंख,चक्र,गदा तथा पद्म धारण करते हैं। उत्तान अवस्था में पद्मासनस्थ अथवा गरुडासन के ऊपर विराजमान होते हैं। जया, माया, लक्ष्मी तथा कीर्ति भगवान की चार अंतरंग शक्तियां हैं । भगवान कौस्तुभमणि, वनमाला,नानारत्नजड़ित किरीट तथा कुण्डल धारण करते हैैं। पार्श्व में चक्रपुरुष तथा गदादेवि हैं। जयाख्यसंहिता का रचनाकाल ५ शताब्दी हैं अतः वैकुण्ठचतुर्मूर्ति के उपासनासंप्रदाय का उदय गुप्तकाल में सिद्ध होता हैं । वैकुण्ठचतुर्मूर्ति की गुप्तकालीन प्रतिमाओं पर गान्धार शैली का प्रभाव दृश्य हैं । कुछ पाश्चात्य विद्वान हेलेनिस्टिक प्रभाव के भी पक्षधर है परन्तु यह मत समीचीन नहीं हैं ।

गुप्तकालीन वैकुंठभट्टारक प्रतिमा
गान्धारशैली प्रभावित प्रतिमा

अग्निपुराण, विष्णुधर्मोत्तरपुराण तथा शिल्पशास्त्रग्रंथ रूपमण्डन में भी वैकुण्ठविष्णु का उल्लेख मिलता हैं । भगवान विष्णु के वैकुण्ठचतुर्मूर्ति स्वरूप की उपासना विशेषतः से काश्मीरदेश प्रचलित थीं । ८-१२ शताब्दी में वैकुण्ठचतुर्मूर्ति की उपासना कश्मीरदेश में चरम पर थीं । १२ शताब्दी में रचित कल्हण की राजतरङ्गिणी में भी काश्मीरनरेश अवन्तीवर्मन द्वारा वैकुंठनारायण की प्राण प्रतिष्ठा का उल्लेख मिलता हैं‌। वैकुण्ठचतुर्मूर्ति कर्कोटराजवंश तथा उत्पल राजवंश के राजकीयदेव (कुलदेवता) थे । १३ शताब्दी में मलेच्छजाहिलो के आगमन के साथ हीं वैकुंठभट्टाराक की उपासना का ह्रास होने लगा । कई मंदिरों को तोड़ा गया , स्वर्णादि से निर्मित प्रतिमाओं को गलाकर आभूषणआदि बनाए गए । पाषाणप्रतिमाओं को खंडित किया गया। वैकुंठनाथ के उपासकों की निर्ममहत्याएं की गई । उपासना सम्बन्धी ग्रंथों को नष्ट कर दिया गया। इन्हीं मलेच्छजाहिलो के अत्याचारों के कारण १४-१५ शताब्दी तक वैकुण्ठचतुर्मूर्ति की उपासना काश्मीर देश से लुप्त प्राय हो गई । काश्मीर के अलावा उत्तरभारत के अन्य स्थानों पर तथा नेपालदेश में भी वैकुण्ठनाथ की उपासना होती थीं।

नेपालदेशीय वैकुण्ठनाथप्रतिमा

उत्तरभारत में अनेकों स्थानों पर वैकुण्ठचतुर्मूर्ति स्वरूप की प्रतिमाएं मिलती हैं विशेषकर गुजरात, राजस्थान तथा मध्य प्रदेश में । ११७० ईसवी में एक प्रतिमा चम्बा घाटी में प्रतिष्ठत की गई थीं । चंदेलों द्वारा १० शताब्दी में निर्मत खुजराहों का लक्ष्मणमंदिर भी वैकुण्ठचतुर्मूर्ति को समर्पित हैं।

लक्ष्मणमन्दिर के गर्भग्रह में स्थापित वैकुंठचतुर्मूर्ति

खुजराहों के कंदरियामहादेव मंदिर में भी वैकुण्ठ नारायण की प्रतिमा प्राप्त होती हैं।

कंदरियामहादेवमन्दिर

गुजरात के सिद्धनाथ महादेव मंदिर में भी वैकुण्ठचतुर्मूर्ति की प्रतिमा हैं । यह सिद्ध करता है कि मध्यभारत में भी कभी वैकुण्ठचतुर्मूर्ति की उपासना का प्रचलन रहा होगा अस्तु ।
ॐ विश्वरूपाय विद्महे विश्वातीताय धीमहि तन्नो विष्णु: प्रचोदयात् ॥

सिद्धकुञ्जिकास्तोत्र के रहस्य

ॐ या चण्डी मधुकैटभादिदैत्यदलनी माहिषोन्मादिनी या धूम्रेक्षणचण्डमुण्डमथनी या रक्तबीजाशनी ।
शक्तिः शुम्भनिशुम्भदैत्यदलनी या सिद्धिलक्ष्मीः परा सा देवी नवकोटिमूर्तिसहिता मां पातु विश्वेश्वरी ॥

सिद्धकुञ्जिकास्तोत्र एक अत्यन्त रहस्यमय तथा क्षिप्रफल प्रदान करने वाला स्तोत्रराज हैं। इस स्तोत्र की साधना सर्वाम्नाय से की जा सकती है , इसी कारण इस स्तोत्र के विभिन्न आम्नायगत पाठभेद हैं । यथा उत्तराम्नाय के साधक डामरतंत्रोक्त सिद्धकुञ्जिकास्तोत्र का पाठ करते है और पश्चिमाम्नाय के साधक गौरीतंत्रोक्त सिद्धकुञ्जिकास्तोत्र का पाठ करते हैं । सर्वसाधारण साधकों में रुद्रयामलतंत्रोक्त सिद्धकुञ्जिकास्तोत्र के पाठ का प्रचलन हैं । साथ ही महाविद्या के उपासक गण अपनी अपनी उपास्य महाविद्या से संबंधित सिद्धकुञ्जिकास्तोत्र का पाठ करते हैं । भगवति काली के उपासक कालीतंत्रोक्तसिद्धकुञ्जिकास्तोत्र तथा भगवति बगलामुखी के उपासक बगलातंत्रोक्त सिद्धकुञ्जिकास्तोत्र का पाठ करते हैं। बृहदमहासिद्धकुञ्जिकास्तोत्र नाम से भी इस स्तोत्र का एक पाठ मिलता हैं जो अनिरुद्धसरस्वतीमंत्र तथा मातृकाक्षर से पुटित हैं। वे साधक जो पूर्ण श्रीदुर्गासप्तशती का पाठ करने में असमर्थ है मात्र सिद्धकुञ्जिकास्तोत्र के पाठ से ही दुर्गापाठ के पूर्ण फल का लाभ उठा सकते हैं । जैसा कि सिद्धकुञ्जिकास्तोत्र की पूर्वपीठीका में उल्लिखित है-

