सरलशिवपूजाविधिः

श्रावणमास भगवान शिव को अत्यंत्य प्रियकर हैं , अतः मुमुक्षु तथा भुभुक्षु दोनों प्रकार के साधकों को इस मास में अनिवार्य रूप से शिवपुजन करना चाहिए। वे साधक जो समयाभाव अथवा द्रव्याभाव से विस्तार पूर्वक शिवपूजा नहीं कर सकते तथा जनसामान्य जो निगमागमादि शास्त्रोक्तविधि से शिवपूजा करने में असमर्थ है , उन सभी के सहायतार्थ अत्यन्तस्वल्प शिवपूजा की विधि को लिखा जाता हैं।

साधक अपने सम्मुख नर्मदेश्वर/बाणलिङ्ग /पार्थिव शिवलिङ्ग (तीर्थक्षेत्र की मिट्टीका बना लिंग)/पारदेश्वर (पारद का बना लिंग) अथवा भगवान शिव का चित्रपट भद्रपीठ/बाजौट अथवा पात्र में स्थापित करें । पञ्चाक्षरमन्त्र से भस्म का त्रिपुण्ड तथा रुद्राक्ष मालिका धारणे करें । कुश अथवा कम्बल के आसान को बिछाकर उसका पूजन करें , तत्पश्चात् आसान पर बैठकर तीन बार आचमन तथा प्राणायाम करें । पुनः हाथ में जलगंधपुष्प रखकर देशकालादि का संकीर्तन करते हुए संकल्प वाक्य का पाठ करें ।  तत्पश्चात् शिवासन (जिस भद्रपीठ/बाजौट अथवा पात्र में लिङ्ग स्थापित किया गया हैं।) की पूजा करें । हाथ मे जल, गन्ध, बिल्वपत्र, अर्कपुष्प (आंकडा) लेकर लिङ्ग में भगवान शिव की मूर्ति का पूजन करें। ध्यानश्लोक का पाठ कर भगवान शिव के चैतन्य का आवाहन लिङ्ग में करें।  तत्पश्चात जो भी उपचार उपलब्ध होवें उनसे लिङ्ग में भगवान शिव का पूजन पंचाक्षर मंत्र से करें । द्रव्यों का आभाव होने पर पुष्प, पत्र तथा जल से ही पूजन करें । अगले दो मंत्रो से संक्षेप में भगवान शिव के पांचमुखों तथा छः अंगो के एकावरण का पूजन करें । तत्पश्चात् लिङ्ग की पीठिका (योनि/आधार) में भगवती पार्वती का पूजन करें। तत्पश्चात पुष्पांजलि देकर भगवान का विसर्जन करें ।

त्रिपुण्डधारण । रुद्राक्षमालिकाधारण ।
आसानपूजा ॐ कुर्मासनाय नमः॥
आचमन । प्राणायाम । संकल्प
ॐ अद्य० श्रीपरमेश्वरप्रीत्यर्थं स्वल्पविधानेन शिवपूजामहं
करिष्ये ॥ 
ॐ शिवासनाय नमः॥
ॐ शिवमूर्तये नमः॥
शङ्खकुन्देन्दुधवलं त्रिनेत्रं रुद्ररूपिणम् ।
सदाशिवेन रूपेण वृषारूढं विचिन्तयेत् ॥
चतुर्भुजं महात्मानं शूलाभयसमन्वितम् ।
मातुलुङ्गधरं देवमक्षसूत्रधरं प्रभुम् ॥
ॐ नमः शिवाय आवाहयामी स्थापयामी ॥
ॐ नमः शिवाय ॥
ॐ पञ्चवक्त्रेभ्यो नमः॥
ॐ षडङ्गेभ्यो नमः॥
ॐ नमः शिवायै ॥
ॐ नमः शिवाय उद्वासयामि ॥ 

(𑆯𑆳𑆫𑆢𑆳𑆬𑆴𑆥𑆴 𑆩𑆼𑆁 )
𑆠𑇀𑆫𑆴𑆥𑆶𑆟𑇀𑆝𑆣𑆳𑆫𑆟 𑇅 𑆫𑆶𑆢𑇀𑆫𑆳𑆑𑇀𑆰𑆩𑆳𑆬𑆴𑆑𑆳𑆣𑆳𑆫𑆟 𑇅
𑆄𑆱𑆳𑆤𑆥𑆷𑆘𑆳 𑆏𑆀 𑆑𑆶𑆫𑇀𑆩𑆳𑆱𑆤𑆳𑆪 𑆤𑆩𑆂𑇆
𑆄𑆖𑆩𑆤 𑇅 𑆥𑇀𑆫𑆳𑆟𑆳𑆪𑆳𑆩 𑇅 𑆱𑆁𑆑𑆬𑇀𑆥
𑆏𑆀 𑆃𑆢𑇀𑆪𑇐 𑆯𑇀𑆫𑆵𑆥𑆫𑆩𑆼𑆯𑇀𑆮𑆫𑆥𑇀𑆫𑆵𑆠𑇀𑆪𑆫𑇀𑆡𑆁 𑆱𑇀𑆮𑆬𑇀𑆥𑆮𑆴𑆣𑆳𑆤𑆼𑆤 𑆯𑆴𑆮𑆥𑆷𑆘𑆳𑆩𑆲𑆁
𑆑𑆫𑆴𑆰𑇀𑆪𑆼 𑇆
𑆏𑆀 𑆯𑆴𑆮𑆳𑆱𑆤𑆳𑆪 𑆤𑆩𑆂𑇆
𑆏𑆀 𑆯𑆴𑆮𑆩𑆷𑆫𑇀𑆠𑆪𑆼 𑆤𑆩𑆂𑇆
𑆯𑆕𑇀𑆒𑆑𑆶𑆤𑇀𑆢𑆼𑆤𑇀𑆢𑆶𑆣𑆮𑆬𑆁 𑆠𑇀𑆫𑆴𑆤𑆼𑆠𑇀𑆫𑆁 𑆫𑆶𑆢𑇀𑆫𑆫𑆷𑆥𑆴𑆟𑆩𑇀 𑇅
𑆱𑆢𑆳𑆯𑆴𑆮𑆼𑆤 𑆫𑆷𑆥𑆼𑆟 𑆮𑆸𑆰𑆳𑆫𑆷𑆞𑆁 𑆮𑆴𑆖𑆴𑆤𑇀𑆠𑆪𑆼𑆠𑇀 𑇆
𑆖𑆠𑆶𑆫𑇀𑆨𑆶𑆘𑆁 𑆩𑆲𑆳𑆠𑇀𑆩𑆳𑆤𑆁 𑆯𑆷𑆬𑆳𑆨𑆪𑆱𑆩𑆤𑇀𑆮𑆴𑆠𑆩𑇀 𑇅
𑆩𑆳𑆠𑆶𑆬𑆶𑆕𑇀𑆓𑆣𑆫𑆁 𑆢𑆼𑆮𑆩𑆑𑇀𑆰𑆱𑆷𑆠𑇀𑆫𑆣𑆫𑆁 𑆥𑇀𑆫𑆨𑆶𑆩𑇀 𑇆
𑆏𑆀 𑆤𑆩𑆂 𑆯𑆴𑆮𑆳𑆪 𑆄𑆮𑆳𑆲𑆪𑆳𑆩𑆵 𑆱𑇀𑆡𑆳𑆥𑆪𑆳𑆩𑆵 𑇆
𑆏𑆀 𑆤𑆩𑆂 𑆯𑆴𑆮𑆳𑆪 𑇆
𑆏𑆀 𑆥𑆚𑇀𑆖𑆮𑆑𑇀𑆠𑇀𑆫𑆼𑆨𑇀𑆪𑆾 𑆤𑆩𑆂𑇆
𑆏𑆀 𑆰𑆝𑆕𑇀𑆓𑆼𑆨𑇀𑆪𑆾 𑆤𑆩𑆂𑇆
𑆏𑆀 𑆤𑆩𑆂 𑆯𑆴𑆮𑆳𑆪𑆽 𑇆
𑆏𑆀 𑆤𑆩𑆂 𑆯𑆴𑆮𑆳𑆪 𑆇𑆢𑇀𑆮𑆳𑆱𑆪𑆳𑆩𑆴 𑇆

( বাংলায়)
ত্রিপুণ্ডধারণ । রুদ্রাক্ষমালিকাধারণ ।
আসানপূজা ওঁ কুর্মাসনায় নমঃ॥
আচমন । প্রাণায়াম । সংকল্প
ওঁ অদ্য০ শ্রীপরমেশ্বরপ্রীত্যর্থং স্বল্পবিধানেন শিবপূজামহং
করিষ্যে ॥
ওঁ শিবাসনায় নমঃ॥
ওঁ শিবমূর্তয়ে নমঃ॥
শঙ্খকুন্দেন্দুধবলং ত্রিনেত্রং রুদ্ররূপিণম্ ।
সদাশিবেন রূপেণ বৃষারূঢং বিচিন্তয়েৎ ॥
চতুর্ভুজং মহাত্মানং শূলাভয়সমন্বিতম্ ।
মাতুলুঙ্গধরং দেবমক্ষসূত্রধরং প্রভুম্ ॥
ওঁ নমঃ শিবায় আবাহয়ামী স্থাপয়ামী ॥
ওঁ নমঃ শিবায় ॥
ওঁ পঞ্চবক্ত্রেভ্যো নমঃ॥
ওঁ ষডঙ্গেভ্যো নমঃ॥
ওঁ নমঃ শিবায়ৈ ॥
ওঁ নমঃ শিবায় উদ্বাসয়ামি ॥

( ગુજરાતી લિપિમાં )

