॥ पौराणिकसंध्याविधि:॥

शास्त्रों में सन्ध्या को अति महत्वपूर्ण आह्निककार्य घोषित किया गया है जिसके न करके से दोष होता हैं । जिस प्रकार त्रैवर्णिक द्विजातियों का २४ अक्षर की वैदिकी गायत्री में अधिकार है उसी प्रकार स्त्री तथा अन्य जनों को पौराणिक ३२ अक्षरों वाली गायत्री का अधिकार हैं । जिसका जप पौराणिक सन्ध्या वंदन के साथ किया जा सकता हैं।
पौराणिक गायत्री मंत्र निम्न है जो कि देविभागवत के अंतिम अध्याय में वर्णित हैं ।
सच्चिदानन्दरूपां तां गायत्री प्रतिपादिताम् ।
नमामि ह्रीँमयीं देवीं धियो यो नः प्रचोदयात् ॥
साधक सूर्याभिमुख होकर शिखाबंधन कर तीन बार आचमन करें ।
निम्न मंत्र से अपना प्रोक्षण करें । संसृक्षोर्निखिलं विश्वं मुहुः शुक्रं प्रजापतेः।
मातरः सर्वभूतानामापो देव्यः पुनन्तु माम् ॥
दोनों हाथों को जोड़ कर गायत्री का ध्यान कर आवाहन करें । 
श्वेतवर्णासमुद्दिष्टा कौशेयवसना तथा ।
श्वेतैर्विलेपनैः पुष्पैरलंकारैश्च भूषिता ॥ आदित्यमण्डलांतस्था ब्रह्मलोकगताथवा ।
अक्षसूत्रधरा देवी पद्मासनगता शुभा ॥   आगच्छ वरदे देवि त्र्यक्षरे ब्रह्मवादिनी । 
गायत्रीच्छन्दसां मातर्जपे मे सन्निधि भव ॥
तत्पश्चात पौराणिक गायत्री का
अष्ट/दश/शतबार जप करें ।
निम्न मंत्र से जप का समर्पण करें। गुह्यातिगुह्यगोप्त्री त्वं ग्रहाणास्मत् कृतं जपम् । सिद्धिर्भवतु मे देवि त्वत्प्रसादान् महेश्वरि ॥
तत्पश्चात देवी गायत्री का विसर्जन निम्न मंत्र से करें ।
महेश्वरवदनोत्पन्ना विष्णोर्हृदयसंस्थिता ।
ब्रह्मणा समनुज्ञाता गच्छ देवि यथेच्छया॥
निम्न मंत्र से सूर्य को तीन अर्घ्य देवें।
नमो विवस्वते ब्रह्मन् भास्वते विष्णुतेजसे ।
जगत्पवित्रे शुचये सवित्रे कर्मदायिने ॥ एषोऽर्घ: भगवते श्रीसूर्याय नमः॥
निम्नमंत्र से सूर्य का उपस्थान कर प्रणाम करें । उद्वयन्तमनाभासं परमं व्योम चिन्मयम् ।
अव्ययं सच्चिदाकाशमद्यन्म ज्योतिरुत्तमम् ॥
इतिसंध्याविधि:॥