कुंजिकापाठमात्रेण दुर्गापाठफलं लभेत्‌ ॥

साथ ही साधक इस स्तोत्र के पाठ से षट्कर्मो मे भी सफलता प्राप्त कर सकता हैं।
मारणं मोहनं वश्यं स्तम्भनोच्चाटनादिकम्‌।
पाठमात्रेण संसिद्ध्‌येत् कुंजिकास्तोत्रमुत्तमम्‌ ॥
जो साधक श्रीदुर्गासप्तशती के पाठ के पूर्व इस स्तोत्र का पाठ नहीं करता उसे अभीष्टफल की प्राप्ति नहीं होती हैं। उसका पाठ जंगल में रोने के सामन होता हैं।

कुंजिका रहितां देवी यस्तु सप्तशतीं पठेत्‌।
न तस्य जायते सिद्धिररण्ये रोदनं यथा ॥

अब प्रश्न यह उठता है कि इस स्तोत्र का नाम सिद्धकुञ्जिकास्तोत्र ही क्यों हैं। इसका उत्तर हैं पूर्व काल में भगवान शिव तथा ऋषियों ने कलिकाल के आगमन पर श्रीदुर्गासप्तशती तथा नवार्णमन्त्र को किलित कर दिया अर्थात ताला/कील लगाकर निष्प्रभावी कर दिया तथा उसकी चाबी, जिसे संस्कृत में कुंजी कहते हैं इस स्तोत्र में गोपित कर दी इसी कारण इस स्तोत्र को सिद्धकुञ्जिकास्तोत्र कहा जाता हैं। जैसा कि सिद्धकुञ्जिकास्तोत्र की फलस्तुति में उल्लिखित है

इदंतु कुंजिकास्तोत्रं मंत्रजागर्तिहेतवे ॥

अर्थात यह सिद्धकुञ्जिकास्तोत्र श्रीदुर्गासप्तशती तथा नवार्णमन्त्र की जागृति के हेतु हैं । इस स्तोत्र में नवार्णमन्त्र का अर्थ भी भगवान शिव ने बताया है साथ ही साथ संक्षेप में श्रीदुर्गा के चरित्र का भी वर्णन किया हैं। इस स्तोत्र में पारद के संस्कार तथा जागरण के सूत्र भी भगवान शिव ने बताएं हैं । इसी कारण रससिद्धि में भी यह स्तोत्र सहायक हैं । इस स्तोत्र का पाठ बालकों की भूतादिग्रहपीड़ा में भी लाभदायक हैं । सिद्धकुञ्जिकास्तोत्र का उत्तम पुरश्चरण १००८ बार पाठ करके, मध्यमपुरश्चरण ३३६ बार पाठ करके तथा साधारण पुरश्चरण १०८ पाठ करके संपादित किया जा सकता हैं । साधक यदि समर्थ होवे तो पंचांगपुरश्चरण करें अन्यथा पाठमात्र करें…… अस्तु ।
ॐ अम्बेऽअम्बिकेऽम्बालिके न मा नयतिकश्चन ।
ससस्त्यश्वक: सुभद्रिकाङ्काम्पीलवासिनीम् ॥

हनुभैरव

हनुभैरव नेपाल देश में पूजित एक तान्त्रिक देवता विशेष है । हनुभैरव भैरव तथा हनुमान का मिश्रित स्वरूप है ,जो की पश्चिमाम्नाय से सम्बंधित देवता है । हनुभैरव का शवारूढ़ होना भैरवागम से संबंध दर्शाता हैं। वस्तुतः हनुभैरव भगवती सिद्धिलक्ष्मी प्रत्यङ्गिरा के भैरव है । हनुभैरव के मंत्रादि सिद्धिलक्ष्मी सम्बन्धी ग्रंथों तथा हनुभैरवपूजाविधि , हनुभैरवस्तोत्र , हनुभैरवकवच , पञ्चमुखीवीरहनुभैरवस्तोत्र इत्यादि में संग्रहित होने के कारण कुछ मात्रा में संरक्षित है अन्यथा हनुभैरव की उपासना सम्बन्धी ग्रन्थ लगभग नष्टप्राय: है इस कारण इस देवता विशेष के बारे में अत्याधिक जानकारी अनुपलब्ध है। नेपाल में हनुभैरव के ३ स्वरूप प्राप्त होते है ।

  • (१) एकमुखी त्रिशूलगदाहस्त
  • (२) नरारुढ़ एकमुखी चतुरहस्त
  • (३) मकरारूढ़ पंचमुखी दशहस्त

एकमुखी स्वरूप रक्तवर्ण , दिव्यवेशभूषा तथा त्रिशूल एवं गदा धारण किये हुए हैं। इस स्वरूप में हनुभैरव बिना किसी वाहन के दर्शाये गए हैं। हनुभैरव वैष्णव पंचमुखी हनुमान का ही शैवशाक्त रूप है। देखा जाए तो हनुभैरव शैव, वैष्णव तथा शाक्तमतों की त्रिवेणीस्वरूप ही हैं। मध्यकाल में हनुमान की उपासना अपने उत्कर्ष पर थी केवल साधक समाज में मध्य में नहीं अपितु जनसामान्य के मध्य भी, यह प्रमाणित है कि हनुमान की उपासना मध्यकालीन शैव ,वैष्णव तथा शाक्त अपने अपने संप्रदायानुसार किया करते थे । सम्भव हैं कि मध्यकालीन तांत्रिको ने पंचमुखीहनुमान से प्रेरित होकर हनुभैरव की उपासना का प्रारम्भ नेपाल में किया होगा अस्तु !!!

