mahAchInakrama tArA

Some goddesses are commonly worshipped in Buddhist and Hindu Tantric traditions. tArA, vajrayogini, ChinnamastA and vajravArAhI are best examples. Usually it is not easy to trace how and when these adaptations took place. In the case of mahAchInakrama tArA , a special form of tArA, it has long been suspected that the goddess was imported from the Buddhist pantheon into the Hindu tArAkula pantheon.Buddhist mahAchInakrama tArA is iconographically identical to one of several existing forms of tArA described in tArAkula tantras. Same mantra is employed for both goddesses. Colophon of bhaTTAchArya’s edition of sAdhanAmAlA states that nAgArjuna took the tradition of mahAchInakrama tArA from the inhabitants of bhoTa country (भोटेषु उद्धृतम् ). He identified bhoTadesha (Tibet ) with mahAchIna and concluded that mahAchInakramatArA worshipped by native inhabitants of Tibet probably professing the Bon religion of Tibet, entered the Buddhist pantheon with the Tantric nAgArjuna in the 7CE. Western scholar Tucci identified mahAchInadesha with kaNvara in the upper Sutlej valley.bhAratI held it to be included in the entire region to the north of the himAlaya, Tibet and at least parts of Mongolia and western China. BAgachi thought it to refer to Mongolia. ShAstrI and Weller held that it refers to China. Sarkar interpreting shaktisaNgamataNtra identified mahAchIna with Tibet .
mahAchInakramatArA is said to have been introduced to India by vashiShTa, who received the transmission from buddha in mahAchInadesha..

मयि आराधनाचारं बुद्धरूपी जनार्दनः ॥
जगामाचारविज्ञानवाञ्छया बुद्धरूपिणम् ।
ततो गत्वा महाचीनदेशे ज्ञानमयो मुनिः ॥
इति ब्रह्मयामले
बौद्धदेशेऽथर्ववेदे महाचीने सदा ब्रज |
तत्र गत्वा महाभावं विलोक्य मत्पदाम्बुजम् ॥
इतिरुद्रयामले

rudrayAmala and brahmayAmala have famous story of buddhavashiShTha vRRittAntaH. brahmA’s son vashiShTa, who worshipped the goddess tArA with austerities and vedic path unsuccessfully for a long time, is advised by the goddess herself to go to the mahAchInadesha and follow the atharvanic practice of left hand tArAkula. An intresting form of godess is discribed in buddhavashiShThavRRittAntaH

सा देवी परमा शक्तिः सर्वसङ्कटतारिणी । कोटिसूर्यप्रभा नीला चन्द्रकोटिसुशीतला ॥ स्थिरविद्युल्लताकोटिसदृशी कालकामिनी । सर्वस्वरूपा सर्वाद्या धर्माधर्मविवर्जिता ॥ शुद्धचीनाचाररता शक्तिचक्रप्रवर्तिका । अनन्तानन्तमहिमा संसाराणवतारिणी ॥
बुद्धेश्वरी बुद्धरूपा अथर्ववेदशाखिनी ॥
सा पाति जगतां लोकां स्तस्या कर्म चराचरम् ॥

Words shuddhachInAchAraratA , buddheshvarI, buddharUpA and atharvavedashAkhinI are to be noticed .
(१) shuddhachInAchAraratA – One who is worshiped by chInAchAra
(२) buddheshvarI- Deity worshiped by buddha
(३) buddharUpA – One having form of buddha
(४) atharvavedashAkhinI- Deity Belonging to branch of atharvaveda.
Intrestingly a text tAropaniShat is there belonging to saubhAgya kANDa of atharvaveda.This upnishad is solo shrutipramANa for tArA worship . click here to read tAropaniShat Teachings of buddha to vashiShTha is well-preserved in tArAkula text mahAchInakramasAra tantra alias AchArasAra tantra.
click here to download mahAchInakramasAra manuscript

Buddhist mahAchInakrama tArA bears akShobhya on her head. This is because the deities of the vajrayAna pantheon are considered emanations of five families of buddhas ( paNchatathAgatakula). In buddhist iconography of tArA he is desipated as buddha .

