समयाचारसारम्

( स्वलिखित लघुतन्त्रकथा )

सायं काल से पूर्व कुछ अपराह्न का समय था कुलमार्तण्डदेव पश्चिमगामी हो चले थे ।
उज्जयिनी के हरसिद्धिपीठ पर महाभैरव ओर उनके शिष्यगण भगवति हरसिद्धि के दर्शन का लाभ ले रहे थे । मन्दिर के मध्य भाग की छत पर विशाल श्रीचक्र छत्राकाररूप में स्थापित था। इसी चक्र के नीचे बैठे गुरु ओर शिष्य गणों में वार्तालाप शुरू हुआ । कालभद्रभैरव ने गुरुवरमहाभैरव को नमस्कार किया तथा विनम्रता से पूछा हे भगवन् आपके श्री मुख से हमने पूर्व में श्रीविद्या के आनन्दभैरवमत , हयग्रीवमत तथा दक्षिणामूर्तिमत का ज्ञान प्राप्त किया अब आप समयाचारमत पर अपनी कुलमयवाणी से हम शिष्यो को कृतार्थ करे । अन्य शिष्यो ने भी कालभद्रभैरव की विनय का अनुमोदन किया । तब महाभैरव कुछ समय मौन रहे और कहने लगे श्रीविद्या के समयाचारमत के सिद्धांतो का सार कहता हूं जो इस प्रकार का ज्ञान रख ता है तथा उपासना करता है वह निश्चित ही शिव होता है । समय तथा शक्ति को समया कहा जाता है दोनो के साम्य को समयमत तथा समयमत के पथिक को समयाचारी । समयाचार में शिव तथा शक्ति में पूर्णतः समान है शेष और शेषी नहीं । समयाचारमार्ग पूर्णतः आंतरिक है, इसमें भगवति त्रिपुरा की उपासना दहराकाश में होती हैं । समयाचारी साधक समस्त बाह्य कर्मो को चित्ताकाश मेँ मानसिक रूप से करते है। इस पर द्रविड़शिष्य रामलिंगभैरव ने पूछा ” गुरूवर क्या समयमत के सिद्धांतग्रंथादि पर प्रकाश डाले । भद्र ! तुम उत्तम प्रश्न करते हो सुनो , समयाचारमार्ग के प्रधान ग्रंथ वशिष्ठ, सनक, शुक, सनन्दन तथा सनत्कुमार यह शुभागमपञ्चक है । समायाचार शिव और शक्ति के बीच अधिष्ठानसाम्य , अवस्थासाम्य, अनुष्ठानसाम्य, रूप साम्य तथा नामसाम्य रूपी पञ्चविध साम्यता के सिद्धांत को प्रतिपादित करता है। इस पर कश्मीरदेशिय शिष्य वेतालराजभैरव ने निवेदन कर कहा महाभट्टारक कृपया साम्यसिद्धांतो को विस्तृत रूप में कहे । उत्तमभद्र ध्यान से सुनो
अधिष्ठानसाम्य का अर्थ शिव तथा शक्ति का अधिष्ठान एक ही भित्ति पर अवस्थित होना होता है ।
अवस्थासाम्य अर्थ शिव तथा शक्ति की अवस्था के साम्य से है । चन्द्रचंद्रिकान्याय के द्वारा शिवशक्ति की अभिन्नता तथा एकरूपता सिद्ध होती है । जो शिव है वहीं शक्ति है , यह दोनों अभिन्न होकर भी भिन्न की तरह प्रतिभासित होते इसी कारण संसारभेदबुद्धि से अलग अलग तत्व कहता है । अनुष्ठानसाम्य का अर्थ शिवशक्ति के साधन,ध्यान,अनुष्ठान , मंत्र, प्रयोग तथा विधि में एकरुपता को कहते है । उदाहरणतया
सन्ध्या, आह्निक अङ्गन्यास,ध्यान, सकलिकरण , अमृतिकरण , पीठपुजा , आवरणपूजा शैव तथा शाक्त दोनो सम्प्रदायो मे किया जाता है तथा समान्तर विधि के द्वारा । खड्गरावण नामक एक विद्या दोनोसम्प्रदायो मे भिन्नरूप से उपासित होती है ।
एक अन्यमनीषी ने अनुष्ठानसाम्य का अर्थ शिवशक्ति दोनो के अनुष्ठान जन्यफल (शिवस्वरूप)
के साम्य को माना है । रूप साम्य तथा नामसाम्य शिवशक्ति दोनो के स्वरूप की सामनता तथा नाम की समानता को कहा गया है । शिव को नवात्मन कहे गये है। शैवमहावेध के सिद्धांत का भी प्रतिपादन किया गया है । गौड़देशियशिष्य शक्तिदासभैरव ने पूछा “दादा अन्य सिद्धांतो में शिव ओर शक्ति के सम्बन्ध में भी प्रकाश डाले । महाभैरव कहते है सुनो सौम्य शक्तिदासभैरव पूर्वकौलमत में भी शिवशक्ति की समानता का सिद्धांत प्रतिपादित है। उत्तरकौल मत में ‘शक्ति शेषी है शिव शेष ‘ सिद्धांत का प्रतिपादन हैं और शैवमत में ‘शिव शेषी है शक्तिशेष ‘सिद्धांत का । सभी शिष्य अब ध्यान से सुने ,अब समयमत के अनुसार श्रीचक्र का वर्णन किया जाता है। समयाचारमार्ग के अनुसार श्रीचक्र में ४ अधोमुख़ शिवत्रिकोण है तथा ५ ऊर्ध्वमुख शक्तित्रिकोण हैं। मूल बिंदु त्रिकोण के बाहर स्थित होता हैं ।
समयाचारी साधक त्र्यक्षरीबाला , पञ्चदशी
रमादिषोडशी (श्रीं युक्त पञ्चदशी )
तथा अष्टदशी ( क्लीं ह्रीँ श्रीं युक्त पञ्चदशी )
का उपयोग साधना मे करते हैं । सायं संध्या का समय होने को था सो महाभैरव ने शिष्यो के साथ शान्तिपाठ कर चक्र का उद्वासान कर दिया । सभी ने भगवति हरसिद्धि को नमस्कार किया तथा मालवगङ्गा क्षिप्रा की और प्रस्थान किया ।