ॐ अ॒स्मे रु॒द्रा मे॒हना॒ पर्व॑तासो वृत्र॒हत्ये॒ भर॑हूतौ स॒जोषाः॑ । यः शँस॑ते स्तुव॒ते धायि॑ प॒ज्र इन्द्र॑ज्येष्ठा अ॒स्माँ अ॑वन्तु दे॒वाः ॥

॥ गुह्यकाल्युपनिषत् ॥

अथर्ववेदमध्ये तु शाखा मुख्यतमा हि षट् ।
स्वयंभुवा याः कथिताः पुत्रायाथर्वणं प्रति ॥ १ ॥
तासु गुह्योपनिषदस्तिष्ठन्ति वरवर्णिनि ।
नामानि शृणु शाखानां तत्राद्या वारतन्तवी ॥ २ ॥ मौञ्जायनी द्वितीया तु तृतीया तार्णवैन्दवी ।
चतुर्थी शौनकी प्रोक्ता पञ्चमी पैप्पलादिका ॥ ३ ॥ षष्ठी सौमन्तवी ज्ञेया सारात् सारतमा इमाः । गुह्योपनिषदो गूढाः सन्ति शाखासु षट्स्वपि ॥ ४॥
तो एकीकृत्य सर्वास्तु मयाऽस्यां विनिवेशिताः । संहितायां साधकानामुद्धाराय वरानने ॥ ५॥
तास्ते वदामि यत् प्रोक्तं ध्यानं कुर्वन्ति देवताः । विराट्धऽयानं हि तज्ज्ञेयं महापातकनाशनम् ॥ ६ ॥ ब्रह्माण्डाद्बहिरुर्ध्वं हि महत्तत्त्वमहङ्कृतिः ।
रूपाणि पञ्चतन्मात्राः पुरुषः प्रकृतिर्नव ॥ ७ ॥ महापातालपादान्तलम्बा तस्या जयं स्मरेत् । ब्रह्माण्डार्धं कपालं हि शिरस्तस्या विभावयेत् ॥ ८ ॥ देवलोको ललाटञ्च षट्त्रिंशल्लक्षयोजनम् ।
मेरुः सीमन्तदण्डोऽस्या ग्रहरत्नसमाकुलः ॥ ९ ॥ अन्तर्वीथी नागवीथी भ्रुवावस्याः प्रकीर्तिते । शिवलोकश्च वैकुण्ठलोकः कर्णावुभौ मतौ ॥ १० ॥ लोहितं तिलकं ध्यायेन्नासा मन्दाकिनी तथा ।
चक्षुषी चन्द्रसूर्यौ च पक्ष्माणि किरणास्तथा ॥ ११ ॥ गण्डौ स्यातां तपोलोकसत्यलोकौ यथाक्रमम् । जनोलोकमहर्लोको कपोलौ परिकीर्तितौ ॥ १२ ॥ स्यातां हिमाद्रिकैलासौ तस्या देव्यास्तु कुण्डले । स्वर्लोकश्च भुवर्लोको देव्या ओष्ठाधरौ मतौ ॥ १३ ॥ दिक्पतीनां ग्रहाणाञ्च लोकाश्चाथ रदावली । गन्धर्वसिद्धसाध्यानां पितृकिन्नररक्षसाम् ॥ १४ ॥ पिशाचयक्षाप्सरसां मरीचीयायिनां तथा । विद्याधराणामाज्योष्मपाणां सोमैकपायिनाम् ॥ १५ ॥ सप्तर्षीणां ध्रुवस्यापि लोका ऊर्ध्वरदावली ।
मुखं च रोदसी ज्ञेयं द्यौर्लोकश्चिबुकं तथा ॥ १६ ॥ ब्रह्मलोको गलः प्रोक्तो वायवः प्राणरूपिणः । वनस्पतय ओषध्यो लोमानि परिचक्षते ॥ १७ ॥ विद्युद्दृष्टिरहोरात्रं निमेषोन्मेषसंज्ञकम् ।
विश्वं तु हृदयं प्रोक्तं पृथिवीपाद उच्यते ॥ १८ ॥
तलं तलातलं चैव पातालं सुतलं तथा ।
रसातलं नागलोकाः पादाङ्गुल्यः प्रकीर्तिताः ॥ १९ ॥ वेदा वाचः स्यन्दमाना नदा नद्योऽमिता मताः ।
कला काष्ठा मुहूर्ताश्च ऋतवोऽयनमेव च ॥ २० ॥
पक्षा मासास्तथा चाब्दाश्चत्वारोऽपि युगाः प्रिये । कफोणिर्मणिबन्धश्च तद्रुकटिबन्धनाः ॥ २१ ॥
प्रपदाश्च स्फिचश्चैव सर्वाङ्गानि प्रचक्षते ।
वैश्वानरः कालमृत्युजिह्वात्रयमिदं स्मृतम् ॥ २२ ॥ आब्रह्मस्तम्बपर्यन्तं तनुमस्याः प्रचक्षते ।
प्रलयो भोजने कालस्तृप्तिस्तेन च नासिका ॥ २३ ॥ ज्ञेयः पार्श्वपरीवर्तो महाकल्पान्तरोद्भवः ।
विराड्रूपस्य ते ध्यानमिति संक्षेपतोऽर्पितम् ॥ २४ ॥ तस्याः स्वरूपविज्ञानं सपर्या परिकीर्तितः ।
तदेव हि श्रुतिप्रोक्तमवधारय पार्वति ॥ २५ ॥ यथोर्णनाभिः सूत्राणि सृजत्यपि गिलत्यपि ।
यथा पृथिव्यामोषध्यः सम्भवन्ति गिलन्त्यपि ॥ २६ ॥ पुरुषात् केशलोमानि जायन्ते च क्षरन्त्यपि ।
उत्पद्यन्ते विलीयन्ते तथा तस्यां जगत्यपि ॥ २७ ॥ ज्वलतः पावकाद् यद्वत् स्फुलिङ्गाः कोटिकोटिशः । निर्गत्य च विनश्यन्ति विश्वं तस्यास्तथा प्रिये ॥ २८ ॥ ऋचो यजूंषि सामानि दीक्षा यज्ञाः सदक्षिणाः । अध्वर्युर्यजमानश्च भुवनानि चतुर्दश ॥ २९ ॥ ब्रह्मविष्ण्वादिका देवा मनुष्याः पशवो यतः । प्राणापानौ ब्रीहयश्च सत्यं श्रद्धा विधिस्तपः ॥ ३० ॥ समुद्रा गिरयो नद्यः सर्वे स्थावरजङ्गमाः ।
विसृज्येमानि सर्गादौ त्वं प्रकाशयसे ततः ॥ ३१ ॥ जङ्गमानि विधायान्धे विशत्यप्रतिभूतकम् ।