Nepalese Sketch of tArA

tArAkula discription of akShobhya on head of tArA is unusual and requires explanation. akShobhya is interpreted as an epithet of shiva. According to toDalatantra, shiva is called ‘ unshakeable’ because he drank the deadly halAhala poison without agitation .akShobhya is genraly decipated as having the form of a snake or akShobhya shiva sitting on a snake on TArA’s head. While the snake is absent from the Buddhist images. In the tArAkula tradition akShobhya also figures as the RiShi of tArAmaNtra .

tArA with akShobhya

The bone ornaments (paNchamudrA) of the goddess were interpreted as a garland of five skulls on her forehead . Buddhist kartRRi appears as a kind of dagger with a diamond sceptre on its handle, in contrast to its tArAkula representation as a pair of scissors .
In Buddhist sAdhanAmAlA goddess’s mUla mantra is given as OM hrIM trIM hUM phaT in Buddhist tradition , tArAkula tradition has preserved the variant strIM for trIM. The same mantra is employed for ekajaTI who shares many iconographical characteristics with mahAchInakramatArA . The mantra is said to grant eloquence and turn the yogin into a great poet. This must be the effect of the seed syllable trIM contained in it, which, according to the passage produces similar results when recited by itself. Meditative verses for mahAchIna kramatArA are

प्रत्यालीढपदां घोरां मुण्डमालाप्रलम्बिताम् ।
खर्वलम्बोदरां भीमां नीलनीरजराजिताम् ॥१॥
त्र्यम्बकैकमुखां दिव्यां घोराट्टहासभासुराम् ।
सुप्रहृष्टां शवारूढां नागाष्टकविभूषिताम् ॥२॥
रक्तवर्तुलनेत्रां च व्याघ्रचर्मावृतां कटौ ।
नवयौवनसम्पन्नां पञ्चमुद्राविभूषिताम् ॥३॥
ललज्जिह्वां महाभीमां सदंष्ट्रोत्कटभीषणाम् |
खड्गकर्त्रिकरां सव्ये वामोत्पलकपालधाम् ॥४॥
पिङ्गोग्रैकजटां ध्यायात् मौलावक्षोभ्यभूषिताम् ।
भावनाचलनिष्पत्तौ भवेद् योगी महाकविः ॥५॥

To be continued…………

॥ श्रीसूर्यभद्रमंडलम् ॥

सूर्यभद्रमंडलम् का निर्माण सूर्य देवता सम्बन्धी धार्मिक अनुष्ठानों में किया जाता हैं । सौर सम्प्रदाय के लोप के साथ ही सूर्यभद्रमण्डल के निर्माण तथा पूजन का क्रम दुर्लभ हो चला । सौरमत में उपरोक्त मण्डल का निर्माण तथा पूजन सौर दीक्षा, सौर प्रतिष्ठा तथा सौर उत्सव (रथसप्तमी आदि) के समय किया जाता था । भद्रमार्तण्डकार की ” सूर्य व्रतेषु सर्वेषु शस्यते मण्डलम्त्विदम् ” उक्ति से यह स्पष्ट हो जाता हैं ।
सूर्यभद्रमंडलम् रेखाभेद से दो प्रकार का होता हैं ।
दोनों प्रकार के मंडलों को कृष्ण, रक्त, पीत, श्वेत तथा हरित इन पांच रंगों से भरा जाता हैं परन्तु रंग विन्यास में भेद हैं। ( चित्रों के अध्ययन से पाठक सरलता से अंतर ज्ञात कर सकते हैं ।) मध्य में केसर तथा कर्णिकायुक्त अष्टदलकमल का निर्माण किया जाता हैं। इसी अष्टदलकमल के मध्य परब्रह्मरूप सूर्य की अष्टग्रहों के साथ पूजा की जाती हैं। बाह्यभाग में भगवान सूर्य की द्वादशमूर्तियों का निर्माण व्योमरूप में किया जाता हैं। इन्हीं द्वादश चित्रों में प्रत्येक मासाधिपति सूर्यमूर्ति की पूजा की जाती हैं। अन्य कोष्ठको मे सूर्य के अंगायुध तथा परिवारदेवताओं की पूजा की जाती हैं ।
(१) विंशतिरेखात्मकसूर्यभद्रमंडलम्
इस प्रकार के मंडल का निर्माण २०×२० रेखाओं से किया जाता हैं।