ત્રિપુણ્ડધારણ । રુદ્રાક્ષમાલિકાધારણ ।
આસાનપૂજા ૐ કુર્માસનાય નમઃ॥
આચમન । પ્રાણાયામ । સંકલ્પ
ૐ અદ્ય૦ શ્રીપરમેશ્વરપ્રીત્યર્થં સ્વલ્પવિધાનેન શિવપૂજામહં કરિષ્યે ॥
ૐ શિવાસનાય નમઃ॥
ૐ શિવમૂર્તયે નમઃ॥
શઙ્ખકુન્દેન્દુધવલં ત્રિનેત્રં રુદ્રરૂપિણમ્ ।
સદાશિવેન રૂપેણ વૃષારૂઢં વિચિન્તયેત્ ॥
ચતુર્ભુજં મહાત્માનં શૂલાભયસમન્વિતમ્ ।
માતુલુઙ્ગધરં દેવમક્ષસૂત્રધરં પ્રભુમ્ ॥
ૐ નમઃ શિવાય આવાહયામી સ્થાપયામી ॥
ૐ નમઃ શિવાય ॥
ૐ પઞ્ચવક્ત્રેભ્યો નમઃ॥
ૐ ષડઙ્ગેભ્યો નમઃ ॥
ૐ નમઃ શિવાયૈ ॥
ૐ નમઃ શિવાય ઉદ્વાસયામિ ॥

kulavAgIshvarI

kulavAgIshvarI is a deity of uttarAmnAya the northern currents, belonging to kulasampradAya and early traipurasampradAya . She was one of main four deities of early traipurakrama of kashmIra .Her worship is very rare this days, almost forgotten in present traipurasampradAya . As per some scholars cult of kulavAgIshvarI originated in kulagrAma (present Kulgama)of Kashmir and later transmitted to qualified upAsakAs in Northern India.

As per some scholars, cult of kulavAgIshvarI originated in kulagrAma (present Kulgama)of Kashmir and later transmitted to qualified upAsakAs in Northern India. As per another group of scholars ,cult of kulavAgIshvarI originated in uDDiyANapITha, while kulagrAma was one of main centre of kulavAgIshvarI cult. To prove this testimony a temple of bhagavatI kulavAgIshvarI still stand in kulagrAma. Jihadists tried to sack down this temple but there attempts failed. The temple still stands in heart of kulagrAma .An aniconic from of godess kulavAgIshvarI is installed in temple . This aniconic from of godess is covered in vermilion.

dakShiNAmUrti is RiShi (seer) of her mantra with paNkti meter. Her main vidyA is of sixteen laters.Another twenty four later mantra is used for her worship.She is worshiped on kadambalagolapITha a highly secret pitha of kulasampradAya. Her gurumaNDala consists of five divyaugha gurus, three siddhaughagurus and fourteen manavaugha gurus.Her yantra have five circkts (AvaraNas).
She is invoked to gain intellect , mastery over poetics and for knowledge of lost and hidden scriptures. Her samayavidyA is also of sixteen laters deployment for fulfilment of worship.
famous Kashmirian Anandakaula composed a paddhati for her worship , which still survives amongst close group of upAsakas who were initiated in her upAsanA krama .

devIM kadambavanagAmaruNa trikoNasaMsthAM sitAM sitavarAmbujakarNikAsthAm । satpustakAkShavalayAnvitapANipadmAM vAgIshvarIM kulaguruM praNamAmi nityam ॥
ह्रीँ श्रीँ कुलवागीश्वरीअम्बा पादुकां पूजयामि ॥

छुम्मासंकेतप्रकाश

महर्षि कश्यप की मानसपुत्री कश्मीर ने अपने गर्भ से अनेकों मतवादों तथा दर्शनों को प्रसूत किया । इन्हीं में ‘क्रम’ शाक्तधारा का प्राचीनतम दर्शन हैं। कालीनय, महानय, महार्थ इसी दर्शन की अपर संज्ञाएं हैं। क्रमदर्शन के प्राचीनतम ग्रन्थों में छुम्मासंकेतप्रकाश का अपना विशिष्ट स्थान हैं । छुम्मासंकेतप्रकाश में पीठेश्वरी देवियों के द्वारा मुखाम्नाय से प्रसारित की गई छुम्माओं तथा उन पर निष्क्रियानन्दनाथ की ‘प्रकाश’ नामक कारिकाएं का संकलन हैं । उपरोक्त कारण से इस ग्रन्थ का अभिधान छुम्मासंकेतप्रकाश हुआ। छुम्मासम्प्रदाय तथा छुम्मासंकेतक इसी ग्रंथ के अपर नाम हैं। ग्रंथ में कहा भी गया है –

पीठेश्वरीमुखायातगीतिचर्चामहोदयः॥-२१६

छुम्मासंकेतप्रकाश के अनुसार निष्क्रियानन्दनाथ पर अनुग्रह करने की इच्छा से सिद्धनाथ ने उनके अवलोकनार्थ एक पुस्तिका प्रदर्शित की तथा छुम्माओं के संकेत का उपदेश दिया । सिद्धनाथ के द्वारा बोधित होकर निष्क्रियानन्दनाथ क्रमिक निष्क्रियज्ञान को प्राप्ति हुए । 

शास्त्रप्रपञ्चविमुखोगताहं प्रत्ययो यदा।
तदा मया सिद्धनाथःसम्पृष्टःपुस्तकान्वितः॥८         
शास्त्रजालमिदंकिंस्याद्भ्रान्तिर्नाद्यापितेच्युता।
पश्येमां पुस्तिकां विप्र सिद्धनाथकरस्थिताम्॥१६
त्यक्तंसर्वमशेषेण शास्त्रजालं समन्ततः। त्यक्तशास्त्रप्रपञ्चेन सिद्धनाथेन धीमता॥२६
इत्युक्त्वा कृपायाविष्टो बोधयामास मां प्रभुः। किंचिच्छुम्मोपदेशन्तुसंकेतपदविस्तरं ॥२८

यह कथानक छुम्मासंकेतप्रकाश के अतिरिक्त वातुलनाथसूत्रों पर अनन्तशक्तिपाद के भाष्य में भी मिलता हैं , परन्तु निष्क्रियानन्दनाथ पर अनुग्रह करने वाले सिद्धपुरुष का नाम सिद्धनाथ के स्थान पर गन्धमादनसिद्ध बताया गया हैं । तृतीयसूत्र के भाष्य में
अनन्तशक्तिपाद लिखते हैं –

“श्रीमन्निष्क्रियानन्दनाथानुग्रहसमये  श्रीगन्धमादनसिद्धपादैरकृतक पुस्तकप्रदर्शनेन या परपदे प्राप्तिरूपदिष्टा सैव वितत्य निरूप्यते ॥ “

यह पुस्तिका पूर्व में पीठेश्वरी देवियों के मुखाम्नाय से चली आई छुम्माओं का संकलन थीं । छुम्मा प्राकृत में रचे सारगर्भितसूत्र को कहा गया है जो अपने गर्भ में अनेकों रहस्य समाए रहती हैं जिन्हें गुरुमुख से ही समझा जा सकता हैं । कहा भी गया हैं-

गुह्योपदेशु ॥६०
सततं भ्राजमानोऽपि सर्वेषां सर्वतः सदा ।
गुरुवक्त्रेण सम्प्राप्यो गुह्योऽयमुपदेशकः॥१४९

इस ग्रंथ में संकलित छुम्माएं प्राचीन कश्मीरी प्राकृत में रचित है,तथा कारिकाएं संस्कृत में। छुम्मासंकेतप्रकाश में १०५ छुम्माएं , ३० कथाएं तथा २५० श्लोकों की कारिकाओं का होना बताया गया हैं ।

पञ्चाधिकशतेनेहपदौघोयःस्थितःपरः। त्रिंशच्चर्चारहस्येननिर्भरस्तेनसर्वदा॥२१८

परन्तु उपलब्ध मातृकाओं में १०३ छुम्माएं , २७ कथाएं तथा २३१श्लोकों की कारिकाएं प्राप्त होती हैं। लिपिकों के प्रमाद से अथवा मातृका की अपूर्णता से यह स्खलन जान पड़ता हैं । छुम्मासंकेतप्रकाश के एक अपूर्ण संस्करण का प्रकाशन श्रीयुत डॉ. नवजीवन रस्तोगी महाशय द्वारा अपनी पुस्तक ‘ कश्मीर की शैव संस्कृति में कुल और क्रम मत ‘ के परिशिष्ट में किया गया हैं। इस संस्करण में ७५ छुम्माएं , २४ कथाएं तथा ७४ श्लोकों की कारिकाएं प्रकाशित की गई हैं । डॉ. नवजीवन रस्तोगी ने पण्डित दीनानाथ यक्ष जी के संग्रह में उपलब्ध अपूर्ण मातृका से इसे लिपिबद्ध किया था । कालान्तर में यक्षजी का संग्रह एक समुदाय विशेष के धार्मिकोन्माद की भेट चढ़ गया तथा यह मातृका नष्ट हो गई। डॉ. रस्तोगी जी के संस्करण की यह विशेषता है की इसमें छुम्माओं पर संस्कृत के साथ साथ प्राकृत में भी कारिकाएं दी गई हैं जो की अन्य मातृकाओं में उपलब्ध नहीं होती हैं । परन्तु सभी छुम्माओं की प्राकृतकारिकाओं को डॉ. रस्तोगी जी ने लिपिबद्ध नही किया था इसी कारण छूटी हुई कारिकाएं कालकवलित हो गई। शारदालिपि में लिखी गई बर्लिनमातृका में प्राकृत कारिकाएं नहीं हैं । डॉ. रस्तोगी जी साधुवाद के पात्र है जिन्होंने अपने पास उपलब्ध सामग्री को विद्वानों तथा विद्यार्थियों के अध्ययन हेतु प्रकाशित किया । जहां एक ओर ‘क्रम’ के अन्य ग्रन्थों पर ‘कुल’ का पूरा पूरा प्रभाव दिखता हैं वहीं छुम्मासंकेतप्रकाश विशुद्धरूप से क्रमदर्शन का ग्रन्थ हैं। एक ओर जहां क्रमदर्शन के अन्य ग्रन्थों में कुलमत के प्रभाव से मंत्र,ध्यान, पूजा,आद्ययाग तथा मेलापादि का समावेश किया गया वही छुम्मासंकेतक ने उसके विशुद्ध रूप को बरकरार रखा ।

