आम्नाय और सिद्धकुञ्जिकास्तोत्र

जनसाधारण से लेकर सिद्धसाधकों के मध्य कुंजिका स्तोत्र के पाठ की परम्परा रही हैं । विभिन्न आम्नायॊं के उपासकगण अपनी-अपनी आम्नाय नायिका के प्रीत्यर्थ सिद्धकुञ्जिकास्तोत्र का पाठ चण्डीपाठाङ्गभूत तथा स्वतंत्ररूप से किया करतें हैं । साथ ही महाविद्या उपासकों के मध्य अपनी इष्ट महाविद्या के कुञ्जिकास्तोत्र के पाठ की पुरातन परम्परा हैं । ऊर्ध्वाम्नाय तथा पूर्वाम्नाय के उपासक ‘रुद्रयामलोक्तसिद्धकुञ्जिकास्तोत्र‘ का पाठ करते हैं । वहीं दक्षिणाम्नाय के उपासक ‘कालीतन्त्रोक्तकुञ्जिकास्तोत्र‘ का पाठ करते हैं ।पश्चिमाम्नायोपासकों के मध्य ‘गौरीतन्त्रोक्तकुब्जिकाकुञ्जिकास्तोत्र‘ के पाठ का चलन हैं । उत्तराम्नाय के साधकवर ‘डामरतन्त्रोक्तकुञ्जिकास्तोत्र‘ का पाठ उत्तराम्नयेशी के प्रीत्यर्थ करते हैं । महाविद्याक्रम में आद्या के उपासक ‘कालीतन्त्रोक्तकुञ्जिकास्तोत्र‘ का पाठ करते हैं।  नक्षत्रविद्या के उपासक ‘महाचीनतन्त्रोक्तकुञ्जिकास्तोत्र‘ का परायण किया करता हैं। श्रीबगलामुखी के उपासक ‘बगलातन्त्रोक्तकुञ्जिकास्तोत्र‘ का पाठ करते हैं । धूमावती साधकों का अपना कुञ्जिकास्तोत्र हैं ।
श्रीविद्या की एक परम्परा में ‘बृहदमहासिद्धकुञ्जिकास्तोत्र’के पाठ का प्रचलन हैं ।विभिन्न परम्पराओं तथा आम्नायों में प्रचलित कुञ्जिकास्तोत्र उन परंपराओं में प्रचलित विशिष्ट चण्डीपाठ की ओर भी संकेत करता हैं ।
भगवती के पाद युगलों की वन्दना कर लेख समाप्त किया जाता हैं। 

त्वं चन्द्रिका शशिनि तिग्मरुचौ रुचिस्त्वं
त्वं चेतनासि पुरुषे पवने बलं त्वम् ।
त्वं स्वादुतासि सलिले शिखिनि त्वमूष्मा
निस्सारमेव निखिलं त्वदृते यदि स्यात् ॥
ॐ शिवमस्तु लेखकपाठकयोः॥