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अथर्ववेदीयहवनविधि:

साधक आचमन , प्राणायाम , सङ्कल्प तथा न्यास पैप्पलादगृह्यपद्धति के अनुसार करे ।

॥ अग्निस्थापन ॥

तुष, केश, रेत, भस्मादि निषेध वस्तु से रहित ईषुमात्र वेदी बनाना चाहिए । निम्न मंत्र से त्रिकोण बनावे तथा उसके मध्य में अग्निबीज (रँ) लिखे ।

ॐ दिव्यं चित्रमृतु या कल्पयन्तमृतूनामुग्रं भ्रमयन्नुदेति । तदाऽऽदित्य: प्रतरन्नेतु सर्वत आप इमान् लोकाननु सञ्चरंन्ति ॥
तब कांसे के पात्र में अग्नि मँगवाए और पूर्व मुख अग्नि निम्न मन्त्र द्वारा स्थापन करें –
ॐ अग्ने प्रेहिति मंत्रस्य अंगिरस ऋषि: अनुष्टुप् छन्द:। अग्निर्देवता । अमुकनामाग्न्यावाहने विनियोग:॥ ॐ अग्ने प्रेहि प्रथमो देवयतां , चक्षुर्देवानामुत मर्त्यनाम् । इयक्षमाणा भृगुभिः सजोषसः , स्वर्यन्तु यजमानाः स्वस्ति ॥३॥

तदनंतर निम्न मंत्र से अग्नि का तीन बार पर्युक्षण करे ।
ॐ अद्भिष्टवा परिणयामि , माप्याशङ्कयामि , मात्रात्वाग्ने परिणयामि। स मे पद्यन्त्वामृतं त्वाऽमृतेन परिणयामि , मामेष्वमृतमस्यमृतं मयि धेहि ॥