नवद्वारं पुरं कृत्वा गवाक्षाणीन्द्रियाण्यपि ॥ ३२ ॥
सा पश्यत्यत्ति वहति स्पृशति क्रीडतीच्छति ।
शृणोति जिघ्रति तथा रमते विरमत्यपि ॥ ३३ ॥
तया मुक्तं पुरं तद्धि मृतमित्यभिधीयते ॥ ३४ ॥
ये तपः क्षीणदोषास्ते नैव पश्यन्ति भाविताम् । ज्योतिर्मयीं शरीरेऽन्तर्ध्यायमानां महात्मभिः ॥ ३५ ॥ बृहच्च तद्दिव्यमचिन्त्यरूपं सूक्ष्माच्च तत् सूक्ष्मतरं विभाति । दुरात् सुदूरे तदिहास्ति किञ्चित् पश्येत्त्विहैतन्निहितं गुहायाम् ॥ ३६॥
न चक्षुषा गृह्यते नापि वाचा नान्यैर्योगैर्न हि सा कर्मणा वा । ज्ञानप्रसादेन विशुद्धसत्त्वः ततस्तु तां पश्यति निष्कलाञ्च ॥ ३७॥
यथा नद्यः स्यन्दमाना समुद्रे गच्छन्त्यस्तं नामरूपे विहाय । तथा विद्वान् नामरूपाद् विमुक्तः परात् परां जगदम्बामुपैति ॥ ३८ ॥
सर्वे वेदा यत्पदमामनन्ति तपांसि सर्वाणि च यद् वदन्ति । यदिच्छन्तो ब्रह्मचर्यं चरन्ति तत्ते पदं संग्रहेण ब्रवीमि ॥ ३९ ॥
सैवैतत् एषैवालम्बनं श्रेष्ठं सैषैवालम्बनं परम् । एषैवालम्बनं ज्ञात्वा ब्रह्मलोके महीयते ॥ ४० ॥ इन्द्रियेभ्यः परा ह्यर्था ह्यर्थेभ्यश्च परं मनः ।
मनसस्तु परा बुद्धिर्बुद्धेरात्मा महान् परः ॥ ४१ ॥ महतः परमव्यक्तमव्यक्तात् पुरुषः परः ।
पुरुषात्तु परा देवी सा काष्ठा सा परा गतिः ॥ ४२ ॥ यथोदकं गिरौ सृष्टं समुद्रेषु विधावति ।
एवं धर्मान् पृथक् पश्यंस्तामेवानुविधावति ॥ ४३ ॥ एका गुह्या सर्वभूतान्तरात्मा एकं रूपं बहुधा या करोति । तामात्मस्थां येऽनुपश्यन्ति धीरास्तेषां सुखं शाश्वतं नेतरेषाम् ॥ ४४ ॥
न तत्र सूर्यो भाति न चन्द्रतारकं नेमा विद्युतो भान्ति कुतोऽयमग्निः । तामेव भान्तीमनुभाति सर्वं तस्या भासा सर्वमिदं विभाति ॥ ४५ ॥
यस्याः परं नापरमस्ति किञ्चिद् यस्या नाणीयो न ज्यायोऽस्ति किञ्चित् । वृक्ष इव स्तब्धा दिवि तिष्ठत्येका यदन्तः पूर्णामवगत्यपूर्णः ॥ ४६ ॥ सर्वाननशिरोग्रीवा सर्वभूतगुहाशया ।
सर्वत्रस्था भगवती तस्मात् सर्वगता शिवा ॥ ४७ ॥ सर्वतः पाणिपादान्ता सर्वतोऽक्षिशिरोमुखा ।
सर्वतः श्रुतिमत्येषा सर्वमावृत्य तिष्ठति ॥ ४८ ॥ सर्वेन्द्रियगुणाभासा सर्वेन्द्रियविवर्जिता ।
सर्वेषां प्रभुरीशानी सर्वेषां शरणं सुहृत् ॥ ४९ ॥
नवद्वारे पुरे देवी हंसी लीलायत बहिः ।
ध्येया सर्वस्य लोकस्य स्थावरस्य चरस्य च ॥ ५० ॥ अपाणिपादा जननी ग्रहीत्री पश्यत्यचक्षुः सा शृणोत्यकर्णा । सा वेत्ति वेद्यं न च तस्यास्तु वेत्ता तामाहुरग्र्यां महतीं महीयसीम् ॥ ५१ ॥
सा चैवाग्निः सा च सूर्यः सा वायुः सा च चन्द्रमाः ।
सा चैव शुक्रः सा ब्रह्म सा चापः सा प्रजापतिः ।
सा चैव स्त्री सा च पुमान् सा कुमारः कुमारिका ॥५२॥ ऋचो अक्षरे परमे व्योमन् यस्यां देवा अधिरुद्रा निषेदुः । यस्तां न वेद किमृचा करिष्यति ये तां विदुस्त इमे समासते ॥ ५३ ॥
छन्दांसि यज्ञाः क्रतवो व्रतानि भूतं भव्यं यच्च वेदा वदन्ति । सर्वं देवी सृजते विश्वमेतत् तस्याश्चान्यो मायया संनिरुद्धः ॥ ५४ ॥
मायां तु प्रकृतिं विद्यात् प्रभु तस्या महेश्वरीम् ।
अस्या अवयवैः सूक्ष्मै र्व्याप्तं सर्वमिदं जगत् ॥ ५५ ॥ या देवानां प्रभवा चोद्भवा च विश्वाधिपा सर्वभूतेषु गूढो । हिरण्यगर्भ जनयामास पूर्वं सा नो बुद्ध्या शुभया संयुनक्तु ॥ ५६ ॥
सूक्ष्मातिसूक्ष्मं पलिलस्य मध्ये विश्वस्य स्रष्ट्रीमनेकाननाख्याम् ।
विश्वस्य चैकां परिवेष्टयित्रीं ज्ञात्वा गुह्यां शान्तिमत्यन्तमेति ॥ ५७ ॥
सा ह्येव काले भुवनस्य गोप्त्री विश्वाधिपा सर्वभूतेषु गूढा । यस्यां मुक्ता ब्रह्मर्षयोऽपि देवाः ज्ञात्वा तां मृत्युपाशाञ्छिनत्ति ॥ ५८ ॥