ताराकुलसाधकों का तुलसी तथा हरिनामसंकीर्तन निषेधनिर्णय

पूर्व में भगवती श्रीश्रीतारा के दीक्षाक्रम पर लिखे गए लेख में तुलसी तथा हरिनामसंकीर्तननिषेध की चर्चा की थीं । इस पर कई मित्रों ने प्रश्न किया तथा कुछ तथाकथित विद्वानों के द्वारा आपत्ति उठाई गई थी । इसलिए इस विषय पर शास्त्रप्रमाण सहित लेख लिख रहा हूं । ( तथाकथित विद्वान पूर्वपक्ष का शास्त्रप्रमाण सहित उत्तर देंगे इस प्रकार साशाय होकर लिख रहा हूं। )
तंत्रशिरोमणि रुद्रयामल में भगवती चण्डिका के लिए तुलसी का स्पष्ट निषेध किया गया हैं।
रुद्रयामले-
तुलसीघ्राणमात्रेण क्रुद्धा भवति चण्डिका ॥
तुलसी की गंधमात्र से देवी चण्डिका क्रुद्ध हो जाती हैं।
यहां चण्डिका पद देवीमात्र का उपलक्षण हैं। अर्थात् चण्डिका के विषय में कही बात तारादि स्वरूपों पर भी लागू होती हैं। आगे भी भगवान रुद्र तुलसी का सुंदरी विषयक निषेध करते हैं।
रुद्रयामले-
तुलस्या गन्धमाघ्राय क्रुद्धा भवति सुन्दरी ॥
रुद्रयामल में अन्यत्र गणपति के लिए भी तुलसी का निषेध किया गया हैं। 
रुद्रयामले-
तुलसी ब्रह्मरूपा च सर्वदेवमयी शुभा ।
सर्वदेवमयी सा तु गणेशस्य प्रिया नहि ॥
कालीतन्त्र के अष्टमपटल के श्लोक क्रमांक २२ में भी तुलसी के निषेध संबंधी प्रमाणवचन प्राप्त होते हैं।
कालीतंत्रे –
सुगन्धिश्वेतलोहित्यैःकुसुमैरर्चयेत् दलैः। बिल्वैर्मरुवकाद्यैश्च तुलसी वर्जितैः शुभैः॥(८.२२.)
कालीतंत्र के ही दशमपटल में कहा गया हैं –
यथातारा तथाकाली यथा नीलातथोन्मुखी ॥ (१०.१ब)
इस प्रकार भगवती काली तथा भगवती तारा में अभेद होने से कालीपरकनिषेध तारा पर भी लागू होता हैं। 
आगे दशम पटल के २०वें श्लोक में कहां गया हैं-
यत्र यत्र कालिकेति नाम संश्रुयते प्रिये ।
तत्र तारा विधानञ्च युते नात्र संशयः ॥(१०.२०)
जहां जहां कालिका पद होवे वहां मिलितभावेन तारा विधान का अनुष्ठान करना चाहिएं।  इसमें कोई संशय नहीं करना चाहिएं।
यदि ये प्रमाण उन्हें अस्वीकार्य होवे तो भगवती तारा विषयक चीनाचारतंत्र के द्वितीय पटल के ३५वें श्लोक में भी इसी प्रकार का निषेध प्राप्त होता हैं ।
चीनाचारतंत्रे-
अपामार्गदलैर्भृंगैस्तुलसी वर्जितैः शुभैः॥(२.३५)
देवी भवतारिणी का बिल्व तथा मरुआ से अर्चन करे , परन्तु अपामार्ग, भृंगराज तथा तुलसी का वर्जन करें ।
मत्स्यसूक्त नामक आगमशास्त्र में भी इसी प्रकार का निषेध वचन प्राप्त होता हैं। 
मत्स्यसूक्ते –
सुगन्धिश्वेतलौहित्य कुसुमैरर्चयेत् कुलैः ।
बिल्वैर्मरुवकाद्यैश्च तुलसीवर्जितैः शुभैः॥
श्वेत तथा रक्तपुष्पों से शक्तिपूजा करें। बिल्व तथा मरूआ के पत्र से शक्तिपूजा करें परन्तु तुलसी का वर्जन करें ।
हरगौरीतंत्र में मालती तथा तुलसी का तारापूजा में निषेध किया गया हैं।
हरगौरीतंत्रे-
वर्जयेन् मालतीपुष्पं वर्जयेत् तुलसीदलम् ॥
त्रिशक्तिरत्न नामक आगम में कुछ इसी प्रकार का वचन प्राप्त होता हैं।
त्रिशक्तिरत्ने-
तुलसीमालतीवर्जं पुष्पं दद्यात् प्रसन्नधीः॥
कौलागम में भी कहा गया हैं।
भैरवीसुन्दरीकालीताराविघ्नविवस्वताम् ।
तुलसीवर्जिता पूजा सा पूजा सफला भवेत् ॥
भैरवी,सुन्दरी,काली,तारा, गणपति तथा सूर्य के पूजन मे तुलसी का वर्जन करें ।
रही बात हरिनामसंकीर्तननिषेध की तो तंत्रचूडामणि मे इस विषयक प्रमाण वाक्य मिलता हैं ।
वर्जयेद्विष्णुनामञ्च वर्जयेत्तुलसीदलम् ।
वर्जयेन्मालतीपुष्पं वर्जयेदन्यपूजनम् ॥
अर्थात् ताराकुल का साधक विष्णु का नाम, तुलसीपत्र, मालतीपुष्प तथा अन्य देवताओं के पूजन का वर्जन करें । तन्त्रांतर में भी  हरेर्नाम न गृह्णीयात् ॥ इस प्रकार का विधि वाक्य प्राप्त होता हैं । अंत में सुधिजनों तथा सामान्य पाठकों से इतना ही कहना चाहूंगा की ताराकुल के साधकों को तुलसी तथा हरिनामसंकीर्तननिषेध शास्त्रसम्मत हैं , मैंने द्वेषवश अथवा प्रमाद के कारण ऐसा नहीं लिखा हैं …… अस्तु ।
ॐ ताराम्बार्पणमस्तु ॥

॥ धूमावतीयन्त्रम् ॥

रक्ताङ्गीं रक्तवस्त्रां करिकरविलसत्कुंडलां चण्डदंष्ट्रां कंठोद्यद्रुंडमालां परिसरविलसच्छोभिपैशाचवृंदाम् ।
घोरां घोराट्टहासां करकलितकपालासिरौद्रां त्रिनेत्रां शत्रूणां प्राणहन्त्रीं शशिशिशुमकुटां भावयेद्धूम्रकालाम् ॥

चण्डिकादण्डकस्तोत्रम्

ॐ नमश्चण्डिकायै॥

ऊं ऊं ऊं उग्रचण्डं चचकितचकितं चंचला दुर्गनेत्रं हूँ हूँ हूंकाररूपं प्रहसितवदनं खङ्गपाशान् धरन्तम्। दं दं दं दण्डपाणिं डमरुडिमिडिमां डण्डमानं भ्रमन्तं भ्रं भ्रं भ्रं भ्रान्तनेत्रं जयतु विजयते सिद्धिचण्डी नमस्ते॥ १॥