अकथनकथा॥

अपूजा पूजा ॥

अमुद्रा मुद्रा ॥

अमन्त्रे मन्त्र॥

इत्यादि छुम्माएं क्रम के विशुद्धस्वरूप का वर्णन करती हैं। कालान्तर में पीठेश्वरी देवियों की इच्छा से वातुलनाथ नामक सिद्ध ने क्रमदर्शन संबंधी तेरह सूत्रों का साक्षात्कार, उच्छुष्मपाद नामक सिद्ध के अनुग्रह से किया । इन वातुलनाथसूत्रों पर भी छुम्मासंकेतप्रकाश का प्रभाव दृष्टिगोचर होता हैं। तृतीयसूत्र की व्याख्या अनन्तशक्तिपाद ने छुम्मासंकेतप्रकाश की सत्रह से लेकर पच्चीस तक की कारिकाओं के अनुसार ही की हैं । तेरहवें सूत्र पर भी छुम्मासंकेतप्रकाश का स्पष्टप्रभाव दृष्टिगोचर होता हैं । विज्ञानभैरव के ७६ वें श्लोक की व्याख्या में शिवोपाध्याय ने छुम्मासंकेतप्रकाश को उद्धृत किया हैं । इस प्रकार छुम्मासंकेतप्रकाश क्रमदर्शन का एक महत्वपूर्ण ग्रन्थ सिद्ध होता हैं । श्रीभट्ट प्रद्युम्न की उक्ति के साथ लेख समाप्त किया जाता हैं ।

यस्या निरुपाधि ज्योतीरुपायाःशिवसंज्ञया ।‌    व्यपदेशःपरां तां त्वामम्बां नित्यमुपास्महे ॥

ॐ शिवमस्तु…….।

ताराकुलसाधकों का तुलसी तथा हरिनामसंकीर्तन निषेधनिर्णय

पूर्व में भगवती श्रीश्रीतारा के दीक्षाक्रम पर लिखे गए लेख में तुलसी तथा हरिनामसंकीर्तननिषेध की चर्चा की थीं । इस पर कई मित्रों ने प्रश्न किया तथा कुछ तथाकथित विद्वानों के द्वारा आपत्ति उठाई गई थी । इसलिए इस विषय पर शास्त्रप्रमाण सहित लेख लिख रहा हूं । ( तथाकथित विद्वान पूर्वपक्ष का शास्त्रप्रमाण सहित उत्तर देंगे इस प्रकार साशाय होकर लिख रहा हूं। )
तंत्रशिरोमणि रुद्रयामल में भगवती चण्डिका के लिए तुलसी का स्पष्ट निषेध किया गया हैं।
रुद्रयामले-
तुलसीघ्राणमात्रेण क्रुद्धा भवति चण्डिका ॥
तुलसी की गंधमात्र से देवी चण्डिका क्रुद्ध हो जाती हैं।
यहां चण्डिका पद देवीमात्र का उपलक्षण हैं। अर्थात् चण्डिका के विषय में कही बात तारादि स्वरूपों पर भी लागू होती हैं। आगे भी भगवान रुद्र तुलसी का सुंदरी विषयक निषेध करते हैं।
रुद्रयामले-
तुलस्या गन्धमाघ्राय क्रुद्धा भवति सुन्दरी ॥
रुद्रयामल में अन्यत्र गणपति के लिए भी तुलसी का निषेध किया गया हैं। 
रुद्रयामले-
तुलसी ब्रह्मरूपा च सर्वदेवमयी शुभा ।
सर्वदेवमयी सा तु गणेशस्य प्रिया नहि ॥
कालीतन्त्र के अष्टमपटल के श्लोक क्रमांक २२ में भी तुलसी के निषेध संबंधी प्रमाणवचन प्राप्त होते हैं।
कालीतंत्रे –
सुगन्धिश्वेतलोहित्यैःकुसुमैरर्चयेत् दलैः। बिल्वैर्मरुवकाद्यैश्च तुलसी वर्जितैः शुभैः॥(८.२२.)
कालीतंत्र के ही दशमपटल में कहा गया हैं –
यथातारा तथाकाली यथा नीलातथोन्मुखी ॥ (१०.१ब)
इस प्रकार भगवती काली तथा भगवती तारा में अभेद होने से कालीपरकनिषेध तारा पर भी लागू होता हैं। 
आगे दशम पटल के २०वें श्लोक में कहां गया हैं-
यत्र यत्र कालिकेति नाम संश्रुयते प्रिये ।
तत्र तारा विधानञ्च युते नात्र संशयः ॥(१०.२०)
जहां जहां कालिका पद होवे वहां मिलितभावेन तारा विधान का अनुष्ठान करना चाहिएं।  इसमें कोई संशय नहीं करना चाहिएं।
यदि ये प्रमाण उन्हें अस्वीकार्य होवे तो भगवती तारा विषयक चीनाचारतंत्र के द्वितीय पटल के ३५वें श्लोक में भी इसी प्रकार का निषेध प्राप्त होता हैं ।
चीनाचारतंत्रे-
अपामार्गदलैर्भृंगैस्तुलसी वर्जितैः शुभैः॥(२.३५)
देवी भवतारिणी का बिल्व तथा मरुआ से अर्चन करे , परन्तु अपामार्ग, भृंगराज तथा तुलसी का वर्जन करें ।
मत्स्यसूक्त नामक आगमशास्त्र में भी इसी प्रकार का निषेध वचन प्राप्त होता हैं। 
मत्स्यसूक्ते –
सुगन्धिश्वेतलौहित्य कुसुमैरर्चयेत् कुलैः ।
बिल्वैर्मरुवकाद्यैश्च तुलसीवर्जितैः शुभैः॥
श्वेत तथा रक्तपुष्पों से शक्तिपूजा करें। बिल्व तथा मरूआ के पत्र से शक्तिपूजा करें परन्तु तुलसी का वर्जन करें ।
हरगौरीतंत्र में मालती तथा तुलसी का तारापूजा में निषेध किया गया हैं।
हरगौरीतंत्रे-
वर्जयेन् मालतीपुष्पं वर्जयेत् तुलसीदलम् ॥
त्रिशक्तिरत्न नामक आगम में कुछ इसी प्रकार का वचन प्राप्त होता हैं।
त्रिशक्तिरत्ने-
तुलसीमालतीवर्जं पुष्पं दद्यात् प्रसन्नधीः॥
कौलागम में भी कहा गया हैं।
भैरवीसुन्दरीकालीताराविघ्नविवस्वताम् ।
तुलसीवर्जिता पूजा सा पूजा सफला भवेत् ॥
भैरवी,सुन्दरी,काली,तारा, गणपति तथा सूर्य के पूजन मे तुलसी का वर्जन करें ।
रही बात हरिनामसंकीर्तननिषेध की तो तंत्रचूडामणि मे इस विषयक प्रमाण वाक्य मिलता हैं ।
वर्जयेद्विष्णुनामञ्च वर्जयेत्तुलसीदलम् ।
वर्जयेन्मालतीपुष्पं वर्जयेदन्यपूजनम् ॥
अर्थात् ताराकुल का साधक विष्णु का नाम, तुलसीपत्र, मालतीपुष्प तथा अन्य देवताओं के पूजन का वर्जन करें । तन्त्रांतर में भी  हरेर्नाम न गृह्णीयात् ॥ इस प्रकार का विधि वाक्य प्राप्त होता हैं । अंत में सुधिजनों तथा सामान्य पाठकों से इतना ही कहना चाहूंगा की ताराकुल के साधकों को तुलसी तथा हरिनामसंकीर्तननिषेध शास्त्रसम्मत हैं , मैंने द्वेषवश अथवा प्रमाद के कारण ऐसा नहीं लिखा हैं …… अस्तु ।
ॐ ताराम्बार्पणमस्तु ॥

जयद्रथयामल के परिप्रेक्ष्य में भगवती सिद्धिलक्ष्मी

भगवती सिद्धिलक्ष्मी कालीकुलक्रम की देवता विशेष है, जिनकी उपासना का प्रारम्भ विस्तृत कश्मीर के उड्डीयाणपीठ के करवीर महाश्मशान से हुआ । उड्डीयाणपीठ से सिद्धिलक्ष्मी उपासना की धारा उत्तरभारत के कुछ भागों में तथा नेपाल तक जा पहुंची । नेवारसमुदाय के मल्लराजाओं ने सिद्धलक्ष्मी उपासना को अपने राज्य में प्राश्रय दिया। स्वयं मल्लराजपुरुषों ने आचार्यों से दीक्षाभिषेक प्राप्त कर भगवति सिद्धलक्ष्मी की उपासना की । मल्लराजवंश में जब तक सिद्धिलक्ष्मी की उपासना चलती रही, तब तक उनका राज्य अक्षुण्ण रहा । कालानलतंत्र में कहा भी गया हैं –
पुत्रपौत्रान्वितो भूत्वा चिरजीवीभवेन्नरः ।
विवादे विजयो नित्यं संग्रामे विजयस्तथा ॥
राजकन्या भवेत् पत्नी राजा च वशगो भवेत् ।
सर्वदा ज्ञातिश्रेष्टोऽपि बन्धुभर्त्ता सदाभवेत् ॥
रिपूणां वीर्यविध्वंसी भवत्येव न संशयः ।
अन्तकाले गतिस्तस्य निशामय मम द्विज ॥
सिद्धिलक्ष्मी प्रसादेन साधकस्य फलं शृणु ॥
भगवती सिद्धिलक्ष्मी के प्रसाद से साधक पुत्रपौत्रादि से युक्त होकर चिरायु को प्राप्त करता हैं । राजवंश की कन्या प्राप्त करता है तथा अपनी जाति में श्रेष्ठ होता हैं। शत्रुओं का नाश कर इनका साधक अंत में मोक्ष को प्राप्त करता हैं। कालानलतंत्र के अनुसार श्रीकामकलाकाली,श्रीगुह्यकाली,श्रीछिन्नमस्ता,श्रीतार,श्रीकालसंकर्षिणी तथा श्रीसिद्धिलक्ष्मी अभेद हैं । इनमे कोई भेद नहीं है, मात्र मूर्त्यान्तर हैं ।
यथा कामकलाकाली गुह्यकाली तथा द्विज ।
यथा छिन्ना यथा तारा वज्रकापालिनी यथा ॥
सिद्धिलक्ष्मीः तथा देवी विशेषोनास्ति कश्चन ॥