घृतात् परं मण्डमिवातिसूक्ष्मं ज्ञात्वा कालीं सर्वभूतेषु गूढाम् । कल्पान्ते वै सर्वसंहारकर्त्रीं ज्ञात्वा गुह्यां मुच्यते सर्वपापैः ॥ ५९ ॥
एषा देवी विश्वयोनिर्महात्मा सदा जनानां हृदि सन्निविष्टा । हृदा मनीषा मनसाभिक्लृप्ता ये त्वां विदुरमृतास्ते भवन्ति ॥ ६० ॥
यदा तमस्तत्र दिवा न रात्रिेन सन्न चासद् भगवत्येव गुह्या । तदक्षरं तत्सवितुर्वरेण्यं प्रज्ञा च तस्याः प्रसृता परा सा ॥ ६१ ॥
नैनामूर्ध्वं न तिर्यक् च न मध्यं परिजग्रभत् ।
न तस्या प्रतिमाभिश्च तस्या नाम महद्यशः ॥ ६२ ॥
न सदृशे तिष्ठति रूपमस्या न चक्षुषा पश्यति कश्चिदेनाम् । हृदा मनीषा मनसाभिक्लृप्तां य एनां विदुरमृतास्ते भवन्ति ॥ ६३ ॥
भूयश्च सृष्ट्वा त्रिदशानवेशी सर्वाधिपत्यं कुरुते भवानि । सर्वा दिशश्चोर्ध्वमधश्च तिर्यक् प्रकाशयन्ती भ्राजते गुह्यकाली ॥ ६४ ॥
नैव स्त्री न पुमानेषा नैव चेयं नपुंसका । यद्यच्छरीरमादत्ते तेन तेनैव युज्यते ॥ ६५ ॥
धर्मावहां पापनुदां भगेशीं ज्ञात्वात्मस्थाममृतां विश्वमातरम् । तामीश्वराणां परमां महेश्वरी तां देवतायाः परदेवतां च ॥
पतिं पतीनां परमां पुरस्ताद् विद्यावतां गुह्यकालीं मनीषाम् ॥ ६६ ॥
तस्या न कार्यं करणं न विद्यते न तत्समा चाप्यधिका च दृश्यते । पराऽस्याः शक्तिर्विविधैव श्रूयते स्वाभाविकी ज्ञानबलक्रिया च ॥ ६७ ॥
कश्चिन्न तस्याः पतिरस्ति लोके न चेशिता नैव तस्याश्च लिङ्गम् ।
सा कारणं कारणकारणाधिपा नास्याश्च कश्चिज्जनता न चाधिपः ॥ ६८ ॥
एका देवी सर्वभूतेषु गूढा व्याप्नोत्येतत् सर्वभूतान्तरस्था । कर्माध्यक्षा सर्वभूताधिवासा साक्षिण्यैषा केवला निर्गुणा च ॥ ६९ ॥
वशिन्यका निष्क्रियाणां बहूनाम् एकं बीजं बहुधा या करोति ।
नानारूपा दशवक्त्रं विधत्ते नानारूपान् या च बाहून् बिभर्ति ॥ ७० ॥
नित्या नित्यानां चेतना चेतनानाम् एका बहूनां विदधाति कामान् । तत्कारणं सांख्ययोगाधिगम्यं ज्ञात्वा देवीं मुच्यते सर्वपाशैः ॥ ७१ ॥
या वै विष्णु पालने संनियुङ्क्ते रुद्रं देवं संहृतौ चापि गुह्या । तां वै देवीमात्मबुद्धिप्रकाशां मुमुक्षुर्वै शरणमहं प्रपद्ये ॥७२॥ निष्कलां निष्क्रियां शान्तां निरवद्यां निरञ्जनाम् । बह्वाननकरां देवीं गुह्यामेकां समाश्रये ॥ ७३ ॥
इयं हि गुह्योपनिषत् सुगूढा यस्या ब्रह्मा देवता विश्वयोनिः । एतां जपंश्चान्वहं मतियुक्तः सत्यं सत्यं ह्यमृतः सम्बभूव ॥ ७४ ॥
वेदवेदान्तरयोर्गुह्यं पुराकल्पे प्रचोदितम् ।
नाप्रशान्ताय दातव्यं नाशिष्याय च वै पुनः ॥ ७५ ॥ यस्य देव्यां परा भक्तिर्यथा देव्यां तथा गुरौ ।
तस्यैते कथिता ह्यर्थाः प्रकाशन्ते महात्मनः ॥ ७६ ॥
॥ महाकाल उवाच ॥
गुह्योपनिषदित्येषा गोप्यात् गोप्यतरा सदा ।
चतुर्थ्यश्चापि वेदेभ्य एकीकृत्यात्र योजिता ॥ ७७ ॥
उपदिष्टा च सर्गादौ सर्वानेव दिवौकसः ।
एवंविधं च यद्ध्यानमेवंरूपं च कीर्तितम् ॥ ७८ ॥
सा सपर्या परिज्ञेया विधानमधुना शृणु ।
सोऽहमस्मीति प्रथमं सोऽहमस्मि द्वितीयकम् ॥ ७९ ॥ तदस्म्यहं तृतीयं च महावाक्यत्रयं भवेत् ।
आद्यान्येतानि वाक्यानि छन्दांसि परिचक्षते ॥ ८० ॥
देवता गुह्यकाली च रजःसत्त्वतमोगुणाः ।
सर्वेषां प्रणवो बीजं हंसः शक्तिः प्रकीर्तिता ॥ ८१ ॥
मकारश्चाप्यकारश्च ह्युकारश्चेति कीलकम् ।
एभिर्वाक्यत्रयैः सर्वं कर्म प्रोतं विधानतः ॥ ८२ ॥
अनुक्षणं जपंश्चैव निश्चयः परिकीर्तितः । द्वितीयोपासकानां हि परिपाटीयमीरिता ॥ ८३ ॥
एवं चाप्यातुरो यस्तु मनुष्यो भक्तिभावितः ।
विमुक्तः सर्वपापेभ्यः कैवल्यायोपकल्पते ।
सर्वाभिः सिद्धिभिस्तस्य कि कार्य कमलानने ॥ ८४ ॥
॥श्रीमहाकालसंहितायांगुह्यकाल्युपनिषत्सम्पूर्णम् ॥