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(२) एकविंशतिरेखात्मकसूर्यभद्रमंडलम्– इस प्रकार के मंडल का निर्माण २१×२१ रेखाओं से किया जाता हैं।

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भगवान सूर्य के ध्यान के साथ ही लेख समाप्त किया जाता हैं। रक्ताब्जयुग्माभयदानहस्तं केयूरहाराङ्गदकुण्डलाढ्यम्। माणिक्यमौलिं दिननाथमीडे बन्धूककान्तिं विलसत्त्रिनेत्रम् ॥

॥ वासुदेवशब्दार्थनिर्णयम् ॥

द्वादशाक्षरमन्त्र के अंतर्गत वासुदेव पद का निरूपण किया जाता हैं। भगवान पाणिनि की अष्टध्यायी में वासुदेवारर्जुनाभ्यां वुञ्ं (४.३.९८) से वासुदेव के भक्त के अर्थ मेँ वासुदेवक शब्द व्युत्पन्न किया गया । किन्तु यह शब्द गोत्र क्षत्रिया रव्येभ्यो बहुलं वुञ्ं (४.३.९८) से भी व्युत्पन्न हो सकता था । ऐसा क्यों नहीं किया गया इसका कारण भगवान पतंजलि बताते हैं संज्ञैषा तत्र भवतः ( अथवा तत्र भगवतः) । वासुदेव यह भगवान् का नाम हैं। न क्षत्रियाख्या । यह किसी क्षत्रिय वर्ण मेँ उत्पन्न मनुष्य विशेष की आख्या नही हैं। तो फिर वासुदेव शब्द भी
वसुदेवस्य अपत्यं पुमान् । वासुदेव के पुत्र के रूप मे व्युत्पन्न नहीं होगा। यह स्वीकार करके हुए वासुदेव की व्युत्पत्ति की गई वस् निवसने धातु से “वह देव जो सर्वत्र निवास करता हैं” ।
वासुदेव शब्द की गुप्तकालीन विष्णुपुराण मे भी ऐसी ही निरुक्ती मिलती हैं यथा
सर्वत्राऽसौ समस्तं च वसत्यत्रेति वै यतः ।
ततः स वासुदेवेति विद्वभिः परिमीयते ॥ (१.२)
अन्यस्थल पर भी कहा गया हैं
भूतेषुवसते सोऽन्तर्वसन्त्यत्र च तानियात् ।
धाता विधाता जगतां वासुदेवस्ततः प्रभुः ॥ (६.५.८२)

नमो हेरम्बभैरवाय

हेरम्बभैरव गणपति का अत्यन्त गोपनीय भैरवस्वरूप हैं । हेरम्बभैरव का क्षिप्रसिद्धिप्रद दशाक्षरमंत्र द्वादशसहस्र श्लोकों वाले ब्रह्मयामल के ७६ पटल में निर्देशित हैं । हेरम्बभैरव दिगम्बर ,कपालधारण करने वाले, चतुर्हस्तीमुख तथा दश भुजाओं वाले हैं । जो महामूषकप्रेत पर आरूढ़ हैं। हेरम्बभैरवी इनकी शक्ति है जो कि इन्हीं के समान स्वरूप वाली हैं। हेरम्बभैरव का मण्डल अनेकों योगिनीगण से शोभित हैं । हेरम्बभैरव की साधना गाणपत्यवाममार्ग से की जाती हैं।

