लाकुलपाशुपतसंप्रदाय का गुरुमण्डल तथा उनके ग्रंथ

मध्यकाल के आते आते भगवान लकुलीश के द्वारा प्रवर्तित लाकुलपाशुपतसंप्रदाय क्षीण हो चला था । लाकुलपाशुपतसंप्रदाय का स्थान अब त्रिक,सिद्धान्त इत्यादि नए शैवमत ले रहे थे। मध्यकाल के अंत तक पाशुपतसम्प्रदाय काल के धुंधले अन्धकार में समा गया, और अपने पीछे छोड़ गया अपने ध्वस्तावशेष ।
शैवसिद्धान्त सम्प्रदाय के अनुयायी लाकुलपाशुपतों को सर्वथा हेय मानते थे । काश्मीर के त्रिकसम्प्रदाय तथा कुलसंप्रदाय के अनुयायी लाकुलपाशुपतों को सर्वथा हेय नहीं मानते थें। वे लाकुलपाशुपतों के कुछ सिद्धांत स्वीकार करते थे , अन्य सिद्धांतो पर उनका मतभेद था । इन दोनों संप्रदायों ने कुछ अंश में लाकुलपाशुपतसम्प्रदाय को अपने अंदर समाहित कर लिया । श्रीसिद्धामत (अपरनाम- सिद्धयोगेश्वरीमत ) की गुरुपरम्परा में भगवान लकुलीश का नामोल्लेख मिलता है, जो इस तथ्य की पुष्टि करता हैं ।श्रीसिद्धादिविनिर्दिष्टा गुरुभिश्च निरूपिता ।
भैरवो भैरवी देवी स्वच्छन्दो लाकुलोऽणुराट् ॥ गहनेशोऽब्जजः शक्रो गुरुः कोट्यपकर्षतः ।
नवभिः क्रमशोऽधीतं नवकोटिप्रविस्तरम् ॥     (तंत्रालोक ३६.१-२)                                कुलसंप्रदाय की एक गुरुपरम्परा के अनुसार लकुलीश के शिष्य अनन्त की परम्परा में विश्वरूप नामक एक आचार्य हुए । ये विश्वरूप उत्तरतंत्र के सिद्धसाधक , लाकुलपाशुपतसम्प्रदाय के अनन्तगोत्र के थे । इन्ही के शिष्य श्रीमान अल्लट कुलशास्त्रों के विशेष प्रचारक तथा ज्ञाता हुए। लाकुलपाशुपतसम्प्रदाय की छोटी धाराएं अन्य संप्रदायों में विलीन हो गई तथा मुख्यधारा का लोप हो गया , पीछे रह गये तो बस उनके होने के प्रमाण । लाकुलपाशुपतसम्प्रदाय की गुरुपरम्परा में अठारह प्रधान पाशुपताचार्य हुए हैं । इन्हे ‘तीर्थकर’ भी कहा जाता था । पाशुपताचार्य भासर्वज्ञकृत ‘गणकारिका’ में कहा गया है- ततोऽवभृथस्नानं कृत्वा भगवंल्लकुलीशादीन्राशीकरान्तांश्च तीर्थकराननुक्रमेण यथावद्भक्त्या नमस्कुर्यात् तदनु प्रदक्षिणमेकमिति ॥ (गणकारिका-१.७.४९)      भगवान लकुलीश से स्वविद्यागुरु पर्यन्त अठारह आचार्यों के नाम का उल्लेख ‘तर्कसंग्रहदीपिका’ में मिलता हैं । इनके शुभनाम क्रमशःहै-
१) भगवान् श्रीलकुलीश
२) श्रीकौशिकपाशुपताचार्य
३) श्रीगार्ग्यपाशुपताचार्य
४) श्रीमित्रपाशुपताचार्य
५)श्रीकारूषपाशुपताचार्य
६) श्रीईशानपाशुपताचार्य
७) श्रीपारगार्ग्यपाशुपताचार्य
८) श्रीकपिलाण्डपाशुपताचार्य
९) श्रीमनुष्यकपाशुपताचार्य
