Mysteries of kubjikAkarpUrastotra

karpUrastotra have its special place among various kind of tAntrika stotras. sAdhakas of different amnAyas recite karpUrastotra of their amnAyanAyikA . sAdhakas of dakShiNAmnAya recite kAlIkarpUrastotra while siddhilakShmIkarpUrastotra is recited by sAdhakas of uttarAmnAya . UrdhvAmnAya upAsakas declaims  sundarIkarpUrastotra and sAdhakas of adharamAmnAya recite tArAkarpUrastotra. kubjikAkarpUrastotra is declaimed  by sAdhakas of the pashchimAmnAya.

This stotra is heighly esoteric in nature with various secrets in every single verse. It is passed down by master to qualified deciples who undergoes practice of western currents ( pashchimAmnAya ) of goddess kubjikeshvarI. As per colophon of kubjikAkarpUrastotra , this stotra belongs to siddhikhaNDa of rudrayAmala . It is composed in sRRigdhArA meter with a total of twenty one verses . First six verses of stotra encapsulates uddhAra of kulapraNava ( five bIjas of pashchimAmnAya ) which are prefixed to every mantra of pashchimAmnAya. Next three verse describes six limbs of mistress of pashchimAmnAya. Ninth verse embodies yantroddhAra of goddess kubjikA . Next three verse describes the elements of kubjikA yantra and explains meaning of different names of goddess kubjikA. Fifteenth verse elobrates pUjAvidhi and kulayAga of pashchimAmnAya. Sixteenth verse describes animals for sacrifice in kubjikAkula. Deer,Chicken,Sheep,Cat, Rabbit,Got and Camel are main balipashus recommended in stotra .

meShaM shashaM hariNa kukkuTa bhekasarpa
mArjAra muShaka mahoShTra varaM prashastam ॥

16.A

Next three verse describes purushcharaNavidhi for supreme vidyA of kubjikA along with the mUrtiyAga and dUtIyAga. Final two verses describes phalashruti of pashchimAmnAyopAsanA and recital of the kubjikAkarpUrastotra.

pUrvAmnAyeshvarI kubjA pashchimAmnAyasvarUpiNI । uttarAmnAyeshvarI kubjA dakShiNAmnAyasvarUpiNI ॥ adharAmnAyeshvarI kubjA mahordhvAmnAyasvarUpiNI ।  ShaTsiMhAsanagA kubjA ratnasiMhAsana sthitA ॥

पश्चिमाम्नायनायिका श्रीकुब्जिका

५ श्रीकुब्जेश्वरसहितकुब्जिकाम्बापादुकां पूजयामि॥

तरुणरविनिभास्यां सिंहपृष्ठोपविष्टाम्
कुचभरनमिताङ्गीं सर्वभूषाभिरामाम्।
अभयवरदहस्तामेकवक्त्रां त्रिनेत्रां
मदमुदितमुखाब्जां कुब्जिकां चिन्तयामि ॥
भगवति कुब्जिका पश्चिमाम्नाय की अधिष्ठात्री देवी हैं।चिंचिणी,कुलालिका,कुजा,वक्त्रिका,क्रमेशी,खंजिणी, त्वरिता,मातङ्गी इत्यादि देवी के ही अन्य नाम हैं । भगवान परशिव ने अपने पश्चिमस्थ सद्योजातवक्त्र से सर्वप्रथम कुब्जिका उपासना का उपदेश किया। जैसा कि परातन्त्र में कहा गया है

सद्योजातमुखोद्गीता पश्चिमाम्नायदेवता ॥

वही कहा गया है

सद्योजातःसाधिता सा कुब्जिकाचक्रनायिका ॥

कुब्जिका शब्द की व्युत्पत्ति कुब्जक+टाप्, इत्व से होती हैं । कुब्जिका शब्द के शाब्दिकार्थ पर न जाकर रहस्यार्थ की ओर कुछ संकेत किया जाता हैं। कुब्जिका शब्द का कुबड़ी या झुकी हुई कमर वाली ऐसा शाब्दिक अर्थ करना मूर्खता हैं। कुब्ज होकर जो सर्वत्र संकुचित रूप से व्याप्त हो जाती हैं उसे कुब्जिका कहते हैं। जैसा कि शतसाहस्रसंहिता के भाष्य में कहा गया है