ह्रीँ श्रीँ श्रीसिद्धिरमाम्बापादुकां पूजयामि ॥

भगवान सिद्धेश्वर इनके भैरव हैं। ये उत्तराम्नाय से संबंधित देवी हैं। उड्डीयाणपीठ में भैरव तथा योगिनियों के मेलापोत्सवरूपी डामरयाग के मध्य भगवती सिद्धिलक्ष्मी का प्राकट्य हुआ । महाभैरव ने इनकी उपासन का उपदेश दिव्ययोगिनियों को दिया । दिव्ययोगिनियों से सिद्धों को यह उपासना प्राप्त हुईं । सिद्धों ने अधिकारी व लक्षणसंपन्न वीरों तथा योगिनियों को इस उपासना का उपदेश दिया। इनकी उपासना करने वाले कापालिक डामरक कहलाते थें। श्रीत्रिदशडामरमहातन्त्र के अनुसार
इस शक्तिविशेष को जयद्रथयामल में सिद्धिलक्ष्मीप्रत्यङ्गिरा,झंकारभैरवतन्त्र में चण्डकापालिनि तथा कुलडामर में शिवा कहा गया हैं।
प्रत्यङ्गिरात्वियं देवि सिद्धिलक्ष्मी जयद्रथे ।
झंकारभैरवे चण्डा शिवान्तु कुलडामरे ॥
२४,००० श्लोकों वाले जयद्रथयामल के द्वितीयषट्क में भगवती सिद्धिलक्ष्मी की उपासना का विशद वर्णन मिलता हैं। द्वितीयषट्क के २१वें पटल में भगवती सिद्धिलक्ष्मी के मूलमालामन्त्र का उद्धार दिया गया हैं।
इस पटल की पुष्पिका का पाठ इस प्रकार है-
…..श्रीजयद्रथयामलेविद्यापीठेभैरवस्रोतसिशिरश्च्छेदे
चतुर्विंशतिसाहस्रेद्वितीयषट्केश्रीसिद्धलक्ष्मीविधाने
मूलमालामन्त्रप्रकाशएकविंशतितमःपटलः…..
इस पटल पर वशिष्ठकुलोत्पन्न किसी आचार्य की लघुटीका भी हैं, जिसकी पुष्पिका का पाठ निम्न हैं ।
इतिवाशिष्ठायमतेजयद्रथेमालामन्त्रटीका॥
जयद्रथयामल में भगवती सिद्धिलक्ष्मी को कालसंकर्षिणी का ही एक स्वरूप माना गया हैं। इनका अभेद पूर्व में कह आए है सो आगे चर्चा नहीं करते । जयद्रथयामल में भगवती सिद्धिलक्ष्मी की सत्रह अक्षरों वाली विद्या तथा समयमालामंत्र की प्रधानता हैं। इन्हीं दोनों मंत्रों की साधनविधि तथा प्रयोगविधि का वर्णन विशेष रूप से इस ग्रंथ में प्राप्त होता हैं। २१वें पटल के प्रारम्भ में कहा भी गया हैं –
उद्धृत्ता परमाविद्या सुखसौभाग्यमोक्षदा
शतद्वयं च वर्णानां नवत्यधिकमुद्धृतम् ॥
एषा विद्या महाविद्या नाम्नात्रैलोक्यमोहिनी।
लक्ष्मीश्वरीति विख्याता बुहुभोगभरावहा ।
महालक्ष्मी महाकान्ता सर्वसौभाग्यदा स्मृता ।
अस्मिन्स्रोतसि देवेशि नानया सदृशी परा ॥
अन्य आगमों में भगवती सिद्धिलक्ष्मी की नवाक्षरी, सप्त दशाक्षरी, सहस्राक्षरी तथा आयुताक्षरी विद्याओं की प्रधानता हैं। द्वितीयषट्क के अंतिम १० पटलों में  सिद्धिलक्ष्मीकल्प के नाना प्रयोगों का वर्णन मिलता हैं जिनके नाम निम्न हैं
(१) प्रथमप्रतिहारविधिः
(२) द्वितीयप्रतिहारविधिः
(३) तृतीयप्रतिहारविधिः
(४) प्रतिहारसाधनविधिः
(५) शिरसाधनविधिः
(६) शिखासाधनविधिः
(७) केशसाधनविधिः
(८) अस्त्रसाधनविधिः
(९) यक्षिणीचक्रम्
(१०) यक्षिणीचक्रप्रयोगविधिः
इनमे प्रथम तीनपटल कृत्यादिप्रयोग के प्रतिहार की विधि को निर्देशित करते हैं। चतुर्थपटल रक्षापुरुष को प्रकट करने के प्रयोग का वर्णन करता हैं । आगे के चार पटलों में सिद्धिलक्ष्मी के अंगमंत्रो का साधन कहा गया हैं। अंतिम दो पटल यक्षिणीचक्र तथा यक्षिणीप्रयोगों की विधि का उल्लेख करते हैं। इन पटलों के अंत में निम्न पुष्पिका प्राप्त होती हैं । 
….श्रीजयद्रथयामलेविद्यापीठेभैरवस्रोतसिशिरश्च्छेदे
चतुर्विंशतिसाहस्रेद्वितीयषट्केश्रीसिद्धलक्ष्मीविधाननानाकल्पम् ….
जयद्रथयामल के अनुसार सिद्धिलक्ष्मी की उपासना
सभी उप्लवों का नाश करनेवाली,सर्वश्रेष्ठ,अत्यन्तउग्र सर्वसम्पत्प्रदायिनी हैं। इस विद्या के सामन १४ भुवनों में कोई और उग्रताम विद्या नहीं हैं। 
जयद्रथयामल में भगवती भैरवी ने कहा भी हैं –
सर्वसाधारणी घोरा सर्वोपप्लवनाशिनी । सर्वसम्पत्प्रदाश्रेष्ठा सर्वसम्पत्प्रदायिका ॥
अस्यां विज्ञातमात्रायां विभूति संप्रवर्तते ।
अस्याः घोरतरानान्या विद्यते भुवनोदरे ॥
भगवान भैरव ने भी इस विद्या की भूरी भूरी प्रशंसा की हैं ।
अलक्ष्मीशमनी ज्ञेया दुष्टदारिद्र्यमर्दिनी ।
कलिदुस्स्वप्नशमनी जात्योपद्रवनाशिनी ॥
राजोपसर्गशमनी दुष्टदस्यु विनाशिनी ।
सदारण्यभये घोरे सिंहव्याघ्रसङ्कटे ॥
यह विद्या अलक्ष्मी, दुष्टजनों तथा दारिद्रय का नाश करने वाली हैं। कलि के प्रभाव , दुस्स्वप्न, जात्योपद्रव, राजोपसर्ग तथा दुष्टदस्युओं का नाश करने करने वाली हैं। अरण्य,सिंह,व्याघ्र, सङ्कट तथा भय से रक्षा करने वाली हैं। जयद्रथयामल के अतिरिक्त झंकारभैरवतन्त्र, कुलडामर,श्रीकालिकुलसद्भावमहातन्त्र,श्रीसिद्धिलक्ष्मीमत,श्रीउमायामल,श्रीमहाकुलक्रमडामर,श्रीगुह्यकुलक्रम,श्रीकालसंकर्षणिमत, श्रीकालानलतंत्र तथा श्रीमेरुतंत्र मे भी सिद्धिलक्ष्मी की उपासना का वर्णन मिलाता हैं ‌।
सिद्धिलक्ष्मी गायत्री से लेख का समापन करते हैं।
ॐ सिद्धिरमायै विद्महे दशभुजायै धीमहि तन्नो देवी प्रचोदयात् ॥
ॐ शिवमस्तु……….।