१०) श्रीकुशिकपाशुपताचार्य
११) श्रीअत्रिपाशुपताचार्य
१२) श्रीपिङ्गलपाशुपताचार्य
१३) श्रीपुष्यकपाशुपताचार्य
१४) श्रीबृहदार्यपाशुपताचार्य
१५) श्रीअगस्तिपाशुपताचार्य
१६) श्रीसंतानपाशुपताचार्य
१७) श्रीराशीकरपाशुपताचार्य
१८) श्रीस्वविद्यागुरु अमुकपाशुपताचार्य
लाकुलपाशुपतसंप्रदाय के अनुयायी अपने इन अठारह पाशुपताचार्यों का नित्यस्मरण तथा प्रणाम किया करते थें । ‘तर्कसंग्रहदीपिका‘ के साथ साथ ‘गणकारिका‘ में भी लाकुलपाशुपतों की इस विधि का उल्लेख मिलता हैं ।
तत्रोपस्पृश्य कारणतीर्थकरगुरून् अनुप्रणम्य प्राङ्मुख उदङ्मुखो वा पद्मकस्वस्तिकादीनाम् अन्यतमं यथासुखम् आसनं बद्ध्वा कृतम् उन्नतं च कृत्वा शनैः संयतान्तःकरणेन रेचकादीन् कुर्यात् ॥ (गणकारिका-१.६.७६)  लाकुलपाशुपतसंप्रदाय में आठप्रमाण ग्रंथों का प्रचलन था । कालान्तर में जब पाशुपत सम्प्रदाय का पतन हुआ तब प्रमाणग्रंथ लुप्त हो गये । कुछ विद्वान प्रमाणों की संख्या चौदह मानते हैं। इन चौदह के नाम क्रमशः है –
१) पञ्चार्थप्रमाण
२) शिवगुह्यप्रमाण
३) रुद्राङ्कुशप्रमाण
४) हृदयप्रमाण
५) व्युहप्रमाण
६) लक्षणप्रमाण
७) आकर्षप्रमाण
८) आदर्शप्रमाण
९) पुराकल्पप्रमाण
१०) हाटकप्रमाण
११) शालकप्रमाण
१२) निरूक्तप्रमाण
१३) विश्वप्रमाण
१४) प्रपंचप्रमाण
हृदयप्रमाण के छः उपविभाग थे , जिनको उपप्रमाण कहा जाता था । भगवान लकुलीश के शिष्य मुसलेन्द्र ने इन छः उपप्रमाणों का संग्रह किया था। यदि इन उपप्रमाणों का योग कर लिया जाए तो कुल चौदहप्रमाण सिद्ध होते हैं । केवल पञ्चार्थप्रमाण का कुछ अंश महामाहेश्वराचार्य क्षेमराज के ‘स्वच्छन्दोद्योत‘ में मिलता हैं। कश्मीर के शैवसिद्धान्ताचार्य भट्ट रामकण्ठ हृदयप्रमाण का नामोल्लेख अपने ‘परमोक्षनिरासकारिकावृत्ति’ में करते हैं। सायणमाधव कृत ‘सर्वदर्शनसंग्रह’ के पाशुपतदर्शनप्रकरण में “इत्यादर्शकारादिभिस्तीर्थकरैर्निरूपितम् “
वाक्य में आदर्शप्रमाण का नामोल्लेख मिलता हैं। विभिन्न संप्रदायों के आचार्यों द्वारा उद्धृत होने तथा नामोल्लेख से इन प्रमाणग्रंथों की ऐतिहासिकता सिद्ध हो जाती हैं । दुर्भाग्यवश पञ्चार्थप्रमाण के ४ श्लोकों के अतिरिक्त इन ग्रंथों का कोई ओर अंश अप्राप्य हैं ।

भट्टारक लकुलीश के चतुर्भुज ध्यान को लिखकर लेख समाप्त करते हैं………शिवमस्तु ॐ ।
शोणाङ्गं डमरुञ्चशूलमपरे वामेऽभयं कुण्डिकां बिभ्राणस्मितभस्मराशितनुं पिङ्गोर्ध्वकेशावृतम् ।
त्र्यक्षं नीलगलं महोरगधरं हारादिभूषोज्वलं
ध्यायेऽहं लकुलीश्वरं सुरपतिं पद्मासनस्थं हृदि ॥