कुब्जिका कथम्? कुब्जो भूत्वा सर्वत्र प्रवेशं आयाति । तद्वत् । सा सर्वत्र सङ्कोचरूपत्वेन व्याप्तिं करोति तदा कुब्जिका ।

संवर्तामण्डलसूत्रभाष्य के अनुसार कु,अब्,ज अर्थात अग्निसोम तथा प्राण की अधिष्ठत्री देवि कुब्जिका हैं । वास्तव में सूक्ष्मदृष्टि से विचार किया जाए तो भगवती कुब्जिका ही कुलकुण्डलिनी हैं । जैसा कि शतसाहस्रसंहिता में कहा गया है

कुण्डल्याकाररूपेण कुब्जिनि तेन सा स्मृता ॥(शतसाहस्रसंहिता अध्याय २८)

गुप्तकाल (५ C.E. )से ९ C.E. के पूर्वार्ध तक संकलित अग्निपुराण, मत्स्यपुराण तथा गरुडपुराण में देवी कुब्जिका सम्बन्धी विवरण प्राप्त होता हैं। इस से इतना तो सिद्ध हो ही जाता है कि कुब्जिकाक्रम प्राचीन हैं । १०-१२ C.E. तक उत्तरभारत में कुब्जिका उपासना अपने चरम पर थीं । १५-१६ C.E. के अन्त तक यह गुप्त हो गईं। महामाहेश्वराचार्य अभिनवगुप्त जी अपने तन्त्रालोक में देवि कुब्जिका सम्बन्धी कुछ श्लोक उद्धृत करते हैं। (दृष्टव्य- तंत्रालोक २८ वां अध्याय जिसमें कुलयाग का वर्णन हैं ।, खंडचक्रविचार प्रकरण )। कश्मीर में भी एक कुब्जिकापीठ था । देवि कुब्जिका की एक अमूर्त सिन्दूरलिप्त प्रतिमा थीं। जिसका पूजन कश्मीर के कुब्जिकाक्रम के अनुसार किया जाता था । कालान्तर में जाहिल धर्मोन्मादी तथा आतंकवादी मानसिकता वाले विशेषवर्ग के लोगों के कारण इस पीठ का लोप हो गया। देवीरहस्यतन्त्र में अभी भी कश्मीर के कुब्जिकाक्रम का कुछ अंश सुरक्षित हैं । कश्मीर के मूर्धन्य विद्वान श्रीसाहिबकौल (कौलानन्दनाथ) द्वारा विभिन्न देवियों के पूजा मंत्रों का संग्रह किया गया था। देवी कुब्जिका संबंधित मंत्र उस पांडुलिपी में प्राप्त होते हैं । आनन्देश्वरानन्दनाथकृत आनन्देश्वरपद्धति तथा आज्यहोमपद्धति की पांडुलिपियों में भी भगवतीकुब्जिका सम्बन्धी अंश प्राप्त होता हैं । भारत में अभी भी कुछ मुठ्ठीभर साधक स्वतंत्रक्रम से तथा अन्य साधकगण श्रीविद्या केआम्नायक्रम में कुब्जिका उपासना करते हैं । नेपाल में कुब्जिका उपासना के साक्ष्य ९००-१६०० C.E. तक के मिलते हैं । मन्थानभैरवतंत्र,शतसाहस्रसंहिता, कुब्जिकामततंत्र,अम्बासंहिता,श्रीमततंत्र आदि ग्रन्थों के हस्तलेख मात्र नेपाल से प्राप्त होते हैं। नेपाल में पश्चिमाम्नाय कुब्जिकाक्रमपरम्परा अभी तक जीवित हैं। आगे कम्युनिस्टों के राज में वहां क्या हो यह तो भगवती जाने । अथर्ववेदीय परम्परा में कुलदीक्षा के समय आचार्य शिष्य को ३२ अक्षरों वाली विद्या तथा पांचमन्त्रों वाले गोपनीय सूक्त का उपदेश करता हैं ।
यह सूक्त श्रुतपरम्परा द्वारा प्राप्त होता है तथा अथर्ववेद के किसी भी प्रकाशित भाग में उपलब्ध नहीं होता हैं। अथर्ववेदीय परम्परा में देवी कुब्जिका के सिद्धकुब्जिका, महोग्रकुब्जिका, महावीरकुब्जिका, महाज्ञानकुब्जिका,महाभीमकुब्जिका, सिद्धिलक्ष्मीकुब्जिका ,महाप्रचंडकुब्जिका, रुद्रकुब्जिका तथा श्रीकुब्जिका इन ९ गुप्तस्वरूपों की साधना की जाती हैं। कुब्जिका उपासना की फलस्तुति
बताते हुए आथर्वणश्रुति कहती है