जय मां सिद्धलक्ष्मी

श्रीश्रीतारा के दीक्षाक्रम तथा अङ्गविद्याओं का निरूपण

भगवती श्रीश्रीतारातारिणी के दीक्षाक्रम तथा अंगविद्याओं का निरूपण ‘तारिणीमन्त्रकल्प’ के अनुसार किया जाता हैं। भगवती तारा के दीक्षाक्रम में श्रीगुरु साधक को निम्न मंत्रों की क्रम से देते हैं। 
(१) स्पर्शतारा
(२) चिंतामणितारा
(३) सिद्धिजटा
(४) उग्रतारा (सार्द्धपंचाक्षरीमंत्र)
(५) हंसतारा 
(६) निर्वाणतारा (पूर्णाभिषेक)
(७) महानीलतारा
(८) नीलशाम्भवरश्मिक्रम
(९) महानीलोत्तररश्मिक्रम
(१०) सम्राटाभिषेक (महापूर्णाभिषेक)
इस प्रकार का अत्यन्त रहस्यमय महागोपनीय श्रीताराक्रम प्राप्त कर अधिकारी साधक कृतकृत्य हो, साक्षात् अक्षोभ्यशिव की तरह भूमि पर विचरण करता हैं। ‘तारिणीमन्त्रकल्प’ में इस दीक्षाक्रम को ‘महानीलताराक्रम‘ अभिधान दिया गया हैं ।
इन प्रधान मंत्रों के साथ साथ भगवती के ४२ अंगमंत्रों की भी साधक दीक्षा प्राप्त करता हैं। तारिणीमंत्रकल्प के अनुसार भगवती तारा के ४२अंगदेवता निम्न हैं ।
(१) वटुक
(२) क्षेत्रपाल
(३) योगिनी
(४) गणपति
(५) अक्षोभ्यभैरव
(६) विजयाविद्या
(७) अग्नि
(८) चण्डघण्टा
(९) षोढापञ्चक (लघुषोढा, महाषोढा, गुह्यषोढा, हंसषोढा तथा क्रमषोढा)
(१०) कामदेव
(११) सोम
(१२) कुल्लुकापञ्चक (१३) आर्द्रपटिका
(१४) शिवपञ्चाक्षर
(१५) अघोर
(१६) पाशुपत
(१७) सुदर्शन
(१८) जयदुर्गा
(१९) अमोघफलदा
(२०) यक्षि
(२१) पद्मावती
(२२) उद्भटाम्बा
(२३) वौद्धनाथ 
(२४) पार्श्वनाथ
(२५) तारिणी
(२६) यक्षिणी
(२७) मञ्जुघोष
(२८) महेश्वर
(२९) प्रत्यङ्गिरा 
(३०) नारसिंही 
(३१) अष्टभैरव
(३२) पञ्चकल्पलता
(३३) सर्वकामप्रदाविद्या
(३४) रक्तचामुण्डा
(३५) नित्यक्लिन्ना
(३६) राजवश्यकरा
(३७) खड्गरावण
(३८) लुलायखरशार्दूलकपिवश्यविद्या
(३९) धनुर्विद्या
(४०) अस्त्रविद्या
(४१) जलाग्निस्तम्भिनीविद्या
(४२) भयद्वादशहारिणीविद्या
इस क्रम से इतर ‘चीनाचारक्रम‘ भी है, जिसमे अन्य प्रकार से श्रीश्रीतारा की क्रमदीक्षा होती हैं। चीनक्रम पुनः पाँच प्रकार का है ।
(१) ब्रह्मचीनक्रम
(२) वीरचीनक्रम
(३) दिव्यचीनक्रम
(४) महाचीनक्रम
(५) निष्कलचीनक्रम
महाचीनक्रम पुनः दो प्रकार का है ।
(१) सकलमहाचीनक्रम – सुगतकुलसाधकों के लिए।
(२) निष्कलमहाचीनक्रम -ताराकुलसाधकों के लिए। 
ताराकुल का निष्कलमहाचीनक्रम श्रीकुल के समयाचार के साथ साम्य रखता हैं।
निष्कलमहाचीनक्रम का उपदेश महारुद्रनाथ ने शङ्करनाथ को किया।  शङ्करनाथ से महाचीननाथ ने कैलाश में उपदेश प्राप्त किया । महाचीननाथ से वशिष्ठमुनि ने निष्कलचीनाचार का उपदेश ग्रहण कर मानवों में इसका प्रचार किया। महाचीनक्रम की यह गुरुपरंपरा है । महाचीननाथ से बोद्धिसत्वों ने सकलमहाचीनक्रम का उपदेश प्राप्त कर बौद्धसिद्धों को इसका उपदेश किया । इन्ही सिद्धों से यह परम्परा लामाओं तक पहुंचीं । ताराकुल के साधकों के हितार्थ संक्षेप में महाचीनाचारतंत्र में उपदिष्ट निष्कलमहाचीनक्रम का वर्णन किया जाता हैं। निष्कलमहाचीनक्रम में बाह्यशौच वर्जित हैं ,मानसिक शौच का विधान हैं । निष्कलमहाचीनक्रम में मानसिकजप तथा मानस पूजन ही श्रेष्ठ है । मानसिक तर्पण ही स्वीकार हैं । आराधना के लिए कोई काल अशुभ नहीं है । दिन रात निशा महानिशा में कोई भेद नहीं होता । वस्त्र, आसन तथा स्थानशुद्धि का कोई नियम नहीं हैं । निष्कलमहाचीनक्रम के साधक का मन को निर्विकल्प और वासनहीन होना चाहिए । साधक चिंता तथा निन्दा का सर्वथा त्याग करे। मूलमंत्र के अतिरिक्त अन्य मंत्रो का जाप न करे ।  रात्रि में भोजनोपरान्त साधना करने का विधान है । मूल मंत्र से महानिशाकाल में बलि दे । जपस्थान में  महाशंख रखकर वा उसके ऊपर बैठकर जप करे। स्त्रीदर्शन करके साधना करे । ताम्बूल , दधि, मधु तथा यथा रूचि भोजन करे । तत्पश्चात् जप करे ।  सर्वदासंतुष्ट रहे । अपने आप को कृत कृत्य माने।
निष्कलमहाचीनसाधनाक्रम के द्वादशाङ्ग निम्न हैं ।
(१) प्रातकृत्य
(२) ऋष्यादिन्यास:
(३) करन्यासः
(४) अङ्गन्यास:
(५) वर्णन्यास
(६) व्यापकन्यास
(७) पीठन्यास:
(८) अन्तर्याग
(९) ध्यान
(१०) सोऽहंधारणा 
(११) जप
(१२) जपसर्मपण
ताराकुलसाधकों को तुलसी तथा हरिनामसंकीर्तन निषिद्ध है। इन दोनो प्रकार के क्रमों से अलग श्रीश्रीताराविद्या का काश्मीरक्रम भी हैं। इस दीक्षाक्रम में श्रीश्रीतारा के भैरव सद्योजात हैं ‌। परादेवीरहस्यतंत्र के ५३ वें पटल में कहा भी गया है-
सद्योजातस्तु तारायाः शिव इत्येवमीश्वरि ॥९.अ
काश्मीरक्रम में पञ्चताराओं की उपासना की जाती हैं।
(१) श्रीताराभट्टारिका
(२) श्रीतारिणीभट्टारिका
(३) श्रीउग्रताराभट्टारिका
(४) श्रीएकजटाभट्टारिका
(५) श्रीनीलसरस्वतीभट्टारिका
मंत्रकोश में भी कहा गया हैं-
तारापि तारिणी चैव एकजटापि तथैव च ।
नीलसरस्वती चैवमुग्रतारा प्रकीर्तिताः ॥
तारा भेदास्तु पञ्चैवमक्षोभ्येण प्रकाशिताः॥
काश्मीरक्रम के तन्त्रग्रंथ ‘भैरवसर्वस्व‘ के अनुसार भगवती तारा का मंत्र निम्न हैं ।
तारं व्योषं तथा कान्ता माया वाग्भवम् एव च ।
कूर्चं चैव महेशानि ह्यन्ते फट् ठद्वयं तथा ॥
काश्मीरक्रम के तन्त्रग्रंथ भैरवतन्त्र के अनुसार भगवती श्रीश्रीतारा का ध्यान निम्न हैं ।
अथ वक्ष्यामि ताराया ध्यानं भैरवतन्त्रके ।
देव्या भेदविहीनाया मुनिसाधक पूजिते ॥

देवीं पन्नगभूषितां हिमरुचिं शीतांशुशङ्खप्रभाम् ।
मुक्तारत्नपरीतकण्ठवलयां रक्ताम्बरां विभ्रतीम् ॥
शूलाब्जासिगदाधरां सुरगणैर्वैकुण्ठमुख्यैःस्तुताम् ।
नित्यं लोकत्रयैकरक्षणपरां तारां त्रिनेत्रां भजे ॥

काश्मीरक्रम के अनुसार तारायन्त्र का वर्णन निम्न हैं ।
परादेवीरहस्यतंत्रे-
अथ वक्ष्यामि ताराया यन्त्रोद्धारमनुत्तमम् ।
भोगमोक्षप्रदं देवि गोप्यं कुरु महेश्वरि ॥
बिन्दुस्त्रिकोणं च षडस्रयुक्तं
वृत्तं तथाष्टारमलं त्रिवृत्तम् ।
सभूपुरं चैकजटाविलासगेहं
मया यन्त्रमिदं प्रदिष्टम् ॥
एक बात विशेष उल्लेखनीय है कि तिब्बत तथा भोट देश में इक्कीस ताराओं की उपासना का प्रचार करने वाले बौद्धाचार्य सूर्यगुप्त (रविगुप्त) कश्मीर के निवासी थें। केरलदेश में भी क्षेत्रीयदेवी के साथ संयुक्तरूप से (syncretic form ) भगवती तारा की उपासना ‘नीलकेशी’ के स्वरूप में की जाती हैं । मलयालमन्त्रवादग्रन्थों मे ‘नीलकेशी’ उपासना का वर्णन मिलता हैं । मलयालक्षेत्रीयलोग देवी को ‘करिनीली’ के अभिधान से पुकारते हैं। भगवती तारा के महानीलक्रम, महाचीनक्रम तथा कश्मीरक्रम का वर्णन कर,मां भवतारिणी की वन्दना के साथ लेख का समापन किया जाता हैं ।

A verse from karpUrama~njarI

karpUrama~njarI is an experimental drama written in shaurasenI prAkRRita around 900 CE by mahAkavi rAjashekhara . The early mediaeval period of Indian history was time , when many tantric sects rose to prominence . They were both subject of fear and reverence in Indian society . Dramatists too were part of that society , so most of them choose to potray a fearsome image of kApAlikas.This work is unique in many sense. In contrast with Indian tradition of Sanskrit drama,it is written in pure prAkRRita. Second important point to notice about this drama is, it potrayes a positive image of kApAlika ascetic while other dramatists of that time potrayed a negetive and fearsome image of kApAlikas to there subjects. mAlatImAdhava ,harShacharitra mattavilAsaprahasana and yashastilaka are examples of such dramas. In pandemic time , while going through the karpUrama~njarI , a prAkRRita verse attracted my attention.This verse is invocation to goddess chAmuNDA .


kappantakelibhavaNe
kAlassa purANaruhirasuram ।jaadi piantI chaNDI parameTThikavAlachasaeNa ॥

