Ramblings on Krama School

  • Krama is oldest Kashmirian philosophical School.
  • It predates spanda and pratyAbhij~nA schools of Kashmir Shaivism.
  • devInaya,kAlInaya,atinaya, mahAnaya,mahArtha,ShaDardha are synonyms of Krama.
  • The word mahArtha overshadowed the usage of word Krama in later literature.
  • There were two main subschools of Krama system in Kashmir 1) mahAsAhasa School 2) ChummAmudrA School
  • Based on geographical location as well as philosophical differences there were two major schools of Krama system . 1) North Indian chatuShTayArtha School 2) South Indian pa~nchArtha School
  • It belongs to uttarAmnAya the northern current of transmissions from vAmadeva face of Shiva .
  • Krama is cream of uttarAmnAya.
  • uDDiyAnapITha of ma~Ngalapura state was main centre of Krama School.vajrayAna form of Buddhism orignated here.Guru Padmasambhava belongs to this place.
  • shrImakAradevI directly initiated j~nAnanetranAtha in this system . He is also know as AvatArakanAth.
  • Supreme reality according to Krama School is Goddess kRRishA or kAlasa~NkarShiNI with mahAmanthAnabhairava.

  • It is Shakti oriented approch towards supreme reality.
  • Krama practices fall under umbrella of shAktopAya.
  • Krama School regards dvaita and advaita as irrelevant,since such a concept of reality can’t be anything but relative.
  • Krama School is critical of bandha versus mokSha concept.
  • Followers of Krama School regards bhagavatagItA as a kramAgama.
  • According to Kramakeli of AbhinavaguptAchArya GitA is an attempt on part of KrShna to expound to Arjun the philosophy of Krama .
  • Besides the famous opening of the fourth chapter of GitA , according to him records the original history of Krama system. While initiating Arjun into Krama ,He had to enter supremestate of kAlasa~NkarShiNI
  • Krama School preferred local languages over Brahmanical Sanskrit.
  • mahArthama~njarI is composed in mahArAShTrI by maheshvarAnandanAtha.
  • shitikaNThAchArya wrote mahAnAyaprakAsha in prAkRRita.
  • taNtrasAra preserves some prAkRRita verses by abhinavaguptAchArya.
  • 4th Ahnika of tantrAloka deals with Krama system . abhinavaguptAchArya received Krama teachings from shrI bhUtirAja who was an extraordinary expert of kAlInaya.
  • mahAnayaprakAsha of shrIkaNTha, mahAnayaprakAsha of shitikaNTha, mahArthama~njarI of maheshvarAnanda , chidgaganachandrikA of shrIvatsa, vAtulanAthasUtrANi with commentry by anantashaktipAda are currently available Krama scriptures .kramakelI, siddhanAtha’s kramastava, kramasUtra, kramasiddhi, kAlIkrama, mahAnayapaddhati, mahArthasUtra, kramAgama etc are extint scriptures .
  • Krama System rejects Brahmanical caste system based on selective discrimination,any one who is qualified can get initiation in this system.
  • Krama System rejects authority of Vedas and Smritis .
  • Followers of Krama System don’t believe in external ritualism, for them all rituals are purely internal.
  • kAlIstotra of shivAnandanAtha , siddhanAtha’s kramastotra and khachakrapa~nchakastotra of arNasiMha are main stotras of this school.
ह्रीँ श्रीँ क्रमनाथ सहित क्रमाम्बा पादुकां पुजायमि ॥

॥ वैकुण्ठचतुर्मूर्ति ॥

वैकुण्ठचतुर्मूर्ति अथवा वैकुण्ठविष्णु भगवान विष्णु का एक विशिष्ट तांत्रिक स्वरूप हैं । वैकुंठनारायण के स्वरूप पर त्रिशिरोभैरव का प्रभाव मालूम होता हैं। दोनों में काफी कुछ साम्य हैं। दोनों देवताओं की उपासना विशेषतः काश्मीरदेश में की जाती थीं।

काश्मीर से प्राप्त वैकुण्ठचतुर्मूर्ति प्रतिमा

नारदविष्णु संवाद से अवतरित ३३ पटलों वाली श्रीजयाख्यसंहिता नामक पाञ्चरात्रागम मे वैकुण्ठचतुर्मूर्ति की उपासना का विशद वर्णन प्राप्त होता हैं । नारद जी से शांडिल्यऋषि ने इस संहिता को प्राप्त किया तथा नाना ऋषिगणों को इसका उपदेश दिया। श्रीजयाख्यसंहिता के षष्टपटल में वैकुण्ठभट्टारक का ध्यान उल्लिखित हैं:-

अनादिनिधनं देवं जगत्स्रष्टारमीश्वरम् ।
ध्यायेच्चतुर्भुज विप्र शङ्खचक्रगदाधरम् ॥
चतुर्वक्त्रं सुनयनं सुकान्तं पद्मपाणिनम् । वैकुण्ठं नरसिह्मास्यं वाराहं कपिलाननम् ॥
शुक्लं खगेश्वरारूढं सर्वाभरणभूषितम् । सर्वलक्षणसंपन्नं माल्याम्बरधरं विभुम् ॥किरीटकौस्तुभधरं कर्पूरालिप्तविग्रहम् ।सूर्यायुतसहस्राभं सर्वदेवनमस्कृतम् ॥ (ज.सं.६.७३-७६)