निम्न मंत्र से
वेदी के पूर्व में उत्तर की ओर अग्रभाग करके कुशा रखे ।
ॐ यज्ञस्य सन्ततिरसि यज्ञस्यत्वा सन्तत्या सन्तनोमि॥
पुनः वेदी के दक्षिण में पूर्व की ओर अग्रभाग पर कुशा रखे । पुनः वेदी के पश्चिम में उत्तर की ओर अग्रभाग करके कुशा रखे । पुनः वेदी के उत्तर में पूर्व की ओर अग्रभाग कर कुशा रखे ।

ॐ अग्निं आवाहयामि स्थापयामि इहागच्छ इह तिष्ठ ।
इस मन्त्र द्वारा पञ्चोपचार से पूजा करें । ॐ एतानि गंधाक्षतपुष्पधूपदीपनैवेद्यानि पावकाग्नये नमः ॥

तब हाथ में पुष्प लेकर प्रार्थना करें –

ॐ अग्ने शाण्डिल्यगोत्रमेषध्वज ! प्राङ्मुख मम सम्मुखो भव ॥

॥ समित् होम ॥

निम्न मंत्रो से समित् होम करे ।

ॐ तत्सवितुरिति मंत्रस्य विश्वामित्र ऋषि: । निचृद गायत्री छन्द:। सविता देवता । समिद्धहोमे विनियोग:॥
ॐ ब्रह्मजज्ञानमितिमंत्रस्य बृहस्पतिऋषि: । त्रिष्टुप् छन्द:। आदित्योदेवता समिद्धहोमे विनियोग:॥

ॐ ॐ स्वाहा ॥१॥इदं आत्मने इदं न मम ।
ॐ भू: स्वाहा ॥२॥ इदं अग्नये इदं न मम ।
ॐ भुवः स्वाहा ॥३॥इदं वायवे इदं न मम ।
ॐ स्व: स्वाहा ॥४॥ इदं सूर्याय इदं न मम ।
ॐ जनत् स्वाहा ॥५॥ इदं बृहस्पतये इदं न मम ।
ॐ वृधत् स्वाहा ॥६॥इदं वरुणास्य इदं न मम ।
ॐ करद् स्वाहा ॥७॥इदं इन्द्राय इदं न मम ।
ॐ रुहन् स्वाहा ॥८॥इदं यमाय इदं न मम ।
ॐ महत् स्वाहा ॥९॥इदं ब्रह्मणे इदं न मम ।
ॐ तद् स्वाहा ॥१०॥इदं विष्णवे इदं न मम ।
ॐ शं स्वाहा ॥११॥इदं रुद्राय इदं न मम ।
ॐ ॐ स्वाहा ॥१२॥ इदं परमात्मने इदं न मम । ॐ तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्यः धीमहि धियो यो नः प्रचोदयात स्वाहा ॥१३॥ इदं सवित्रे इदं न मम ।
ॐ पृथिवीशान्ति: ,अन्तरिक्षं शान्ति:, द्यौ: शान्ति:, आपः शान्ति:,औषधय: शान्ति:,वनस्पतयः शान्ति:,विश्वे मे देवा शान्ति:,सर्वे मे देवा शान्ति:, शान्ति:
शान्ति: शान्ति:, ताभि: शान्तिभि: सर्वशान्तिभि: शमयाऽमोहं यदिहघोरं यदिहक्रूरं यदिहपापं तच्छान्तं तच्छिवं सर्वमेवशमस्तु न: स्वाहा ॥१४॥ इदं पृथिव्यन्तरिक्षदिव्येभ्यः ओषधिभ्य: वनस्पतिभ्य: इदं न मम ।
ॐ ब्रह्म जज्ञानं प्रथमं पुरस्ताद् , वि सीमतः सुरुचो वेन आवः । स बुध्न्या उपमा अस्य विष्ठाः , सतश्च योनिमसतश्च वि वः स्वाहा ॥१५॥ इदं ब्रह्मणे इदं न मम ।