Sanskrit ChAyA of this sloka will be like

kalpANtakelibhavane
kAlasya purANarudhirasurAm ।
jayati pibantI chaNDI parameShThI kapAlachashakeNa ॥

” Praise to godess chaNDikA who drinks alcohol of life from skull of brahmA , in mahAkAlarudra’s palace of destruction. “

This verse praises fearsome form of mother divine chAmuNDA who is drinking blood and alcohol from skull of brahmA during the final distruction of Universe.Why This verse attracted my attention is because this verse have multiple secrate meanings.This verse can be interpreted in light of krama doctrine ,kula doctrine and Tantra doctrine. I’m not interpretating whole verse but pointing out some words and hidden aspects encapsulated in them .

chaNDI = kuNDalinI,chaNDakApAlini, chAmuNDA ,kAlasaNkarShiNI
kapAlachashaka= Skull cup,kAdya, brahmarandhra, VirapAtra
kalpANtakelibhavan = mahAshmashAna, Final yogic State of assimilation , Plain of mahAbhairava where he destroys everything in universe
rudhirasurAm = brahmarasa, nector falling from sahasrAra , chandrAmRRita , Blood and Alcohol,Life force of universe, PashUtA
parameShThI =brahmA , creater of impure universe , propagator of pashushAstra,हूँ सर्वसंहारिणीमहाचण्डेकापालिनीपादुकां पूजयामि॥

लाकुलपाशुपतसंप्रदाय का गुरुमण्डल तथा उनके ग्रंथ

मध्यकाल के आते आते भगवान लकुलीश के द्वारा प्रवर्तित लाकुलपाशुपतसंप्रदाय क्षीण हो चला था । लाकुलपाशुपतसंप्रदाय का स्थान अब त्रिक,सिद्धान्त इत्यादि नए शैवमत ले रहे थे। मध्यकाल के अंत तक पाशुपतसम्प्रदाय काल के धुंधले अन्धकार में समा गया, और अपने पीछे छोड़ गया अपने ध्वस्तावशेष ।
शैवसिद्धान्त सम्प्रदाय के अनुयायी लाकुलपाशुपतों को सर्वथा हेय मानते थे । काश्मीर के त्रिकसम्प्रदाय तथा कुलसंप्रदाय के अनुयायी लाकुलपाशुपतों को सर्वथा हेय नहीं मानते थें। वे लाकुलपाशुपतों के कुछ सिद्धांत स्वीकार करते थे , अन्य सिद्धांतो पर उनका मतभेद था । इन दोनों संप्रदायों ने कुछ अंश में लाकुलपाशुपतसम्प्रदाय को अपने अंदर समाहित कर लिया । श्रीसिद्धामत (अपरनाम- सिद्धयोगेश्वरीमत ) की गुरुपरम्परा में भगवान लकुलीश का नामोल्लेख मिलता है, जो इस तथ्य की पुष्टि करता हैं ।श्रीसिद्धादिविनिर्दिष्टा गुरुभिश्च निरूपिता ।
भैरवो भैरवी देवी स्वच्छन्दो लाकुलोऽणुराट् ॥ गहनेशोऽब्जजः शक्रो गुरुः कोट्यपकर्षतः ।
नवभिः क्रमशोऽधीतं नवकोटिप्रविस्तरम् ॥     (तंत्रालोक ३६.१-२)                                कुलसंप्रदाय की एक गुरुपरम्परा के अनुसार लकुलीश के शिष्य अनन्त की परम्परा में विश्वरूप नामक एक आचार्य हुए । ये विश्वरूप उत्तरतंत्र के सिद्धसाधक , लाकुलपाशुपतसम्प्रदाय के अनन्तगोत्र के थे । इन्ही के शिष्य श्रीमान अल्लट कुलशास्त्रों के विशेष प्रचारक तथा ज्ञाता हुए। लाकुलपाशुपतसम्प्रदाय की छोटी धाराएं अन्य संप्रदायों में विलीन हो गई तथा मुख्यधारा का लोप हो गया , पीछे रह गये तो बस उनके होने के प्रमाण । लाकुलपाशुपतसम्प्रदाय की गुरुपरम्परा में अठारह प्रधान पाशुपताचार्य हुए हैं । इन्हे ‘तीर्थकर’ भी कहा जाता था । पाशुपताचार्य भासर्वज्ञकृत ‘गणकारिका’ में कहा गया है- ततोऽवभृथस्नानं कृत्वा भगवंल्लकुलीशादीन्राशीकरान्तांश्च तीर्थकराननुक्रमेण यथावद्भक्त्या नमस्कुर्यात् तदनु प्रदक्षिणमेकमिति ॥ (गणकारिका-१.७.४९)      भगवान लकुलीश से स्वविद्यागुरु पर्यन्त अठारह आचार्यों के नाम का उल्लेख ‘तर्कसंग्रहदीपिका’ में मिलता हैं । इनके शुभनाम क्रमशःहै-
१) भगवान् श्रीलकुलीश
२) श्रीकौशिकपाशुपताचार्य
३) श्रीगार्ग्यपाशुपताचार्य
४) श्रीमित्रपाशुपताचार्य
५)श्रीकारूषपाशुपताचार्य
६) श्रीईशानपाशुपताचार्य
७) श्रीपारगार्ग्यपाशुपताचार्य
८) श्रीकपिलाण्डपाशुपताचार्य
९) श्रीमनुष्यकपाशुपताचार्य
१०) श्रीकुशिकपाशुपताचार्य
११) श्रीअत्रिपाशुपताचार्य
१२) श्रीपिङ्गलपाशुपताचार्य
१३) श्रीपुष्यकपाशुपताचार्य
१४) श्रीबृहदार्यपाशुपताचार्य
१५) श्रीअगस्तिपाशुपताचार्य
१६) श्रीसंतानपाशुपताचार्य
१७) श्रीराशीकरपाशुपताचार्य
१८) श्रीस्वविद्यागुरु अमुकपाशुपताचार्य
लाकुलपाशुपतसंप्रदाय के अनुयायी अपने इन अठारह पाशुपताचार्यों का नित्यस्मरण तथा प्रणाम किया करते थें । ‘तर्कसंग्रहदीपिका‘ के साथ साथ ‘गणकारिका‘ में भी लाकुलपाशुपतों की इस विधि का उल्लेख मिलता हैं ।
तत्रोपस्पृश्य कारणतीर्थकरगुरून् अनुप्रणम्य प्राङ्मुख उदङ्मुखो वा पद्मकस्वस्तिकादीनाम् अन्यतमं यथासुखम् आसनं बद्ध्वा कृतम् उन्नतं च कृत्वा शनैः संयतान्तःकरणेन रेचकादीन् कुर्यात् ॥ (गणकारिका-१.६.७६)  लाकुलपाशुपतसंप्रदाय में आठप्रमाण ग्रंथों का प्रचलन था । कालान्तर में जब पाशुपत सम्प्रदाय का पतन हुआ तब प्रमाणग्रंथ लुप्त हो गये । कुछ विद्वान प्रमाणों की संख्या चौदह मानते हैं। इन चौदह के नाम क्रमशः है –
१) पञ्चार्थप्रमाण
२) शिवगुह्यप्रमाण
३) रुद्राङ्कुशप्रमाण
४) हृदयप्रमाण
५) व्युहप्रमाण
६) लक्षणप्रमाण
७) आकर्षप्रमाण
८) आदर्शप्रमाण
९) पुराकल्पप्रमाण
१०) हाटकप्रमाण
११) शालकप्रमाण
१२) निरूक्तप्रमाण
१३) विश्वप्रमाण
१४) प्रपंचप्रमाण
हृदयप्रमाण के छः उपविभाग थे , जिनको उपप्रमाण कहा जाता था । भगवान लकुलीश के शिष्य मुसलेन्द्र ने इन छः उपप्रमाणों का संग्रह किया था। यदि इन उपप्रमाणों का योग कर लिया जाए तो कुल चौदहप्रमाण सिद्ध होते हैं । केवल पञ्चार्थप्रमाण का कुछ अंश महामाहेश्वराचार्य क्षेमराज के ‘स्वच्छन्दोद्योत‘ में मिलता हैं। कश्मीर के शैवसिद्धान्ताचार्य भट्ट रामकण्ठ हृदयप्रमाण का नामोल्लेख अपने ‘परमोक्षनिरासकारिकावृत्ति’ में करते हैं। सायणमाधव कृत ‘सर्वदर्शनसंग्रह’ के पाशुपतदर्शनप्रकरण में “इत्यादर्शकारादिभिस्तीर्थकरैर्निरूपितम् “
वाक्य में आदर्शप्रमाण का नामोल्लेख मिलता हैं। विभिन्न संप्रदायों के आचार्यों द्वारा उद्धृत होने तथा नामोल्लेख से इन प्रमाणग्रंथों की ऐतिहासिकता सिद्ध हो जाती हैं । दुर्भाग्यवश पञ्चार्थप्रमाण के ४ श्लोकों के अतिरिक्त इन ग्रंथों का कोई ओर अंश अप्राप्य हैं ।

भट्टारक लकुलीश के चतुर्भुज ध्यान को लिखकर लेख समाप्त करते हैं………शिवमस्तु ॐ ।
शोणाङ्गं डमरुञ्चशूलमपरे वामेऽभयं कुण्डिकां बिभ्राणस्मितभस्मराशितनुं पिङ्गोर्ध्वकेशावृतम् ।
त्र्यक्षं नीलगलं महोरगधरं हारादिभूषोज्वलं
ध्यायेऽहं लकुलीश्वरं सुरपतिं पद्मासनस्थं हृदि ॥

भगवती हंसतारा

जय मां तारा

कालीमंत्रक्रमान्तर्गत जिस प्रकार कालीकुलसाधक भगवती हंसकाली की उपासना करते है, उसी प्रकार ताराकुल साधकों के मध्य भगवती हंसतारा की उपासना का प्रचलन हैं ।