स सर्वैदेर्वैज्ञातो भवति…. स सर्वेषुतीर्थषु स्नातो भवति…. स सर्वमन्त्रजापको भवति स सर्वयन्त्रपुजको भवति…. स सोमपूतोभवति स सत्यपूतोभवति स सर्वपूतोभवति य एवं वेद ॥

कुब्जिका उपासक सभी देवताओं में जानने वाला होता हैं। वह समस्त मंत्रो का जापक होता हैं। वह सोम तथा सत्य द्वारा पवित्र होता हैं। वह सबके द्वारा पवित्र होता हैं। आगे भी आथर्वणश्रुति कहती है

एतास्या ज्ञानमात्रेण सकलसिद्धिभाग्भवति महासार्व भौमपदम्प्राप्नोत्येवं वेद ॥

कुब्जिका क्रम का ज्ञाता सकलसिद्धि का फलभागी होता हैं अवधूतरूप महासार्वभौमपद प्राप्त करता हैं।
परातन्त्र के अनुसार साधक अष्टसिद्धि युक्त होकर परमसिद्धि शीघ्र ही प्राप्त करता हैं। भगवती भोग और मोक्ष फलद्वयप्रदायिनी हैं।

अणिमादिमहासिद्धिसाधनाच्छीघ्र सिद्धिदा ।
मोक्षदा भोगदा देवी कुब्जिका कुलमातृका ॥

कुब्जिका उपासना मपञ्चक के द्वारा वामकौलाचार तथा अवधूताचार से की जाती हैं। दक्षिणाचार से उपासना निष्फल होती हैं । परा तन्त्र में कहा गया है

वाममार्गे रता नित्या दक्षिणा फलवर्जिता ।
मकारपञ्चकैः पूज्यानां यथाफलदा भवेत् ॥

कौलिकसंप्रदाय में सिद्धिनाथ,श्रीकंठनाथ,
कुजेशनाथ,नवात्मभैरव,शिखास्वच्छन्द तथा श्रीललितेश्वर द्वारा प्रपादित क्रम से कुब्जिका उपासना की जाती हैं। जैसा कि परातन्त्र में कहा गया हैं

विभिन्ना सिद्धिनाथेन श्रीनाथेनावतारिता ।
कुजेशनाथवीरेण कुजाम्नायप्रकाशिता॥
नवात्मा श्रीशिखानाथस्वच्छन्दःश्रीललितेश्वरः॥

श्रीवडवानलतंत्र में भी कहा गया है
बहुप्रभेदसंयुक्ता कुब्जिका च कुलालिका ॥
पुनः यह कुब्जिकाक्रम बाल,वृद्ध तथा ज्येष्ठ इन तीन क्रमों में विभाजित हैं । कलियुग में बालक्रम का प्राधान्य हैं। बालक्रम को ही अष्टाविंशतिक्रम भी कहते हैं ‌। भगवती का यंत्र बिन्दु, त्रिकोण, षट्कोण,अष्टदल तथा भूपुरात्मक हैं। जैसा कि कहा गया है

बिन्दुत्रिकोणषट्कोणमष्टपत्रं सकेसरम् ।श्रीमत्कुब्जेश्वरीयन्त्रं सद्वारं भूपूरत्रयम् ॥

कुब्जिकाक्रमपूजा में श्रीनवात्मागुरुमण्डल, श्रीअष्टाविंशतिक्रम तथा श्रीपश्चिममूलस्थानदेवी का अर्चन किया जाता हैं । चिञ्चिनिमतसारसमुच्चय, कुब्जिकामततंत्र,शतसाहस्रसंहिता, गोरक्षसंहिता, अम्बासंहिता, श्रीमततंत्र, कुब्जिकोपनिषत्, नित्याह्निकतिलकं ,मन्थानभैरवतंत्र इत्यादि कुब्जिका उपासना संबंधित ग्रन्थ हैं । अग्निपुराण में कहे हुए
भगवती कुब्जिका के ध्यान को लिखकर लेख का समापन किया जाता है…. ॐ शिवमस्तु ।