त्रिशिरोभैरव

त्रिशिरोभैरव भगवान् परभैरव का सगुण रूप हैं । इनकी उपासना दक्षिणस्त्रोत के तंत्रों के अनुसार की जाती हैं ।’त्रिशिरोभैरवतंत्र’ जो कि अब अप्राप्य हैं इनकी ही उपासना से संबद्ध दक्षिणस्त्रोतागमग्रंथ था । त्रिशिरोभैरवतंत्र के कुछ अंशों को महामाहेश्वर अभिनवगुप्तपादाचार्य अपने तंत्रालोक में उद्धृत करते हैं । महामाहेश्वरअभिनवगुप्त की ही शिष्य परम्परा में उत्पन्न महामाहेश्वर जयरथाचार्य अपने मृत्युञ्जयभट्टारकतंत्र के नेत्रोद्योतभाष्य में त्रिशिरोभैरव को दक्षिणस्त्रोत से संबद्ध बताते हैं ।

” दक्षिणस्रोतःसमुत्थेषु
स्वच्छन्दचण्डत्रिशिरोभैरवादिषु भेदितं भेदसंहारित्वेन दीप्तविशिष्टरूपतया प्रतिपादितं भगवतो मृत्युजितः स्वरूपं वक्ष्यामि ॥ (नेत्रतंत्र के १०वे अध्याय )

रूद्रयामल के अंश विज्ञानभैरवतंत्र में भी दो बार त्रिशिरो भैरव का उल्लेख मिलता हैं ।

किं वा नवात्मभेदेन भैरवे भैरवाकृतौ ।
त्रिशिरोभेदभिन्नं वा किं वा शक्तित्रयात्मकम् ॥ ( विज्ञानभैरव श्लोक क्र० ३ )
तत्त्वतो न नवात्मासौ शब्दराशिर्न भैरवः ।
न चापि त्रिशिरा देवो न च शक्तित्रयात्मकः ॥ (विज्ञानभैरव श्लोक क्र०११ )

इन प्रमाणों से इतना तो सिद्ध होता हैं कि ९शती के पूर्व से कश्मीर देश में इनकी उपासना का बहुत प्रचार था जो कि यवन आक्रमणों के कारण १४ शती तक क्षीण होता चला गया । त्रिशिरो भैरव के मन्दिरों को यवनो द्वारा नष्ट करने का उल्लेख मिलता हैं । त्रिशिरोभैरव के तीन मुख घोर, अघोर तथा घोरतर हैं । त्र्यंबक भगवान् अपने हस्त चतुष्टय में त्रिशूल, कपाल , अमृतकमण्डल तथा रुद्राक्षमालिका धारण करते हैं । भगवान् की शक्ति त्रिशिरादेवी हैं । साथ हीं अनुचर वृषभ तथा श्वान हैं । कुछ आधुनिक इंडोलॉजीस्ट विद्वानों के अनुसार भगवान् दत्तात्रेय की मूर्तियों पर त्रिशिरोभैरव मूर्ति का प्रभाव हैं । वैसे देखा जाए तो दोनों देवताओं की प्रतिमाओं में कुछ हद तक साम्य दिखाई पड़ाता हैं । दोनों ही तीन मुख वाली हैं, दोनों के साथ गौवंश तथा श्वान दिखाईं पड़ते हैं तथा आयुधों में भी साम्य हैं । अंतर इतना हैं की त्रिशिरोभैरव के हस्त में कपाल हैं और दत्तगुरु के हस्त में नहीं अस्तु ।

कश्मीर से प्राप्त खंडित त्रिशिरोभैरव प्रतिमा

त्र्य॑म्बकं यजामहे सुग॒न्धिं पु॑ष्टि॒वर्ध॑नम् ।
उ॑र्वारु॒कमि॑व॒ बन्ध॑नान्मृ॒त्योर्मु॑क्षीय॒ मामृता॑त् ॥ हम त्रिशिरोभैरव का यजन करते हैं जो पुष्टि का वर्धन करने वाले है। जिस प्रकार खरबूजा पकने पर लता के बंधन से छूटता हैं उसी प्रकार हम मृत्यु के बंधन से छूट कर अमरत्व प्राप्त करें ।

mahAchInakrama tArA

Some goddesses are commonly worshipped in Buddhist and Hindu Tantric traditions. tArA, vajrayogini, ChinnamastA and vajravArAhI are best examples. Usually it is not easy to trace how and when these adaptations took place. In the case of mahAchInakrama tArA , a special form of tArA, it has long been suspected that the goddess was imported from the Buddhist pantheon into the Hindu tArAkula pantheon.Buddhist mahAchInakrama tArA is iconographically identical to one of several existing forms of tArA described in tArAkula tantras. Same mantra is employed for both goddesses. Colophon of bhaTTAchArya’s edition of sAdhanAmAlA states that nAgArjuna took the tradition of mahAchInakrama tArA from the inhabitants of bhoTa country (भोटेषु उद्धृतम् ). He identified bhoTadesha (Tibet ) with mahAchIna and concluded that mahAchInakramatArA worshipped by native inhabitants of Tibet probably professing the Bon religion of Tibet, entered the Buddhist pantheon with the Tantric nAgArjuna in the 7CE. Western scholar Tucci identified mahAchInadesha with kaNvara in the upper Sutlej valley.bhAratI held it to be included in the entire region to the north of the himAlaya, Tibet and at least parts of Mongolia and western China. BAgachi thought it to refer to Mongolia. ShAstrI and Weller held that it refers to China. Sarkar interpreting shaktisaNgamataNtra identified mahAchIna with Tibet .
mahAchInakramatArA is said to have been introduced to India by vashiShTa, who received the transmission from buddha in mahAchInadesha..

मयि आराधनाचारं बुद्धरूपी जनार्दनः ॥
जगामाचारविज्ञानवाञ्छया बुद्धरूपिणम् ।
ततो गत्वा महाचीनदेशे ज्ञानमयो मुनिः ॥
इति ब्रह्मयामले
बौद्धदेशेऽथर्ववेदे महाचीने सदा ब्रज |
तत्र गत्वा महाभावं विलोक्य मत्पदाम्बुजम् ॥
इतिरुद्रयामले

rudrayAmala and brahmayAmala have famous story of buddhavashiShTha vRRittAntaH. brahmA’s son vashiShTa, who worshipped the goddess tArA with austerities and vedic path unsuccessfully for a long time, is advised by the goddess herself to go to the mahAchInadesha and follow the atharvanic practice of left hand tArAkula. An intresting form of godess is discribed in buddhavashiShThavRRittAntaH

सा देवी परमा शक्तिः सर्वसङ्कटतारिणी । कोटिसूर्यप्रभा नीला चन्द्रकोटिसुशीतला ॥ स्थिरविद्युल्लताकोटिसदृशी कालकामिनी । सर्वस्वरूपा सर्वाद्या धर्माधर्मविवर्जिता ॥ शुद्धचीनाचाररता शक्तिचक्रप्रवर्तिका । अनन्तानन्तमहिमा संसाराणवतारिणी ॥
बुद्धेश्वरी बुद्धरूपा अथर्ववेदशाखिनी ॥
सा पाति जगतां लोकां स्तस्या कर्म चराचरम् ॥

Words shuddhachInAchAraratA , buddheshvarI, buddharUpA and atharvavedashAkhinI are to be noticed .
(१) shuddhachInAchAraratA – One who is worshiped by chInAchAra
(२) buddheshvarI- Deity worshiped by buddha
(३) buddharUpA – One having form of buddha
(४) atharvavedashAkhinI- Deity Belonging to branch of atharvaveda.
Intrestingly a text tAropaniShat is there belonging to saubhAgya kANDa of atharvaveda.This upnishad is solo shrutipramANa for tArA worship . click here to read tAropaniShat Teachings of buddha to vashiShTha is well-preserved in tArAkula text mahAchInakramasAra tantra alias AchArasAra tantra.
click here to download mahAchInakramasAra manuscript

Buddhist mahAchInakrama tArA bears akShobhya on her head. This is because the deities of the vajrayAna pantheon are considered emanations of five families of buddhas ( paNchatathAgatakula). In buddhist iconography of tArA he is desipated as buddha .