हंसतारा महाविद्या तव स्नेहात् प्रकाशिता ।
कविता सा वशेत् पुंसां धनार्थी धनमाप्नूयात् ।
मोक्षार्थी लभते मोक्षं नात्र कार्या विचारणा ॥

स्वच्छंदसंग्रह में भगवान शिव ने भगवती हंसतारा को आज्ञासिद्धि, त्रैलोक्यवशीकरण, चौदह प्रकार की विद्या , कवित्व, धनधान्य तथा मोक्ष प्रदान करने वाली महाविद्या कहा हैं ।

आज्ञासिद्धिमवाप्नोति त्रैलोक्यं वशमानयेत् । वशमायास्ति सततं तस्य विद्याश्चचतुर्दश ॥

ताराकुल में विशिष्ट सिद्धिप्रद होने के कारण, मात्र अधिकारी साधकों को यह महाविद्या गुरुप्रसाद तथा देवता के अनुग्रह से प्राप्त होती हैं । यह महाविद्या अत्यन्त गोपनीय है, इसलिए पद्धतिकार तथा निबन्धकार भी इनका विशेष उल्लेख करने से सकुचाते हैं। भगवती हंसतारा का ध्यान इस प्रकार हैं-

” सकलविद्यामय हंस की पृष्ट पर भगवान अक्षोभ्य विराजमान है, उन्हीं के अंक में चतुर्भुजा भगवती हंसतारा विराजमान हैं । इनकी कान्ति श्वेतस्फटिक के सामन हैं । भगवती की आभा शीतल चंद्रप्रकाश जैसी हैं। “

हंसमंत्र की अधिष्ठाता देवता होने के कारण तथा हंसारूढ होने के कारण भगवती तारिणी के इस स्वरूप को हंसतारा अभिधान किया गया । भगवती हंसतारा की उपासना त्र्याक्षरी , सप्ताक्षरी अष्टाक्षरी , नवाक्षरी तथा सार्द्धपञ्चाक्षरी विद्या से होती हैं । ये सभी मंत्र गुरुगम्य है, उन्हीं के श्रीमुख से इनका ज्ञान प्राप्त कर साधना करना श्रेयस्कर होता हैं । विशेष जिज्ञासुजनों को तारिणीमंत्रकल्प, रुद्रयामल ताराखण्ड, स्वच्छंदसंग्रह तथा श्रीरघुनंदन तर्कवागीश महाशय कृत आगमतत्वविलास के तारा प्रकरण का अवलोकन करना चाहिए । भगवती हंसतारा की आवरणपूजा तथा पूजापद्धति कुछ परिवर्तनों के साथ श्रीउग्रतारा के सामान हैं ।

बौद्ध हंसताराप्रतिमा

इनकी उपासना महाचीनक्रम की विधि से करना चाहिएं तभी साधक को सिद्धि प्राप्त होती हैं । तारामन्त्रक्रम में साधक को हंसषोढान्यास का अधिकार हंसतारा उपासना के पश्चात ही प्राप्त होता हैं । स्वतन्त्ररूप से उपासना करने पर भगवती हंसतारा का साधक भोग तथा मोक्ष दोनों सहज ही प्राप्त कर लेता हैं ।
ध्यायेत्कोटिदिवाकरद्युतिनिभान्बालेन्दुयुक्छेखरां
रक्ताङ्गीं रसनां सुरक्तवसनाम्पूर्णेन्दुबिम्बाननाम्।
पाशङ्कर्तृमहाङ्कुशादि दधतीन्दोर्भिश्रतुर्भिर्युतान्
नानाभूषणभूषिताम्भगवतीन्ताराञ्जगत्तारिणीम् ॥
वासन्तीय नवरात्रपर्व की अनेकों शुभकामनाओं सहित……🙏

ॐ हंसतारे वज्रपुष्पं प्रतिच्छ हूँ फट् स्वाहा ॥

श्रीहेरम्बगणपति

तंत्रयुग (5CE से 14CE) में तांत्रिक सम्प्रदायों के उदय के साथ ही गाणपत्यसंप्रदाय का भी उदय हुआ । इस संप्रदाय के अनुयायी गणपति को अपना इष्ट देवता मानते थें । इस आगमिक धारा में ६ प्रधानमत तथा ६ उपमत थे, जो आपस में संबद्ध थें । ये सभी शाखाएं गणपति के किसी विशिष्टस्वरूप को अपना इष्टदेवता स्वीकारती थी तथा उस स्वरूप से संबन्धित विशेष आचारों तथा व्रतों का पालन करती थीं। इनमे
३ प्रधानमत तथा ३ उपमत वैदिकधर्म का पालन करने वाले दक्षिणाचार के और अन्य ३ प्रधानमत तथा ३ उपमत तांत्रिकधर्म का पालन करने वाले वामाचार के थें । इन्ही वाममार्ग के उपमतों में एक उपमत श्रीहेरम्बगणपति उपासना का था। इसका प्रधानमत श्रीउच्छिष्टगणपति उपासना का था । हेरम्बगणपतिसंप्रदाय के उपासक भगवान हेरम्बगणपति की साधना वामविधि से किया करते थें। ये साधक ‘अक्ष’ को भुजाओं पर धारण किया करते थें। ललाट पर श्वेतचन्दन से गाणपत्यपुण्ड्र तथा कण्ठ में श्वेतार्क की माला धारण किया करते थे । इस मत के साधक अंकुश तथा परशु ये दोनो आयुध धारण करते थें । भृगुवार को विशेष व्रत करते थें। मास की दोनों चतुर्थीयां इस मत में पर्वकाल थीं । श्रीहेरम्बनाथ अथवा श्रीहेरम्बसिद्धाचार्य इस मत के प्रतिष्ठापक आचार्य थें । गाणपत्यदर्शन की पाण्डुलिपी में कई स्थानों पर श्रीहेरम्बनाथ का नामोल्लेख मिलता हैं। काल की प्रवाहमानधारा में धीरे धीरे इस गाणपत्यमत का लोप हो गया परन्तु शाक्तमत के साधकों के मध्य श्रीहेरम्बगणपति की उपासना का क्रम निरन्तर चलता रहा। श्रीहेरम्बगणपति शाक्तों के आम्नायक्रम में पश्चिमाम्नाय से संबंधित देवता हैं । श्रीहेरम्बगणपति की दो प्रकार की मूर्तियां अथवा स्वरूप हैं ।
१. एकवीरहेरम्बगणपति
२. यामलहेरम्बगणपति
एकवीरस्वरूप में हेरम्बगणपति प्रायः सिंहारूढ, पंचवक्त्र तथा दशभुजी होते हैं । अपने दस हाथों में वे क्रमश अभय, वर, पाश, दंत, अक्षमाला, अंकुश , परशु , मुद्गर, मोदक तथा फल धारण करते हैं। ये मौक्तिक के समान श्वेतवर्ण वाले हैं । पंचकृत्यकारी होने के कारण इनके पांच मातंगवक्त्र बनाये जाते हैं ।

यामलस्वरूप में विशेष यह है कि इनके साथ इनकी दोनों शक्तियों का तथा दो प्रकार के वाहनों का अंकन किया जाता हैं। सिंह तथा मुषक ये दोनों ही इनके वाहन हैं ।

कही कही केवल एक शक्ति के साथ भी इन्हें दर्शाया जाता हैं । श्रीहेरम्बगणपति का एक नव्यस्वरूप भी देखने को मिलता हैं जिसमें उन्हें पद्मासनस्थित , पञ्चवक्त्र तथा चतुर्भुज दिखाय गया हैं । हेरम्बदेव के इस प्रकार के स्वरूप का वर्णन शास्त्रों में नहीं मिलता है संभवत ये किसी शिल्पकर्मी के मानस की अभिव्यक्ति हैं। हेरम्बोपनिषद, विनायकतंत्र, हेरम्बकल्प तथा मंत्रमहार्णव में इनकी उपासना संबंधी विवरण प्राप्त होता हैं। उत्तरभारत तथा नेपाल में गणपति के इस स्वरूप की क्रम से साधना करने वाले साधक अभी भी हैं। दक्षिणभारत के विषय में अनभिज्ञता के कारण पाठको से क्षमा चाहता हूं । हेरम्बभट्टारक का ध्यान लिखकर लेख समाप्त किया जाता हैं ।
अभयवरदहस्तःपाशदंताक्षमाला सृणिपरशुदधानो मुद्गरंमोदकञ्च । फलमधिगतसिंहः पंचमातंगवक्त्रो गणपतिरतिगौरः पातु हेरम्ब नामा ॥