समयाचारसारम्

( स्वलिखित लघुतन्त्रकथा )

सायं काल से पूर्व कुछ अपराह्न का समय था कुलमार्तण्डदेव पश्चिमगामी हो चले थे ।
उज्जयिनी के हरसिद्धिपीठ पर महाभैरव ओर उनके शिष्यगण भगवति हरसिद्धि के दर्शन का लाभ ले रहे थे । मन्दिर के मध्य भाग की छत पर विशाल श्रीचक्र छत्राकाररूप में स्थापित था। इसी चक्र के नीचे बैठे गुरु ओर शिष्य गणों में वार्तालाप शुरू हुआ । कालभद्रभैरव ने गुरुवरमहाभैरव को नमस्कार किया तथा विनम्रता से पूछा हे भगवन् आपके श्री मुख से हमने पूर्व में श्रीविद्या के आनन्दभैरवमत , हयग्रीवमत तथा दक्षिणामूर्तिमत का ज्ञान प्राप्त किया अब आप समयाचारमत पर अपनी कुलमयवाणी से हम शिष्यो को कृतार्थ करे । अन्य शिष्यो ने भी कालभद्रभैरव की विनय का अनुमोदन किया । तब महाभैरव कुछ समय मौन रहे और कहने लगे श्रीविद्या के समयाचारमत के सिद्धांतो का सार कहता हूं जो इस प्रकार का ज्ञान रख ता है तथा उपासना करता है वह निश्चित ही शिव होता है । समय तथा शक्ति को समया कहा जाता है दोनो के साम्य को समयमत तथा समयमत के पथिक को समयाचारी । समयाचार में शिव तथा शक्ति में पूर्णतः समान है शेष और शेषी नहीं । समयाचारमार्ग पूर्णतः आंतरिक है, इसमें भगवति त्रिपुरा की उपासना दहराकाश में होती हैं । समयाचारी साधक समस्त बाह्य कर्मो को चित्ताकाश मेँ मानसिक रूप से करते है। इस पर द्रविड़शिष्य रामलिंगभैरव ने पूछा ” गुरूवर क्या समयमत के सिद्धांतग्रंथादि पर प्रकाश डाले । भद्र ! तुम उत्तम प्रश्न करते हो सुनो , समयाचारमार्ग के प्रधान ग्रंथ वशिष्ठ, सनक, शुक, सनन्दन तथा सनत्कुमार यह शुभागमपञ्चक है । समायाचार शिव और शक्ति के बीच अधिष्ठानसाम्य , अवस्थासाम्य, अनुष्ठानसाम्य, रूप साम्य तथा नामसाम्य रूपी पञ्चविध साम्यता के सिद्धांत को प्रतिपादित करता है। इस पर कश्मीरदेशिय शिष्य वेतालराजभैरव ने निवेदन कर कहा महाभट्टारक कृपया साम्यसिद्धांतो को विस्तृत रूप में कहे । उत्तमभद्र ध्यान से सुनो
अधिष्ठानसाम्य का अर्थ शिव तथा शक्ति का अधिष्ठान एक ही भित्ति पर अवस्थित होना होता है ।
अवस्थासाम्य अर्थ शिव तथा शक्ति की अवस्था के साम्य से है । चन्द्रचंद्रिकान्याय के द्वारा शिवशक्ति की अभिन्नता तथा एकरूपता सिद्ध होती है । जो शिव है वहीं शक्ति है , यह दोनों अभिन्न होकर भी भिन्न की तरह प्रतिभासित होते इसी कारण संसारभेदबुद्धि से अलग अलग तत्व कहता है । अनुष्ठानसाम्य का अर्थ शिवशक्ति के साधन,ध्यान,अनुष्ठान , मंत्र, प्रयोग तथा विधि में एकरुपता को कहते है । उदाहरणतया
सन्ध्या, आह्निक अङ्गन्यास,ध्यान, सकलिकरण , अमृतिकरण , पीठपुजा , आवरणपूजा शैव तथा शाक्त दोनो सम्प्रदायो मे किया जाता है तथा समान्तर विधि के द्वारा । खड्गरावण नामक एक विद्या दोनोसम्प्रदायो मे भिन्नरूप से उपासित होती है ।
एक अन्यमनीषी ने अनुष्ठानसाम्य का अर्थ शिवशक्ति दोनो के अनुष्ठान जन्यफल (शिवस्वरूप)
के साम्य को माना है । रूप साम्य तथा नामसाम्य शिवशक्ति दोनो के स्वरूप की सामनता तथा नाम की समानता को कहा गया है । शिव को नवात्मन कहे गये है। शैवमहावेध के सिद्धांत का भी प्रतिपादन किया गया है । गौड़देशियशिष्य शक्तिदासभैरव ने पूछा “दादा अन्य सिद्धांतो में शिव ओर शक्ति के सम्बन्ध में भी प्रकाश डाले । महाभैरव कहते है सुनो सौम्य शक्तिदासभैरव पूर्वकौलमत में भी शिवशक्ति की समानता का सिद्धांत प्रतिपादित है। उत्तरकौल मत में ‘शक्ति शेषी है शिव शेष ‘ सिद्धांत का प्रतिपादन हैं और शैवमत में ‘शिव शेषी है शक्तिशेष ‘सिद्धांत का । सभी शिष्य अब ध्यान से सुने ,अब समयमत के अनुसार श्रीचक्र का वर्णन किया जाता है। समयाचारमार्ग के अनुसार श्रीचक्र में ४ अधोमुख़ शिवत्रिकोण है तथा ५ ऊर्ध्वमुख शक्तित्रिकोण हैं। मूल बिंदु त्रिकोण के बाहर स्थित होता हैं ।
समयाचारी साधक त्र्यक्षरीबाला , पञ्चदशी
रमादिषोडशी (श्रीं युक्त पञ्चदशी )
तथा अष्टदशी ( क्लीं ह्रीँ श्रीं युक्त पञ्चदशी )
का उपयोग साधना मे करते हैं । सायं संध्या का समय होने को था सो महाभैरव ने शिष्यो के साथ शान्तिपाठ कर चक्र का उद्वासान कर दिया । सभी ने भगवति हरसिद्धि को नमस्कार किया तथा मालवगङ्गा क्षिप्रा की और प्रस्थान किया ।