नीलोत्पलदलश्यामाषड्वक्त्राषट्प्रकारिका ।
चिच्छक्तिरष्टादशाख्या बाहुद्वादशसंयुता ॥
सिंहासनसुखासीना प्रेतपद्मोपरिस्थिता ।
कुलकोटिसहस्राढ्या कर्कोटोमेखलास्थितः॥
तक्षकेणोपरिष्टाच्चगलेहारश्च वासुकिः।
कुलिकः कर्णयोर्यस्याःकूर्म्मःकुण्डलमण्डलः॥
भ्रुवोःपद्मो महापद्मोवामे नागःकपालकः ।
अक्षसूत्रञ्च खट्वाङ्गं शङ्खं पुस्तकञ्चदक्षिणे॥
त्रिशूलन्दर्पणं खड्गं रत्नमालाऽङ्कुशन्धनुः।
श्वेतमूर्ध्वं मुखन्देव्या अर्धश्वेतन्तथाऽपरं ॥
पूर्व्वास्यं पाण्डरं क्रोधि दक्षिणं कृष्णवर्णकं ।
हिमकुन्देन्दुभं सौम्यं ब्रह्मा पादतले स्थितः॥
विष्णुस्तु जघने रुद्रो हृदि कण्ठे तथेश्वरः।
सदाशिवोललाटेस्याच्छिवस्तस्योर्ध्वतःस्थितः॥
आघूर्णिता कुब्जिकैवं ध्येया पूजादिकर्म्मसु॥

॥ कुब्जिकादण्डकम् ॥

श्रीभैरव उवाच ॥

जय त्वं मालिनी देवी निर्मले मलनाशिनी । ज्ञानशक्तिः प्रभुर् देवी बुद्धिस् त्वं तेजवर्धनी ॥ जननी सर्वभूतानां संसारे ऽस्मिन् व्यवस्थिता । माता वीरावली देवी कारुण्यं कुरु वत्सले ॥ जयति परमतत्त्वनिर्वाणसम्भूतितेजोमयी निःसृता व्यक्तरूपा परा ज्ञानशक्तिस् त्वम् इच्छा क्रिया ऋज्विरेखा पुनः सुप्तनागेन्द्रवत्कुण्डलाकाररूपा प्रभुर्नादशक्तिस्तु सङ्गीयसे भासुरा ज्योतिरूपा सुरूपा शिवा ज्येष्ठनामा च वामा च रौद्री मनाख्याम्बिका बिन्दुरूपावधूतार्धचन्द्राकृतिस् त्वं त्रिकोणा अ-उ-म-कार इ-कार ए-कारसंयोजितैकत्वमापद्यसे तत्वरूपा भगाकारवत्स्थायिनी आदितत्त्वोद्भवा योनिरूपा च श्रीकण्ठसम्बोधनी रुद्रमाता तथानन्तशक्तिः सुसूक्ष्मा त्रिमूर्त्यामरीशार्घिनी भारभूतिस् तिथीशात्मिका स्थाणुभूता हराख्या च झण्टीशभौक्तीश- सद्यात्मिकानुग्रहेशार्चिता क्रूरसङ्गे महासेनसम्भोगिनी षोडशान्तामृता बिन्दुसन्दोहनिष्यन्ददेहप्लुताशेषसम्यक्परानन्द-निर्वाणसौख्यप्रदे भैरवी भैरवोद्यानक्रीडानुषक्ते परा मालिनी रुद्रमालार्चिते रुद्रशक्तिः खगी सिद्धयोगेश्वरीसिद्धमाता विभुः शब्दराशीति योन्यार्णवी वाग्विशुद्धासि वागेश्वरी मातृकासिद्धम् इच्छा क्रिया मङ्गला सिद्धलक्ष्मी विभूतिः सुभूतिर्गतिः शाश्वता ख्याति नारायणी रक्तचण्डा करालेक्षणा भीमरूपा महोच्छुष्मयागप्रिया त्वम् जयन्त्याजिता रुद्रसम्मोहनी त्वं नवात्मानदेवस्य चोत्सङ्गयानाश्रिता मन्त्रमार्गानुगैर्मन्त्रिभिर्वीरपानानुरक्तैः सुभक्तैश्च सम्पूज्यसे देवि पञ्चामृतैर्दिव्यपानोत्सवैरेकजन्मद्विजन्म- त्रिजन्मचतुःपञ्चषट्सप्तजन्मोद्भवैस्तैश्च नारैः शुभैः फल्गुषैस्तर्प्यसे मद्यमांसप्रिये मन्त्रविद्याव्रतोद्भाषिभिर्मुण्डकङ्कालकापालिभिर्दिव्यचर्यानुरूढैर्नमस्कार ॐकारस्वाहास्वधाकारवौषड्वषट्- कारफट्कारहूंकारजातीभिरेतैश्च मन्त्राक्षरोच्चारिभिर्वामहस्तस्थितैश्चाक्षसूत्रावलीजापिभिः साधकैः पुत्रकैर्मातृभिर्मण्डले दीक्षितैर्योगिभिर्योगिनीवृन्दमेलापकै रुद्रक्रीडालसैः पूज्यसे योगिनां योगसिद्धिप्रदे देवि त्वं पद्मपत्त्रोपमैर्लोचनैः स्नेहपूर्णैस्तु यं पश्यसे तस्य दिव्यान्तरीक्षस्थिता सप्तपातालसत्खेचरी सिद्धिरव्याहता वर्तते. भक्तितो यः पठेद्दण्डकं एककालं द्विकालं त्रिकालं शुचिः संस्मरेद् यः सदा मानवः सोऽपि शस्त्राग्निचौरार्णवे पर्वताग्रे ऽपि संरक्षसे देवि पुत्रानुरागान् महालक्ष्मि ये हेमचौरान्यदारानुषक्ताश्च ब्रह्मघ्नगोघ्ना महादोषदुष्टा विमुञ्चन्ति संस्मृत्य देवि त्वदीयं मुखं पूर्णचन्द्रानुकारं स्फुरद्दि व्यमाणिक्यसत्कुण्डलोद्घृष्टगण्डस्थलं ये ऽपि बद्धा दृढैर्बन्धनैर्नागपाशैर्भुजाबद्धपादार्गलैस्ते ऽपि त्वन्नामसङ्कीर्तनाद्देवि मुञ्चन्ति घोरैर्महाव्याधिभिः संस्मृत्य पादारविन्दद्वयं ते महाकालि कालाग्नितेजःप्रभे स्कन्दगोविन्दब्रह्मेन्द्रचन्द्रार्क- पुष्पायुधैर्मौलिमालालिसत्पद्मकिञ्जल्कसत्पिञ्जरैः सेव्यसे सर्ववीराम्बिके भैरवी भैरवस्ते शरण्यागतो ऽहं क्षमस्वापराधं क्षमस्वापराधं शिवे ॥