Nepalese Sketch of tArA

tArAkula discription of akShobhya on head of tArA is unusual and requires explanation. akShobhya is interpreted as an epithet of shiva. According to toDalatantra, shiva is called ‘ unshakeable’ because he drank the deadly halAhala poison without agitation .akShobhya is genraly decipated as having the form of a snake or akShobhya shiva sitting on a snake on TArA’s head. While the snake is absent from the Buddhist images. In the tArAkula tradition akShobhya also figures as the RiShi of tArAmaNtra .

tArA with akShobhya

The bone ornaments (paNchamudrA) of the goddess were interpreted as a garland of five skulls on her forehead . Buddhist kartRRi appears as a kind of dagger with a diamond sceptre on its handle, in contrast to its tArAkula representation as a pair of scissors .
In Buddhist sAdhanAmAlA goddess’s mUla mantra is given as OM hrIM trIM hUM phaT in Buddhist tradition , tArAkula tradition has preserved the variant strIM for trIM. The same mantra is employed for ekajaTI who shares many iconographical characteristics with mahAchInakramatArA . The mantra is said to grant eloquence and turn the yogin into a great poet. This must be the effect of the seed syllable trIM contained in it, which, according to the passage produces similar results when recited by itself. Meditative verses for mahAchIna kramatArA are

प्रत्यालीढपदां घोरां मुण्डमालाप्रलम्बिताम् ।
खर्वलम्बोदरां भीमां नीलनीरजराजिताम् ॥१॥
त्र्यम्बकैकमुखां दिव्यां घोराट्टहासभासुराम् ।
सुप्रहृष्टां शवारूढां नागाष्टकविभूषिताम् ॥२॥
रक्तवर्तुलनेत्रां च व्याघ्रचर्मावृतां कटौ ।
नवयौवनसम्पन्नां पञ्चमुद्राविभूषिताम् ॥३॥
ललज्जिह्वां महाभीमां सदंष्ट्रोत्कटभीषणाम् |
खड्गकर्त्रिकरां सव्ये वामोत्पलकपालधाम् ॥४॥
पिङ्गोग्रैकजटां ध्यायात् मौलावक्षोभ्यभूषिताम् ।
भावनाचलनिष्पत्तौ भवेद् योगी महाकविः ॥५॥

To be continued…………

॥ श्रीसूर्यभद्रमंडलम् ॥

सूर्यभद्रमंडलम् का निर्माण सूर्य देवता सम्बन्धी धार्मिक अनुष्ठानों में किया जाता हैं । सौर सम्प्रदाय के लोप के साथ ही सूर्यभद्रमण्डल के निर्माण तथा पूजन का क्रम दुर्लभ हो चला । सौरमत में उपरोक्त मण्डल का निर्माण तथा पूजन सौर दीक्षा, सौर प्रतिष्ठा तथा सौर उत्सव (रथसप्तमी आदि) के समय किया जाता था । भद्रमार्तण्डकार की ” सूर्य व्रतेषु सर्वेषु शस्यते मण्डलम्त्विदम् ” उक्ति से यह स्पष्ट हो जाता हैं ।
सूर्यभद्रमंडलम् रेखाभेद से दो प्रकार का होता हैं ।
दोनों प्रकार के मंडलों को कृष्ण, रक्त, पीत, श्वेत तथा हरित इन पांच रंगों से भरा जाता हैं परन्तु रंग विन्यास में भेद हैं। ( चित्रों के अध्ययन से पाठक सरलता से अंतर ज्ञात कर सकते हैं ।) मध्य में केसर तथा कर्णिकायुक्त अष्टदलकमल का निर्माण किया जाता हैं। इसी अष्टदलकमल के मध्य परब्रह्मरूप सूर्य की अष्टग्रहों के साथ पूजा की जाती हैं। बाह्यभाग में भगवान सूर्य की द्वादशमूर्तियों का निर्माण व्योमरूप में किया जाता हैं। इन्हीं द्वादश चित्रों में प्रत्येक मासाधिपति सूर्यमूर्ति की पूजा की जाती हैं। अन्य कोष्ठको मे सूर्य के अंगायुध तथा परिवारदेवताओं की पूजा की जाती हैं ।
(१) विंशतिरेखात्मकसूर्यभद्रमंडलम्
इस प्रकार के मंडल का निर्माण २०×२० रेखाओं से किया जाता हैं।

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(२) एकविंशतिरेखात्मकसूर्यभद्रमंडलम्– इस प्रकार के मंडल का निर्माण २१×२१ रेखाओं से किया जाता हैं।

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भगवान सूर्य के ध्यान के साथ ही लेख समाप्त किया जाता हैं। रक्ताब्जयुग्माभयदानहस्तं केयूरहाराङ्गदकुण्डलाढ्यम्। माणिक्यमौलिं दिननाथमीडे बन्धूककान्तिं विलसत्त्रिनेत्रम् ॥

नमो हेरम्बभैरवाय

हेरम्बभैरव गणपति का अत्यन्त गोपनीय भैरवस्वरूप हैं । हेरम्बभैरव का क्षिप्रसिद्धिप्रद दशाक्षरमंत्र द्वादशसहस्र श्लोकों वाले ब्रह्मयामल के ७६ पटल में निर्देशित हैं । हेरम्बभैरव दिगम्बर ,कपालधारण करने वाले, चतुर्हस्तीमुख तथा दश भुजाओं वाले हैं । जो महामूषकप्रेत पर आरूढ़ हैं। हेरम्बभैरवी इनकी शक्ति है जो कि इन्हीं के समान स्वरूप वाली हैं। हेरम्बभैरव का मण्डल अनेकों योगिनीगण से शोभित हैं । हेरम्बभैरव की साधना गाणपत्यवाममार्ग से की जाती हैं।

समयाचारसारम्

( स्वलिखित लघुतन्त्रकथा )