वैकुण्ठचतुर्मूर्ति चतुर्मुख ,चतुर्हस्त तथा शक्तिचतुष्टय से युक्त होते हैं। वराह, सौम्य, नृसिंह तथा उग्रकपिल यह श्रीभगवान के चतुर्मुख हैं । अपने चतुरहस्तो में शंख,चक्र,गदा तथा पद्म धारण करते हैं। उत्तान अवस्था में पद्मासनस्थ अथवा गरुडासन के ऊपर विराजमान होते हैं। जया, माया, लक्ष्मी तथा कीर्ति भगवान की चार अंतरंग शक्तियां हैं । भगवान कौस्तुभमणि, वनमाला,नानारत्नजड़ित किरीट तथा कुण्डल धारण करते हैैं। पार्श्व में चक्रपुरुष तथा गदादेवि हैं। जयाख्यसंहिता का रचनाकाल ५ शताब्दी हैं अतः वैकुण्ठचतुर्मूर्ति के उपासनासंप्रदाय का उदय गुप्तकाल में सिद्ध होता हैं । वैकुण्ठचतुर्मूर्ति की गुप्तकालीन प्रतिमाओं पर गान्धार शैली का प्रभाव दृश्य हैं । कुछ पाश्चात्य विद्वान हेलेनिस्टिक प्रभाव के भी पक्षधर है परन्तु यह मत समीचीन नहीं हैं ।

गुप्तकालीन वैकुंठभट्टारक प्रतिमा
गान्धारशैली प्रभावित प्रतिमा

अग्निपुराण, विष्णुधर्मोत्तरपुराण तथा शिल्पशास्त्रग्रंथ रूपमण्डन में भी वैकुण्ठविष्णु का उल्लेख मिलता हैं । भगवान विष्णु के वैकुण्ठचतुर्मूर्ति स्वरूप की उपासना विशेषतः से काश्मीरदेश प्रचलित थीं । ८-१२ शताब्दी में वैकुण्ठचतुर्मूर्ति की उपासना कश्मीरदेश में चरम पर थीं । १२ शताब्दी में रचित कल्हण की राजतरङ्गिणी में भी काश्मीरनरेश अवन्तीवर्मन द्वारा वैकुंठनारायण की प्राण प्रतिष्ठा का उल्लेख मिलता हैं‌। वैकुण्ठचतुर्मूर्ति कर्कोटराजवंश तथा उत्पल राजवंश के राजकीयदेव (कुलदेवता) थे । १३ शताब्दी में मलेच्छजाहिलो के आगमन के साथ हीं वैकुंठभट्टाराक की उपासना का ह्रास होने लगा । कई मंदिरों को तोड़ा गया , स्वर्णादि से निर्मित प्रतिमाओं को गलाकर आभूषणआदि बनाए गए । पाषाणप्रतिमाओं को खंडित किया गया। वैकुंठनाथ के उपासकों की निर्ममहत्याएं की गई । उपासना सम्बन्धी ग्रंथों को नष्ट कर दिया गया। इन्हीं मलेच्छजाहिलो के अत्याचारों के कारण १४-१५ शताब्दी तक वैकुण्ठचतुर्मूर्ति की उपासना काश्मीर देश से लुप्त प्राय हो गई । काश्मीर के अलावा उत्तरभारत के अन्य स्थानों पर तथा नेपालदेश में भी वैकुण्ठनाथ की उपासना होती थीं।

नेपालदेशीय वैकुण्ठनाथप्रतिमा

उत्तरभारत में अनेकों स्थानों पर वैकुण्ठचतुर्मूर्ति स्वरूप की प्रतिमाएं मिलती हैं विशेषकर गुजरात, राजस्थान तथा मध्य प्रदेश में । ११७० ईसवी में एक प्रतिमा चम्बा घाटी में प्रतिष्ठत की गई थीं । चंदेलों द्वारा १० शताब्दी में निर्मत खुजराहों का लक्ष्मणमंदिर भी वैकुण्ठचतुर्मूर्ति को समर्पित हैं।

लक्ष्मणमन्दिर के गर्भग्रह में स्थापित वैकुंठचतुर्मूर्ति

खुजराहों के कंदरियामहादेव मंदिर में भी वैकुण्ठ नारायण की प्रतिमा प्राप्त होती हैं।

कंदरियामहादेवमन्दिर

गुजरात के सिद्धनाथ महादेव मंदिर में भी वैकुण्ठचतुर्मूर्ति की प्रतिमा हैं । यह सिद्ध करता है कि मध्यभारत में भी कभी वैकुण्ठचतुर्मूर्ति की उपासना का प्रचलन रहा होगा अस्तु ।
ॐ विश्वरूपाय विद्महे विश्वातीताय धीमहि तन्नो विष्णु: प्रचोदयात् ॥