निम्न आहुतियाँ आज्य से दें –

ॐ प्राणाय स्वाहा ॥
इदं प्राणाय इदं न मम ।
ॐ अपानाय स्वाहा ॥
इदं अपानाय इदं न मम ।
ॐ अग्नये स्वाहा ॥ इदमग्नये इदं न मम ।
ॐ सोमाय स्वाहा ॥ इदं सोमाय इदं न मम ।
ॐ अग्निसोमाभ्यां स्वाहा ॥ इदं अग्निसोमाभ्यां इदं न मम ।
ॐ भूर्जनद् स्वाहा ॥
ॐ भुवो जनद् स्वाहा ॥
ॐ स्वर्जनद् स्वाहा ॥
ॐ भूर्भुवःस्वर्जनदों स्वाहा ॥

॥ प्रधानहोम ॥

अब जिन – जिन मन्त्रों की जितनी आहुतियाँ देनी हों वह देनी चाहिए ।

॥ प्रायश्चित्तहोम ॥

फिर नीचे लिखे मन्त्र से प्रायश्चित्तहोम करे –
ॐ अग्नये स्वाहा ॥
ॐ यज्ञाय स्वाहा ॥
ॐ ब्रह्मणे स्वाहा ॥
ॐ विष्णवे स्वाहा ॥
ॐ प्रजापतये स्वाहा ॥
ॐ अनुमतये स्वाहा ॥
ॐ अग्नये स्विष्टकृते स्वाहा ॥
ॐ त्रातारमिन्द्रमवितारमिन्द्रं हवे हवेसुहवं शूरमिन्द्रम्। ह्नयामिशक्रम्पुरुहूतमिन्द्रम् स्वस्तिनो मघवा धात्विन्द्रः स्वाहा ॥
ॐ ययोरोजसा स्कंभिता रजांसि यौ वीर्यैर् वीरतामा शचीभि: । यौ पत्येते अप्रतीतौ सहोभिर् विष्णुमगन् वरुणं पूर्वहूति: स्वाहा ॥

॥ पूर्णाहुति ॥
निम्न मन्त्र से पूर्णाहूति दें –
ॐ पूर्णहोम इति मंत्रस्य विश्वकर्मा ऋषि: । त्रिष्टुप्छन्द:। सूर्यो देवता अमुककर्मे पूर्णहोमे विनियोग:॥
ॐ पूर्णहोम: ब्रह्मणा यज्ञीयानां , घृताऽहुतेनाऽमृत-मादयन्ताम् । सर्वेभ्यो वो मधुमत् पिन्वमाना, सत्या: सन्तु यजमानस्य कामा:॥अब निम्न मंत्र से वेदी के चारों तरफ रखी हुई कुशओं को अग्नि में डाल दे ।
ॐ पवित्रं शतधारं दर्भं , सत्यजितं शुभम् । अस्मै यज्ञाय जुहूमस्तेन , पुष्वतनो: रयिम् ॥

॥ भस्मधारण ॥

अब श्रुवा से भस्म लेकर निम्न मन्त्र से भस्म लगाए –
ॐ त्र्यायुषं जमदग्ने: कश्यपस्य त्र्यायुषम् । त्रेधामृतस्य चक्षणं त्रीण्यायूँषि निस्कृधि ॥ हाथ में पुष्प लेकर प्रार्थना करें ।
ॐ क्षमस्व मन्त्रनाथाय नित्यानन्दमयाय च | धर्मार्थकाम मोक्षाय पुनरागमनाय च ॥
निम्न मंन्त्र से भगवति को समर्पित कर दे॥
अनेन होमेन श्री …………. प्रीयतां न मम॥