सायं काल से पूर्व कुछ अपराह्न का समय था कुलमार्तण्डदेव पश्चिमगामी हो चले थे ।
उज्जयिनी के हरसिद्धिपीठ पर महाभैरव ओर उनके शिष्यगण भगवति हरसिद्धि के दर्शन का लाभ ले रहे थे । मन्दिर के मध्य भाग की छत पर विशाल श्रीचक्र छत्राकाररूप में स्थापित था। इसी चक्र के नीचे बैठे गुरु ओर शिष्य गणों में वार्तालाप शुरू हुआ । कालभद्रभैरव ने गुरुवरमहाभैरव को नमस्कार किया तथा विनम्रता से पूछा हे भगवन् आपके श्री मुख से हमने पूर्व में श्रीविद्या के आनन्दभैरवमत , हयग्रीवमत तथा दक्षिणामूर्तिमत का ज्ञान प्राप्त किया अब आप समयाचारमत पर अपनी कुलमयवाणी से हम शिष्यो को कृतार्थ करे । अन्य शिष्यो ने भी कालभद्रभैरव की विनय का अनुमोदन किया । तब महाभैरव कुछ समय मौन रहे और कहने लगे श्रीविद्या के समयाचारमत के सिद्धांतो का सार कहता हूं जो इस प्रकार का ज्ञान रख ता है तथा उपासना करता है वह निश्चित ही शिव होता है । समय तथा शक्ति को समया कहा जाता है दोनो के साम्य को समयमत तथा समयमत के पथिक को समयाचारी । समयाचार में शिव तथा शक्ति में पूर्णतः समान है शेष और शेषी नहीं । समयाचारमार्ग पूर्णतः आंतरिक है, इसमें भगवति त्रिपुरा की उपासना दहराकाश में होती हैं । समयाचारी साधक समस्त बाह्य कर्मो को चित्ताकाश मेँ मानसिक रूप से करते है। इस पर द्रविड़शिष्य रामलिंगभैरव ने पूछा ” गुरूवर क्या समयमत के सिद्धांतग्रंथादि पर प्रकाश डाले । भद्र ! तुम उत्तम प्रश्न करते हो सुनो , समयाचारमार्ग के प्रधान ग्रंथ वशिष्ठ, सनक, शुक, सनन्दन तथा सनत्कुमार यह शुभागमपञ्चक है । समायाचार शिव और शक्ति के बीच अधिष्ठानसाम्य , अवस्थासाम्य, अनुष्ठानसाम्य, रूप साम्य तथा नामसाम्य रूपी पञ्चविध साम्यता के सिद्धांत को प्रतिपादित करता है। इस पर कश्मीरदेशिय शिष्य वेतालराजभैरव ने निवेदन कर कहा महाभट्टारक कृपया साम्यसिद्धांतो को विस्तृत रूप में कहे । उत्तमभद्र ध्यान से सुनो
अधिष्ठानसाम्य का अर्थ शिव तथा शक्ति का अधिष्ठान एक ही भित्ति पर अवस्थित होना होता है ।
अवस्थासाम्य अर्थ शिव तथा शक्ति की अवस्था के साम्य से है । चन्द्रचंद्रिकान्याय के द्वारा शिवशक्ति की अभिन्नता तथा एकरूपता सिद्ध होती है । जो शिव है वहीं शक्ति है , यह दोनों अभिन्न होकर भी भिन्न की तरह प्रतिभासित होते इसी कारण संसारभेदबुद्धि से अलग अलग तत्व कहता है । अनुष्ठानसाम्य का अर्थ शिवशक्ति के साधन,ध्यान,अनुष्ठान , मंत्र, प्रयोग तथा विधि में एकरुपता को कहते है । उदाहरणतया
सन्ध्या, आह्निक अङ्गन्यास,ध्यान, सकलिकरण , अमृतिकरण , पीठपुजा , आवरणपूजा शैव तथा शाक्त दोनो सम्प्रदायो मे किया जाता है तथा समान्तर विधि के द्वारा । खड्गरावण नामक एक विद्या दोनोसम्प्रदायो मे भिन्नरूप से उपासित होती है ।
एक अन्यमनीषी ने अनुष्ठानसाम्य का अर्थ शिवशक्ति दोनो के अनुष्ठान जन्यफल (शिवस्वरूप)
के साम्य को माना है । रूप साम्य तथा नामसाम्य शिवशक्ति दोनो के स्वरूप की सामनता तथा नाम की समानता को कहा गया है । शिव को नवात्मन कहे गये है। शैवमहावेध के सिद्धांत का भी प्रतिपादन किया गया है । गौड़देशियशिष्य शक्तिदासभैरव ने पूछा “दादा अन्य सिद्धांतो में शिव ओर शक्ति के सम्बन्ध में भी प्रकाश डाले । महाभैरव कहते है सुनो सौम्य शक्तिदासभैरव पूर्वकौलमत में भी शिवशक्ति की समानता का सिद्धांत प्रतिपादित है। उत्तरकौल मत में ‘शक्ति शेषी है शिव शेष ‘ सिद्धांत का प्रतिपादन हैं और शैवमत में ‘शिव शेषी है शक्तिशेष ‘सिद्धांत का । सभी शिष्य अब ध्यान से सुने ,अब समयमत के अनुसार श्रीचक्र का वर्णन किया जाता है। समयाचारमार्ग के अनुसार श्रीचक्र में ४ अधोमुख़ शिवत्रिकोण है तथा ५ ऊर्ध्वमुख शक्तित्रिकोण हैं। मूल बिंदु त्रिकोण के बाहर स्थित होता हैं ।
समयाचारी साधक त्र्यक्षरीबाला , पञ्चदशी
रमादिषोडशी (श्रीं युक्त पञ्चदशी )
तथा अष्टदशी ( क्लीं ह्रीँ श्रीं युक्त पञ्चदशी )
का उपयोग साधना मे करते हैं । सायं संध्या का समय होने को था सो महाभैरव ने शिष्यो के साथ शान्तिपाठ कर चक्र का उद्वासान कर दिया । सभी ने भगवति हरसिद्धि को नमस्कार किया तथा मालवगङ्गा क्षिप्रा की और प्रस्थान किया ।

॥ धूमावतीयन्त्रम् ॥

रक्ताङ्गीं रक्तवस्त्रां करिकरविलसत्कुंडलां चण्डदंष्ट्रां कंठोद्यद्रुंडमालां परिसरविलसच्छोभिपैशाचवृंदाम् ।
घोरां घोराट्टहासां करकलितकपालासिरौद्रां त्रिनेत्रां शत्रूणां प्राणहन्त्रीं शशिशिशुमकुटां भावयेद्धूम्रकालाम् ॥