जयद्रथयामल-एक सिंहावलोकन

भैरवस्रोत के विद्यापीठग्रन्थों में जयद्रथयामल एक प्रधान आगम हैं । सिंधुदेश के राजा जयद्रथ को भगवान महेश्वर द्वारा प्रसन्न होकर इस ग्रंथ का उपदेश
उपदेश किया गया । भगवती कालसंकर्षिणी इस आगमग्रंथ का उपजीव्य विषय हैं। भगवती कालसंकर्षिणी के ३६० स्वरूपों के मंत्र, यंत्र, प्रयोगादि का वर्णन इस ग्रंथ में प्राप्त होता हैं। यह ग्रंथ शिवशिवासंवादात्मक हैं, भगवती शिवा इस ग्रंथ की प्रश्नकर्ता तथा भगवान शिव उत्तरदाता हैं। यह ग्रंथ विशालकाय कलेवर वाला है, जो कि २४,००० श्लोकों में निबद्ध हैं। ग्रंथ की पुष्पिका में “श्रीभैरवस्रोतसि विद्यापीठे जयद्रथयामले महातन्त्रे …. षट्के चतुर् विंशतिसाहस्रे …..” लिखा प्राप्त होता हैं ।
इस ग्रंथ का विभाजन ४ षट्कों में किया गया हैं। प्रत्येक षट्क में ६,००० श्लोक हैं। उपलब्ध षट्कों में ६००० श्लोक प्राप्त नहीं होते हैं।
षट्कों का विभाजन पुनः पटलों में किया गया हैं। अनुमानतः पूर्ण जयद्रथ यामल में १८०-१५० पटल थें । उपलब्ध जयद्रथयामल में लगभग १३५ पटल हैं।
इस ग्रंथ के चारषट्कों की ३०-३२ पांडुलिपियां नेवारी तथा पुरानीदेवनागरी लिपि में नेपाल देश में प्राप्त होती हैं। यह पांडुलिपियां ११-१२ शती में लिखी गई थीं , जिनमे कई का समय समय पर पुनर्लेखन किया गया। ऐतिहासिक दृष्टि से देखा जाएं तो जयद्रथयामल की रचना ८-९ शती में कश्मीर देश में की गई । इस ग्रंथ पर कापालिकों तथा डामरकों का स्पष्ट प्रभाव दृष्टि गोचर होता हैं। अनेकों भयावह यागों तथा अमानुषिक प्रयोगों का वर्णन इस ग्रंथ में प्राप्त होता हैं। साथ ही विभिन्न योगों , आसनों तथा मुद्राओं का विवरण भी प्राप्त होता हैं।
जिसमे बाद की ९-१० शती तक कई क्षेपक जोड़े गए। जयद्रथयामल के निर्माणसमय से पूर्व में प्रचलित माधवकुल, योगिनीसञ्चार, कुलगह्वर तथा कालीक्रमविधान इत्यादि स्वतंत्र प्रकरणों वा ग्रंथो का समावेश भी इस यामलग्रंथ में किया गया हैं ।वर्तमान में यह ग्रंथ अपूर्ण अवस्था में प्राप्त होता हैं। कश्मीर के ग्रंथो में जयद्रथयामल के ऐसे अनेकों भाग उद्धृत किए गए है जो की नेपाल के हस्तलेखों में उपलब्ध नहीं होते हैं यथा कालीपटल, बगलामुखीपटल तथा वटुकभैरवपटल इत्यादि । प्रकटभैरव महामाहेश्वाराचार्य अभिनवगुप्त अपने तन्त्रालोक में अनेकों स्थानों पर इस ग्रन्थ को उद्धृत करते हैं। अब जयद्रथयामल के चारों षट्कों की विषयवस्तु का वर्णन किया जाता हैं ।
१.प्रथमषट्क प्रथमषट्क में ५० पटल हैं। जिनमें देवी भगवती कालसंकर्षिणी के गुप्तयोग का वर्णन मिलता हैं। प्रथम पांचपटलों में विद्यापीठ के विभिन्न ग्रंथो का वर्णन प्राप्त होता हैं। इस भाग का अपरनाम ‘शिरच्छेद’ हैं। वामस्रोत से संबंधित चतुर्भगनियों के सहित भगवान तुम्बुरू का विशद ध्यान प्राप्त होता हैं। इसी भाग में नवाक्षरीविद्या का उद्धार दिया गया हैं। साथ ही देवी लक्ष्मी के विशिष्टयाग तथा इंद्रजाल का वर्णन प्राप्त होता हैं। यामलानुसारी होमविधि भी इसी भाग में लिखी गई हैं।
२.द्वितीयषट्कद्वितीयषट्क में ४० पटल हैं। आरंभ के पटलों में इंद्रध्वज, वरुणध्वज, वायुध्वज, धनेश्वर ध्वज, ब्रह्मध्वज , विष्णुध्वज तथा रुद्रध्वज का विवरण हैं। इसी भाग में चर्चिका,यमकाली, नंदा, जंघकरा, रक्तकाली, ईशानकाली, प्रज्ञाकाली , वीर्यकाली इत्यादि भगवती कालसंकर्षिणी के स्वरूपों का विवरण प्राप्त होता हैं। अष्टम पटल में भगवती कालसंकर्षिणी के विशिष्ट स्वरूप गह्नेश्वरी काली का वर्णन किया गया हैं। भगवती काली की परम गोपनीय हृदयविद्या का उद्धार भी इसी भाग में किया गया हैं। विद्याविद्येश्वरी देवी का याग ३ पटलों में प्राप्त होता हैं। भगवती सिद्धिलक्ष्मी इस षट्क की प्रधान देवता हैं। अधिकतर पटल इसी स्वरूप को समर्पित हैं। इस भाग का अपरनाम ‘महाकालिकातंत्र’ हैं।
३.तृतीयषट्क– ऐतिहासिकदृष्टि से यह षट्क जयद्रथ यामल का सर्वप्राचीन भाग हैं। इस भाग पर प्राचीन पाञ्चरात्र संप्रदाय का प्रभाव जान पड़ता हैं। पांच पटलों में माधवकुल तथा आठपटलों में योगिनीसंचार इसी भाग में उपलब्ध होते हैं। इसी भाग में भुवनदीक्षा से लेकर निर्वाणदीक्षा पर्यन्त २४ प्रकार की दीक्षाओं का वर्णन मिलता हैं। अव्ययदेशकाली के याग की विधि भी इसी भाग में हैं। महामेलाप प्रकरण भी इसी भाग में हैं । उपलब्ध पाण्डुलिपियों में इस भाग के १६ पटल प्राप्त होते हैं। संभवतः यह भाग अपूर्ण हैं।
४.चतुर्थषट्क– यह भाग भी अत्यंत प्राचीन मालूम होता हैं। मन्त्रवीर्य की चर्चा इसी भाग में भगवान करते हैं। इस भाग में एक मुद्राकोश भी प्राप्त होता है , जिसमे महामुद्रा, खेचरीमुद्रा इत्यादि पचास से अधिक मुद्राओं का वर्णन भगवान साधकों की सिद्धि के हेतु करते हैं । इसी भाग में परान्तककाली, मेघकाली, बगलामुखी, नागाशनी, पापन्तकारी, नित्याकाली, कालरात्रि, मेलपाकाली, वागीश्वरी , मोहकाली तथा संग्रामकाली इत्यादि स्वरूपों के याग की विधि प्राप्त होती हैं। इसी भाग में कालीक्रम तथा राविणीयोग का वर्णन मिलता हैं। कालीकुलपूजा विधि भी इसी भाग में प्राप्त होती हैं। संभवतः यह भाग भी कुछ अपूर्ण हैं । भगवती संकर्षिणी के ध्यान के साथ लेख समाप्त किया जाता है………. शिवमस्तु ।
काद्यं कङ्कालयुक्ता कुलकमला कालिका कन्दकोणा कङ्काली कालयन्ति कुलाऽकुलकला कोविदं कार्गलस्था । पायाद्वः कालकामारणिकलितकला केलिकेकाकलापैः काद्येकोष्णं कलेशी कवलयति सदा सा करङ्का क्रमेण ॥

॥ पौराणिकसंध्याविधि:॥

शास्त्रों में सन्ध्या को अति महत्वपूर्ण आह्निककार्य घोषित किया गया है जिसके न करके से दोष होता हैं । जिस प्रकार त्रैवर्णिक द्विजातियों का २४ अक्षर की वैदिकी गायत्री में अधिकार है उसी प्रकार स्त्री तथा अन्य जनों को पौराणिक ३२ अक्षरों वाली गायत्री का अधिकार हैं । जिसका जप पौराणिक सन्ध्या वंदन के साथ किया जा सकता हैं।
पौराणिक गायत्री मंत्र निम्न है जो कि देविभागवत के अंतिम अध्याय में वर्णित हैं ।
सच्चिदानन्दरूपां तां गायत्री प्रतिपादिताम् ।
नमामि ह्रीँमयीं देवीं धियो यो नः प्रचोदयात् ॥
साधक सूर्याभिमुख होकर शिखाबंधन कर तीन बार आचमन करें ।
निम्न मंत्र से अपना प्रोक्षण करें । संसृक्षोर्निखिलं विश्वं मुहुः शुक्रं प्रजापतेः।
मातरः सर्वभूतानामापो देव्यः पुनन्तु माम् ॥
दोनों हाथों को जोड़ कर गायत्री का ध्यान कर आवाहन करें । 
श्वेतवर्णासमुद्दिष्टा कौशेयवसना तथा ।
श्वेतैर्विलेपनैः पुष्पैरलंकारैश्च भूषिता ॥ आदित्यमण्डलांतस्था ब्रह्मलोकगताथवा ।
अक्षसूत्रधरा देवी पद्मासनगता शुभा ॥   आगच्छ वरदे देवि त्र्यक्षरे ब्रह्मवादिनी । 
गायत्रीच्छन्दसां मातर्जपे मे सन्निधि भव ॥
तत्पश्चात पौराणिक गायत्री का
अष्ट/दश/शतबार जप करें ।
निम्न मंत्र से जप का समर्पण करें। गुह्यातिगुह्यगोप्त्री त्वं ग्रहाणास्मत् कृतं जपम् । सिद्धिर्भवतु मे देवि त्वत्प्रसादान् महेश्वरि ॥
तत्पश्चात देवी गायत्री का विसर्जन निम्न मंत्र से करें ।
महेश्वरवदनोत्पन्ना विष्णोर्हृदयसंस्थिता ।
ब्रह्मणा समनुज्ञाता गच्छ देवि यथेच्छया॥
निम्न मंत्र से सूर्य को तीन अर्घ्य देवें।
नमो विवस्वते ब्रह्मन् भास्वते विष्णुतेजसे ।
जगत्पवित्रे शुचये सवित्रे कर्मदायिने ॥ एषोऽर्घ: भगवते श्रीसूर्याय नमः॥
निम्नमंत्र से सूर्य का उपस्थान कर प्रणाम करें । उद्वयन्तमनाभासं परमं व्योम चिन्मयम् ।
अव्ययं सच्चिदाकाशमद्यन्म ज्योतिरुत्तमम् ॥
इतिसंध्याविधि:॥