त्रिशिरोभैरव

त्रिशिरोभैरव भगवान् परभैरव का सगुण रूप हैं । इनकी उपासना दक्षिणस्त्रोत के तंत्रों के अनुसार की जाती हैं ।’त्रिशिरोभैरवतंत्र’ जो कि अब अप्राप्य हैं इनकी ही उपासना से संबद्ध दक्षिणस्त्रोतागमग्रंथ था । त्रिशिरोभैरवतंत्र के कुछ अंशों को महामाहेश्वर अभिनवगुप्तपादाचार्य अपने तंत्रालोक में उद्धृत करते हैं । महामाहेश्वरअभिनवगुप्त की ही शिष्य परम्परा में उत्पन्न महामाहेश्वर जयरथाचार्य अपने मृत्युञ्जयभट्टारकतंत्र के नेत्रोद्योतभाष्य में त्रिशिरोभैरव को दक्षिणस्त्रोत से संबद्ध बताते हैं ।

” दक्षिणस्रोतःसमुत्थेषु
स्वच्छन्दचण्डत्रिशिरोभैरवादिषु भेदितं भेदसंहारित्वेन दीप्तविशिष्टरूपतया प्रतिपादितं भगवतो मृत्युजितः स्वरूपं वक्ष्यामि ॥ (नेत्रतंत्र के १०वे अध्याय )

रूद्रयामल के अंश विज्ञानभैरवतंत्र में भी दो बार त्रिशिरो भैरव का उल्लेख मिलता हैं ।

किं वा नवात्मभेदेन भैरवे भैरवाकृतौ ।
त्रिशिरोभेदभिन्नं वा किं वा शक्तित्रयात्मकम् ॥ ( विज्ञानभैरव श्लोक क्र० ३ )
तत्त्वतो न नवात्मासौ शब्दराशिर्न भैरवः ।
न चापि त्रिशिरा देवो न च शक्तित्रयात्मकः ॥ (विज्ञानभैरव श्लोक क्र०११ )

इन प्रमाणों से इतना तो सिद्ध होता हैं कि ९शती के पूर्व से कश्मीर देश में इनकी उपासना का बहुत प्रचार था जो कि यवन आक्रमणों के कारण १४ शती तक क्षीण होता चला गया । त्रिशिरो भैरव के मन्दिरों को यवनो द्वारा नष्ट करने का उल्लेख मिलता हैं । त्रिशिरोभैरव के तीन मुख घोर, अघोर तथा घोरतर हैं । त्र्यंबक भगवान् अपने हस्त चतुष्टय में त्रिशूल, कपाल , अमृतकमण्डल तथा रुद्राक्षमालिका धारण करते हैं । भगवान् की शक्ति त्रिशिरादेवी हैं । साथ हीं अनुचर वृषभ तथा श्वान हैं । कुछ आधुनिक इंडोलॉजीस्ट विद्वानों के अनुसार भगवान् दत्तात्रेय की मूर्तियों पर त्रिशिरोभैरव मूर्ति का प्रभाव हैं । वैसे देखा जाए तो दोनों देवताओं की प्रतिमाओं में कुछ हद तक साम्य दिखाई पड़ाता हैं । दोनों ही तीन मुख वाली हैं, दोनों के साथ गौवंश तथा श्वान दिखाईं पड़ते हैं तथा आयुधों में भी साम्य हैं । अंतर इतना हैं की त्रिशिरोभैरव के हस्त में कपाल हैं और दत्तगुरु के हस्त में नहीं अस्तु ।

कश्मीर से प्राप्त खंडित त्रिशिरोभैरव प्रतिमा

त्र्य॑म्बकं यजामहे सुग॒न्धिं पु॑ष्टि॒वर्ध॑नम् ।
उ॑र्वारु॒कमि॑व॒ बन्ध॑नान्मृ॒त्योर्मु॑क्षीय॒ मामृता॑त् ॥ हम त्रिशिरोभैरव का यजन करते हैं जो पुष्टि का वर्धन करने वाले है। जिस प्रकार खरबूजा पकने पर लता के बंधन से छूटता हैं उसी प्रकार हम मृत्यु के बंधन से छूट कर अमरत्व प्राप्त करें ।