अथर्ववेदीयहवनविधि:

साधक आचमन , प्राणायाम , सङ्कल्प तथा न्यास पैप्पलादगृह्यपद्धति के अनुसार करे ।

॥ अग्निस्थापन ॥

तुष, केश, रेत, भस्मादि निषेध वस्तु से रहित ईषुमात्र वेदी बनाना चाहिए । निम्न मंत्र से त्रिकोण बनावे तथा उसके मध्य में अग्निबीज (रँ) लिखे ।

ॐ दिव्यं चित्रमृतु या कल्पयन्तमृतूनामुग्रं भ्रमयन्नुदेति । तदाऽऽदित्य: प्रतरन्नेतु सर्वत आप इमान् लोकाननु सञ्चरंन्ति ॥
तब कांसे के पात्र में अग्नि मँगवाए और पूर्व मुख अग्नि निम्न मन्त्र द्वारा स्थापन करें –
ॐ अग्ने प्रेहिति मंत्रस्य अंगिरस ऋषि: अनुष्टुप् छन्द:। अग्निर्देवता । अमुकनामाग्न्यावाहने विनियोग:॥ ॐ अग्ने प्रेहि प्रथमो देवयतां , चक्षुर्देवानामुत मर्त्यनाम् । इयक्षमाणा भृगुभिः सजोषसः , स्वर्यन्तु यजमानाः स्वस्ति ॥३॥