घ्रं घ्रं घ्रं घोररूपं घुघुरितघुरितं घर्घरीनादघोषम् हुं हुं हुं हास्यरूपं त्रिभुवनधरितं खेचरं क्षेत्रपालम्। भ्रूं भ्रूं भ्रूं भूतनाथं सकलजनहितं तस्य देहा पिशाचं हूँ हूँ हूंकारनादैः सकलभयहरं सिद्धिचण्डी नमस्ते॥ २॥

व्रं व्रं व्रं व्योमघोरं भ्रमति भुवनतः सप्तपातालतालं
क्रं क्रं क्रं कामरूपं धधकितधकितं तस्य हस्तेत्रिशूलम्। द्रुं द्रुं द्रुं दुर्गरूपं भ्रमति च चरितं तस्य देहस्वरूपं मं मं मं मन्त्रसिद्धं सकलभयहरं सिद्धिचण्डी नमस्ते॥ ३॥

झं झं झंकाररूपं झमति झमझमा झंझमाना समन्तात् कं कं कंकालधारी धुधुरितधुरितं धुन्धुमारी कुमारी। धूं धूं धूं धूम्रवर्णा भ्रमति भुवनतः कालपास्त्रिशूलं तं तं तं तीव्ररूपं मम भयहरणं सिद्धिचण्डी नमस्ते॥ ४॥

रं रं रं रायरुद्रं रुरुधितरुधितं दीर्घजिह्वाकरालं पं पं पं प्रेतरूपं समयविजयिनं शुम्भदम्भे निशुम्भे।संग्रामे प्रीतियाते जयतु विजयते सृष्टिसंहारकारी ह्रीं ह्रीं ह्रींकारनादे भवभयहरणं सिद्धिचण्डी नमस्ते॥ ५॥

हूंकारी कालरुपी नरपिशितमुखा सान्द्ररौद्रारजिह्वा हूँकारी घोरनादे परमशिरशिखा हारती पिङ्गलाक्षे । पङ्के जाताभिजाते चुरु चुरु चुरुते कामिनी काण्डकण्ठे कङ्काली कालरात्री भगवति वरदे सिद्धिचण्डी नमस्ते॥ ६॥

ष्ट्रीं ष्ट्रीं ष्ट्रींकारनादे त्रिभुवननमिते घोरघोरातिघोरं कं कं कं कालरूपं घुघुरितघुरितं घुं घुमा बिन्दुरूपी। धूं धूं धूं धूम्रवर्णा भ्रमति भुवनतः कालपाशत्रिशूलं तं तं तं तीव्ररूपं मम भयहरणं सिद्धिचण्डी नमस्ते॥७॥

झ्रीं झ्रीं झ्रींकारवृन्दे प्रचरितमहसा वामहस्ते कपालं खं खं खं खङ्गहस्ते डमरुडिमडिमां मुण्डमालासुशोभाम् । रुं रुं रुं रुद्रमालाभरणविभूषिता दिर्घजिह्वा कराला देवि श्री उग्रचण्डी भगवति वरदे सिद्धिचण्डी नमस्ते॥ ८॥

आरुणवर्णसङ्काशा खड्गफेटकबिन्दुका। कामरूपी महादेवी उग्रचण्डी नमोऽस्तुते॥९॥

॥ श्रीचण्डिकादण्डकस्तोत्रं समाप्तम् ॥

॥ छिन्नमस्ताद्वादशनामस्तोत्रं।।॥

छिन्नग्रीवा छिन्नमस्ता छिन्नमुण्डधराऽक्षता | क्षोदक्षेमकरी स्वक्षा क्षोणीशाच्छादनक्षमा || १ || वैरोचनी वरारोहा बलिदानप्रहर्षिता | बलिपूजितपादाब्जा वासुदेवप्रपूजिता || २|| इति द्वादशनामानि छिन्नमस्ताप्रियाणि यः | स्मरेत्प्रातस्समुत्थाय तस्य नश्यन्ति नश्यन्ति शत्रवः ||३||

॥ बगलामुखीदशनामस्तोत्रम्॥

माँ बगलामुखी का विचित्र चित्रपट्ट

माँ पीताम्बरा राजराजेश्वरी भगवती बगलामुखी के अत्यन्त गोपनीय दस नामो वाल यह दिव्य दुर्लभ स्तोत्र हैं । इस स्तोत्र की फलश्रुति के अनुसार जो साधक शत्रुमुखस्तम्भनकरी बगलामुखी माँ के इस स्तोत्र का पाठ करता है वह देवी पुत्र होता हैं , मन्त्र सिद्ध होता हैं । ह्ल्रीं बगला सिद्धविद्या च दुष्टनिग्रहकारिणी । स्तम्भिन्याकर्षिणी चैव तथोच्चाटटनकारिणी ॥ भैरवी भीमनयना महेशगृहिणी शुभा । दशनामात्मकं स्तोत्रं पठेद्वा पाठयेद्यदि ॥ स भवेत् मन्त्रसिद्धश्च देवीपुत्र इव क्षितौ ॥