॥ श्रीकुलालिकाम्नाये श्रीकुब्जिकामते कुब्जिकादण्डकम् ॥

॥ siddhikubjikA suktaM ॥

In mahAshamshAna of Avanti hence spoke mahAbhairava to disciples ” Now we shall disclose a suKta of kubjikA which procures accomplishment in the six rites of tantra. UpAsaka after fasting for 3 days and night , he should silently seat himself on corpse ,turning his face towards the direction of kubjasundarI , recite this hymn of kubjikA for a hundred*ten times . Then his ambitions are realized ,all his ritual acts of Shatakarama , as a godman he roams through heaven ,mortal world and nether world , he roams in the sky ,who know thus . If anyone who does not know the real meaning commence ritual practices by neglicence or greed ,he will be confronted with contrary results , he meets with death or become crazy .UpAsaka of pashchimAmnAya , descendent of parAshara clan and a teacher of shaunaka and paippalAda shAkhA as taught in AV is only adhikArI for recital of secrete suKta of kubjikA . “

॥ अथ सिद्धिकुब्जिकासुक्तम् ॥

(कुब्जप्रणवं ) कुब्ज: श्रोत्रियमाप्नोति कुब्जैकं परमेष्ठिनम् । कुब्जैकमग्निपुरुषो कुब्ज: सम्वत्सरं ममे ॥१॥ कुब्जेदमनुक्षयति कुब्जदेवजनैर्विष: । कुब्जैकमन्यं नक्षत्रं कुब्जिका सत्यमुच्यते ॥२॥ द्यौ: पिता कुब्जिका सत्यमाता मृत्युर्दहति देवि भद्रम् । भद्रं वद कुब्जिके त्वं भद्रं नित्यं कुरुष्व मे ॥३॥ कुब्जिकापरं युज्यतां कुब्जपूर्वं कुब्जिकान्ततो मध्यतो ब्रह्मकुब्जिका ॥४॥

॥ इत्यथर्वणरहस्ये महाकुब्जिकाकाण्डे सिद्धिकुब्जिकासुक्तम् ॥