तदनंतर निम्न मंत्र से अग्नि का तीन बार पर्युक्षण करे ।
ॐ अद्भिष्टवा परिणयामि , माप्याशङ्कयामि , मात्रात्वाग्ने परिणयामि। स मे पद्यन्त्वामृतं त्वाऽमृतेन परिणयामि , मामेष्वमृतमस्यमृतं मयि धेहि ॥

निम्न मंत्र से
वेदी के पूर्व में उत्तर की ओर अग्रभाग करके कुशा रखे ।
ॐ यज्ञस्य सन्ततिरसि यज्ञस्यत्वा सन्तत्या सन्तनोमि॥
पुनः वेदी के दक्षिण में पूर्व की ओर अग्रभाग पर कुशा रखे । पुनः वेदी के पश्चिम में उत्तर की ओर अग्रभाग करके कुशा रखे । पुनः वेदी के उत्तर में पूर्व की ओर अग्रभाग कर कुशा रखे ।

ॐ अग्निं आवाहयामि स्थापयामि इहागच्छ इह तिष्ठ ।
इस मन्त्र द्वारा पञ्चोपचार से पूजा करें । ॐ एतानि गंधाक्षतपुष्पधूपदीपनैवेद्यानि पावकाग्नये नमः ॥

तब हाथ में पुष्प लेकर प्रार्थना करें –

ॐ अग्ने शाण्डिल्यगोत्रमेषध्वज ! प्राङ्मुख मम सम्मुखो भव ॥

॥ समित् होम ॥

निम्न मंत्रो से समित् होम करे ।

ॐ तत्सवितुरिति मंत्रस्य विश्वामित्र ऋषि: । निचृद गायत्री छन्द:। सविता देवता । समिद्धहोमे विनियोग:॥
ॐ ब्रह्मजज्ञानमितिमंत्रस्य बृहस्पतिऋषि: । त्रिष्टुप् छन्द:। आदित्योदेवता समिद्धहोमे विनियोग:॥

ॐ ॐ स्वाहा ॥१॥इदं आत्मने इदं न मम ।
ॐ भू: स्वाहा ॥२॥ इदं अग्नये इदं न मम ।
ॐ भुवः स्वाहा ॥३॥इदं वायवे इदं न मम ।
ॐ स्व: स्वाहा ॥४॥ इदं सूर्याय इदं न मम ।
ॐ जनत् स्वाहा ॥५॥ इदं बृहस्पतये इदं न मम ।
ॐ वृधत् स्वाहा ॥६॥इदं वरुणास्य इदं न मम ।
ॐ करद् स्वाहा ॥७॥इदं इन्द्राय इदं न मम ।
ॐ रुहन् स्वाहा ॥८॥इदं यमाय इदं न मम ।
ॐ महत् स्वाहा ॥९॥इदं ब्रह्मणे इदं न मम ।
ॐ तद् स्वाहा ॥१०॥इदं विष्णवे इदं न मम ।
ॐ शं स्वाहा ॥११॥इदं रुद्राय इदं न मम ।
ॐ ॐ स्वाहा ॥१२॥ इदं परमात्मने इदं न मम । ॐ तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्यः धीमहि धियो यो नः प्रचोदयात स्वाहा ॥१३॥ इदं सवित्रे इदं न मम ।
ॐ पृथिवीशान्ति: ,अन्तरिक्षं शान्ति:, द्यौ: शान्ति:, आपः शान्ति:,औषधय: शान्ति:,वनस्पतयः शान्ति:,विश्वे मे देवा शान्ति:,सर्वे मे देवा शान्ति:, शान्ति:
शान्ति: शान्ति:, ताभि: शान्तिभि: सर्वशान्तिभि: शमयाऽमोहं यदिहघोरं यदिहक्रूरं यदिहपापं तच्छान्तं तच्छिवं सर्वमेवशमस्तु न: स्वाहा ॥१४॥ इदं पृथिव्यन्तरिक्षदिव्येभ्यः ओषधिभ्य: वनस्पतिभ्य: इदं न मम ।
ॐ ब्रह्म जज्ञानं प्रथमं पुरस्ताद् , वि सीमतः सुरुचो वेन आवः । स बुध्न्या उपमा अस्य विष्ठाः , सतश्च योनिमसतश्च वि वः स्वाहा ॥१५॥ इदं ब्रह्मणे इदं न मम ।