चतुर्वेदीय-यज्ञोपवीत-धारणमन्त्राः

॥ पुनातु मां तत्सवितुर्वरेण्यम् ॥

चारों वेद की विभिन्न शाखाओं के द्विज गणो के हितार्थ यज्ञसूत्र धारण के मन्त्रों का संग्रह करता हूं ।
सर्वप्रथम अपनी शाखा के अनुसार आचमन कर प्राणायाम करें । तदनंतर स्वसंप्रदाय के अनुसार यज्ञोपवीत धारण का संकल्प करें । ( शाक्त, शैव , स्मार्त तथा वैष्णव संप्रदायों के संकल्पवाक्य में भेद हैं ।) तत्पश्चात् यज्ञोपवीत धारण मंत्र का विनियोग पढ़कर ३ बार जल छोड़े । ( # दाक्षिणात्य विनियोग पढ़कर ब्रह्मरंध , मुख तथा ह्रदय का स्पर्श करते हैं । उत्तर भारत में ३ बार जल छोड़ेने की परिपाटी हैं। )
अपने वेद की शाखा के अनुसार मंत्र पढ़कर यज्ञसुत्र धारण करें।
(१)अथर्ववेदीब्राह्मण
( मुख्यतः गुर्जरदेशीय नागरब्राह्मण , उत्कलदेशीयब्राह्मण, कश्मीरीब्राह्मण जिनकी शाखा पैप्पलाद हैं । ) निम्न मंत्र से यज्ञोपवीत धारण करें।
ॐ पिप्पलाद ऋषिः । यजुष्छन्दः। लिङ्गोक्तदेवता ।
यज्ञॊपवितधारणे विनियोगः ॥
ॐ तत्तेऽहं तन्तु बध्नाम्यायुषे वर्चसे ओजसे तेजसे यशसे ब्रह्मवर्चसाय च ॥

(२) ऋग्वेदीब्राह्मण
( शांखायन तथा अश्वालायन शाखा के )
निम्न मंत्र से यज्ञोपवीत धारण करें।
ॐ परमेष्ठीप्रजापति ऋषि: । यजुष्छन्दः। लिङ्गोक्तदेवता । यज्ञॊपवितधारणे विनियोगः ॥
ॐ यज्ञोपवीतमसि यज्ञस्यत्वोपवीतेनोपनह्यामि॥

(३) शुक्लयजुर्वेदी (उत्तर भारत के अधिकांश ब्राह्मण वाजसनेयी हैं। ) तथा कठयजुर्वेदी (कश्मीरीपण्डित ) निम्न मंत्र से यज्ञोपवीत धारण करें।
ॐ परमेष्ठीप्रजापति ऋषि: । त्रिष्टुप्छन्दः। लिङ्गोक्तदेवता । यज्ञॊपवितधारणे विनियोगः ॥
ॐ यज्ञोपवीतं परमं पवित्रं प्रजापतेर्यत् सहजं पुरस्तात् । आयुष्यमग्रयं प्रतिमुञ्च शुभ्रं यज्ञोपवीतम् बलमस्तु तेज: ॥

(४) सामवेदी ब्राह्मण निम्न मंत्र से यज्ञोपवीत धारण करें।
ॐ परमेष्ठीप्रजापति ऋषि: । यजुष्छन्दः। लिङ्गोक्तदेवता । यज्ञॊपवितधारणे विनियोगः ॥
ॐ यज्ञोपवीतमसि यज्ञस्य त्वा यज्ञोपवीतेनोपनह्यामि॥

तत्पश्चात् निम्न मंत्र से जीर्ण सूत्र का त्याग करें।
ॐ एतावद् दिन पर्यन्तं ब्रह्म त्वं धारितं मया । जीर्णात्वात् त्वत्परित्यागो गच्छ सूत्र यथासुखं ॥
पुनः आचमन कर यथाशक्ति गायत्रीमंत्र का जप करें । स्वेष्टदेवता को कर्म समर्पित करें।

॥ धूमावतीयन्त्रम् ॥

रक्ताङ्गीं रक्तवस्त्रां करिकरविलसत्कुंडलां चण्डदंष्ट्रां कंठोद्यद्रुंडमालां परिसरविलसच्छोभिपैशाचवृंदाम् ।
घोरां घोराट्टहासां करकलितकपालासिरौद्रां त्रिनेत्रां शत्रूणां प्राणहन्त्रीं शशिशिशुमकुटां भावयेद्धूम्रकालाम् ॥