निम्न आहुतियाँ आज्य से दें –

ॐ प्राणाय स्वाहा ॥
इदं प्राणाय इदं न मम ।
ॐ अपानाय स्वाहा ॥
इदं अपानाय इदं न मम ।
ॐ अग्नये स्वाहा ॥ इदमग्नये इदं न मम ।
ॐ सोमाय स्वाहा ॥ इदं सोमाय इदं न मम ।
ॐ अग्निसोमाभ्यां स्वाहा ॥ इदं अग्निसोमाभ्यां इदं न मम ।
ॐ भूर्जनद् स्वाहा ॥
ॐ भुवो जनद् स्वाहा ॥
ॐ स्वर्जनद् स्वाहा ॥
ॐ भूर्भुवःस्वर्जनदों स्वाहा ॥

॥ प्रधानहोम ॥

अब जिन – जिन मन्त्रों की जितनी आहुतियाँ देनी हों वह देनी चाहिए ।

॥ प्रायश्चित्तहोम ॥

फिर नीचे लिखे मन्त्र से प्रायश्चित्तहोम करे –
ॐ अग्नये स्वाहा ॥
ॐ यज्ञाय स्वाहा ॥
ॐ ब्रह्मणे स्वाहा ॥
ॐ विष्णवे स्वाहा ॥
ॐ प्रजापतये स्वाहा ॥
ॐ अनुमतये स्वाहा ॥
ॐ अग्नये स्विष्टकृते स्वाहा ॥
ॐ त्रातारमिन्द्रमवितारमिन्द्रं हवे हवेसुहवं शूरमिन्द्रम्। ह्नयामिशक्रम्पुरुहूतमिन्द्रम् स्वस्तिनो मघवा धात्विन्द्रः स्वाहा ॥
ॐ ययोरोजसा स्कंभिता रजांसि यौ वीर्यैर् वीरतामा शचीभि: । यौ पत्येते अप्रतीतौ सहोभिर् विष्णुमगन् वरुणं पूर्वहूति: स्वाहा ॥

॥ पूर्णाहुति ॥
निम्न मन्त्र से पूर्णाहूति दें –
ॐ पूर्णहोम इति मंत्रस्य विश्वकर्मा ऋषि: । त्रिष्टुप्छन्द:। सूर्यो देवता अमुककर्मे पूर्णहोमे विनियोग:॥
ॐ पूर्णहोम: ब्रह्मणा यज्ञीयानां , घृताऽहुतेनाऽमृत-मादयन्ताम् । सर्वेभ्यो वो मधुमत् पिन्वमाना, सत्या: सन्तु यजमानस्य कामा:॥अब निम्न मंत्र से वेदी के चारों तरफ रखी हुई कुशओं को अग्नि में डाल दे ।
ॐ पवित्रं शतधारं दर्भं , सत्यजितं शुभम् । अस्मै यज्ञाय जुहूमस्तेन , पुष्वतनो: रयिम् ॥

॥ भस्मधारण ॥

अब श्रुवा से भस्म लेकर निम्न मन्त्र से भस्म लगाए –
ॐ त्र्यायुषं जमदग्ने: कश्यपस्य त्र्यायुषम् । त्रेधामृतस्य चक्षणं त्रीण्यायूँषि निस्कृधि ॥ हाथ में पुष्प लेकर प्रार्थना करें ।
ॐ क्षमस्व मन्त्रनाथाय नित्यानन्दमयाय च | धर्मार्थकाम मोक्षाय पुनरागमनाय च ॥
निम्न मंन्त्र से भगवति को समर्पित कर दे॥
अनेन होमेन श्री …………. प्रीयतां न मम॥